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राजपक्षे बंधुओं के शासन में नए रिश्तों के आगाज का इंतजार

आदिति फडणीस /  November 22, 2019

श्रीलंका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति गोटाभाया राजपक्षे जब अपनी पहली विदेश यात्रा पर 29 नवंबर को नई दिल्ली पहुंचेंगे तो वह सरकार के आधे हिस्से का ही प्रतिनिधित्व कर रहे होंगे। बाकी आधा हिस्सा यानी नवनियुक्त प्रधानमंत्री महिंदा राजपक्षे तो उस समय कोलंबो में ही होंगे और दूरभाष पर चीन के संपर्क में होंगे। राजपक्षे भाइयों की यह जोड़ी इसके पहले 2005-15 के दौरान भी श्रीलंका की सत्ता में रह चुकी है। उस समय महिंदा राष्ट्रपति और उनके छोटे भाई गोटाभाया रक्षा सचिव थे। लगभग उसी समय इस क्षेत्र में भारत की भू-रणनीतिक भूमिका पर ग्रहण लगना शुरू हो गया था।

राजपक्षे बंधुओं की सत्ता के पहले काल में श्रीलंका के लिए सबसे बड़ी चुनौती देश के उत्तरी एवं पूर्वी इलाकों में तमिल विद्रोहियों पर काबू पाने की थी। दोनों भाइयों ने लिट्टïे विद्रोहियों से निपटने के लिए हथियार खरीदने की कोशिश पहले भारत से ही की थी। लेकिन तमिलनाडु की राजनीतिक मजबूरियों के चलते भारत सरकार ने श्रीलंका के उस अनुरोध पर कोई निर्णय ही नहीं लिया। ऐसे में राजपक्षे को मजबूर होकर चीन और पाकिस्तान की तरफ मदद के हाथ बढ़ाने पड़े और वहां से उन्हें सहर्ष मदद मिली। युद्ध विराम एवं शांति स्थापना की कई नाकाम कोशिशों के बाद राजपक्षे बंधुओं ने यह तय किया कि सैन्य कार्रवाई से ही इस समस्या को हमेशा के लिए खत्म किया जा सकता है। इसके पहले श्रीलंका ने लिट्टे विद्रोहियों के खिलाफ सीमित सैन्य कार्रवाई ही की थी।

श्रीलंकाई नागरिकों के भारत के साथ संपर्क को लेकर काफी पुरानी यादें हैं। वर्ष 2000 में लिट्टे ने एलीफेंट दर्रे की लड़ाई के बाद जाफना में श्रीलंकाई सेना को घेर लिया था। तत्कालीन विदेश मंत्री लक्ष्मण कादिरगमार ने भारत से सैन्य मदद करने का आग्रह किया था, जैसा कि भारत ने 1971 के जनता विमुक्ति पेरामुना या 1987 के लिट्टे विरोधी अभियानों के दौरान किया था। लेकिन भारत ने ऐसा नहीं किया। अलबत्ता उसने श्रीलंका को 20 करोड़ डॉलर का अनुदान जरूर दिया था। 

गोटाभाया के नेतृत्व और महिंदा के मार्गदर्शन में श्रीलंकाई सेना ने तमिल विद्रोहियों को करारी मात देकर लिट्टे के अपराजेय होने की धारणा ध्वस्त करने के साथ ही सबको अचंभे में डाल दिया था। इस युद्ध को भारत के प्रच्छन्न समर्थन का श्रेय भी राजपक्षे बंधुओं को दिया गया था जिन्होंने भारत को ठीक से 'संभाला' था। भारत की अधिक मदद के बगैर इस युद्ध में निर्णायक जीत से उत्साहित होकर उन्होंने चीन को अपने यहां विकास करने के लिए साहसिक न्योता दे दिया। महिंदा के निर्वाचन क्षेत्र हम्बनटोटा में महत्त्वाकांक्षी विकास कार्यों के लिए चीन को दिया गया निमंत्रण श्रीलंका को कर्ज के जाल में फंसाने का सबब बन गया। लेकिन उनकी सरकार बड़े गर्व से अपने नागरिकों को इस बात का संकेत दे रही थी कि दोनों भाइयों ने भारत को नीचा दिखा दिया है।

महिंदा के राष्ट्रपति रहते समय चीन हम्बनटोटा बंदरगाह एवं औद्योगिक क्षेत्र, कोलंबो बंदरगाह एवं फाइनैंस सिटी, शांग्रीला होटल्स एवं आवास, भंडारनायके अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे से कोलंबो एवं गाले तक एक्सप्रेसवे और नए सैन्य मुख्यालय के निर्माण के अलावा सैन्य साजोसामान एवं प्रशिक्षण मुहैया कराने में लगा हुआ था। वहीं भारत इस समूचे परिदृश्य से नदारद था।

ऐसे में जब 2015 के चुनाव में महिंदा की शिकस्त हुई तो भारत ने एक हद तक सामरिक संतुलन हासिल कर लिया। उस समय राजपक्षे बंधुओं ने सार्वजनिक तौर पर कहा था कि भारत उनकी हार देखना चाहता था। उस समय तक राजपक्षे की फिजूलखर्ची के चलते श्रीलंका पर नौ अरब डॉलर का भारी कर्ज हो चुका था। राजपक्षे की हार के बाद सरकार बनाने के लिए वाम एवं दक्षिणपंथी दोनों दल एक साथ आए और एक अटपटा गठबंधन वजूद में आया। मैत्रीपाल सिरीसेना राष्ट्रपति बने जबकि रानिल विक्रमसिंघे प्रधानमंत्री बनाए गए। महिंदा राजपक्षे ने कुछ महीनों के भीतर ही जबरदस्त वापसी की और प्रांतीय चुनावों में सत्तारूढ़ गठजोड़ का सफाया कर दिया। भ्रष्टाचार एवं नकारेपन के आरोपों से घिरे गठजोड़ में अविश्वास बढऩे लगा और राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री दोनों ही एक-दूसरे के मुकाबले खड़े हो गए। इस लड़ाई का फायदा राजपक्षे बंधुओं को मिलता चला गया। 

महिंदा और गोटाभाया को जल्द ही यह अहसास हो गया कि श्रीलंका में राष्ट्रीयता की भावना पर जोर देना उनकी जीत की राह प्रशस्त कर सकता है। बोदु बल सेना (बीबीएस) एवं सिंहल बौद्ध समुदाय को समर्थन देकर उन्होंने दक्षिणी हिस्से में अपनी स्थिति मजबूत करने में कामयाबी पाई लेकिन इससे पहले ही विभाजित समाज और भी खंडित नजर आने लगा। यह काफी रोचक है कि राष्ट्रपति चुने जाने के बाद गोटाभाया ने जो शुरुआती नियुक्तियां की हैं, वे प्रधानमंत्री पद पर अपने बड़े भाई और पसंदीदा रक्षा सचिव की हैं।

गोटाभाया की ड्रीम टीम कई लोगों की रात की नींद हराम कर सकती है। वर्ष 2014 में दिल्ली की यात्रा पर आए एक श्रीलंकाई विश्लेषक ने राजपक्षे खानदान का पूरा ब्योरा रखा था। उस समय राष्ट्रपति एवं रक्षा सचिव पदों के अलावा वाणिज्य मंत्री (छोटे भाई बासिल) और स्पीकर (भतीजा चमल) भी इस खानदान के ही थे। महिंदा के बेटे नमल को सत्ता का एक ध्रुव माना जाता था। खानदान के दो और लोग भी थे जो सत्ता प्रतिष्ठान में कहीं न कहीं शामिल थे।

आप यह दलील दे सकते हैं कि यह तो इतिहास की बात है। चीन की अब श्रीलंका में पहले जैसी रुचि नहीं रही और वह खुद अपनी समस्याओं में उलझा है। ऐसे में बढिय़ा मौका देख भारत भी राजपक्षे बंधुओं को पुचकारने की कोशिश कर रहा है। राष्ट्रपति बनने के फौरन बाद गोटाभाया को दौरे का न्योता देना और गरमाहट दिखाना उसी योजना का हिस्सा है। आखिरकार, यह श्रीलंका के लोगों पर निर्भर है कि वे इस खानदान को ही सत्ता में बिठाना चाहेंगे या नहीं। भारत और श्रीलंका के कभी खत्म न होने वाले मनोरंजक एवं दिलचस्प सोप ओपेरा में हमें अगली कड़ी का इंतजार करना होगा।
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