बिजनेस स्टैंडर्ड - 5 लाख करोड़ डॉलर की राह नहीं आसान
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5 लाख करोड़ डॉलर की राह नहीं आसान

अर्चिस मोहन और संजीव मुखर्जी / नई दिल्ली November 22, 2019

वर्ष 2024-25 तक देश की अर्थव्यवस्था का आकार बढ़ाकर 5 लाख करोड़ डॉलर करने की राह आसान नहीं दिख रही है। यह लक्ष्य पाने के लिए देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में मौजूदा बाजार मूल्य पर अगले पांच वर्षों तक 12.4 प्रतिशत दर से बढ़ोतरी की दरकार होगी। केंद्र की नीति निर्धारक इकाई नीति आयोग की एक आंतरिक समीक्षा में यह बात सामने आई है। 

यह आंकड़ा वर्ष 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण मे व्यक्त अनुमानों के मुकाबले 0.4 प्रतिशत अंक अधिक है। अर्थव्यवस्था में मौजूदा सुस्ती और अमेरिकी मुद्रा डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी  से यह अंतर आया है। नीति आयोग की यह समीक्षा हाल में ही सांसदों के एक विशेष समूह के साथ साझा की गई थी। इसमें चालू वित्त वर्ष में नॉमिनल जीडीपी (महंगाई को सामायोजित किए बिना) मौजदूा कीमतों पर 10 प्रतिशत रहने का अनुमान व्यक्त किया गया है। वित्त वर्ष 2019-20 की पहली तिमाही में नॉमिनल डीजीपी कम होकर मात्र 8 प्रतिशत रह गई थी, जो पिछले 17 वर्षों का सबसे कमजोर आंकड़ा था। मोटेे तौर पर 2018-19 की अप्रैल-जून अवधि में जीडीपी की रफ्तार 5 प्रतिशत दर से बढ़ी है, जो पिछले छह वर्षों का सबसे कमजोर आंकड़ा रहा है।

नॉमिनल जीडीपी या दूसरे शब्दों में कहें तो देश की अर्थव्यवस्था का आकार आलोच्य तिमाही में 4.89 लाख करोड़ डॉलर रहा था। डॉलर में (प्रति डॉलर 70 रुपये की दर से ) यह 0.69 लाख करोड़ रहा। इस महीने के अंत तक दूसरी तिामही के आंकड़े आने की उम्मीद है। अर्थशास्त्रियों ने कहा कि स्थिर मूल्यों पर जीडीपी दर में इजाफा करना सबसे अधिक कठिन चुनौती होगी। हालांकि नीति आयोग ने स्थिर मूल्यों पर जीडीपी में आवश्यक बढ़ोतरी का कोई अनुमान नहीं दिया है, लेकिन अर्थशास्त्रियों की नजर में यह 9 प्रतिशत होना चाहिए। 2011-12 आधार वर्ष के साथ जब से जीडीपी श्रृंखला में संशोधित की गई है, तब से यह आंकड़ा हासिल नहीं किया जा सका है।

नीति आयोग ने चालू वित्त वर्ष के लिए डॉलर के मुकाबले रुपये का स्तर 70 माना है, जो 2024-25 तक कमजोर होकर 75 तक जा सकता है। पूर्व मुख्य सांख्यिकी प्रणब सेन ने कहा कि अगर डॉलर-रुपये की विनिमय दर 75 प्रतिशत मानी जाए और वैश्विक महंगाई 2 प्रतिशत रहती है तो भारत की महंगाई दर 3.5 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सकती है। ऐसी स्थिति में नॉमिनल जीडीपी में 12.4 प्रतिशत वृद्धि दर वास्तविक जीडीपी में 9 प्रतिशत तेजी ला पाएगी। 

सेन ने कहा, 'चालू वित्त वर्ष में भारत की विकास दर करीब 6 प्रतिशत रह सकती है। ऐसे मे यह प्रश्न पूछे जाने की जरूरत है कि पिछले कुछ महीनों में घोषित उपायों सहित मौजूदा नीतियों से देश की जीडीपी 6 प्रतिशत से 9 प्रतिशत हो सकती है तो मेरा जवाब होगा नहीं। मौजूदा परिस्थितियों में भारत की जीडीपी दर अगले पांच वर्षों में अधिक से अधिक 7 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।' सेन ने कहा कि इस बात को समझने के लिए उचित योजना बनाने की जरूरत है कि अगले पांच वर्षों में यह 2 फीसदी अतिरिक्त वास्तविक जीडीपी वृद्धि कहां से आएगी।  

आयोग का आकलन भी यह दर्शाता है कि पिछले कुछ वर्षों के दौरान बैंकों के खातों को साफ-सुथरा बनाने के कारण देश की आर्थिक वृद्धि को तगड़ा झटका लगा है। पिछले पांच वर्षों के दौरान बैंकों की ऋण वृद्धि में गिरावट आई है। 

आयोग ने कहा, 'भारत की जीडीपी लगातार जी20 देशों में सबसे ऊपर बनी हुई है। हालांकि पूरे रियल एस्टेट क्षेत्र और विशेष रूप से आवासीय क्षेत्र में निवेश में गिरावट नजर आ रही है।' आयोग ने कहा है कि भारत सरकार का जीडीपी के मुकाबले कर्ज में अंतर कम हुआ है, लेकिन इसमें और कमी करने की जरूरत है। 

आयोग ने कहा है कि भारत में प्रति व्यक्ति जीडीपी वैश्विक औसत के मुकाबले उतना नहीं सुधरा है, जितना यह अन्य बहुत से एशियाई देशों में सुधरा है। देश में प्रति व्यक्ति जीडीपी वर्ष 2018-19 में 1,42,719 करोड़ रुपये या करीब 2,000 डॉलर था। एमएसएमई क्षेत्र को कर्ज मिलने में आ रही दिक्कतों के बारे में आयोग ने कहा है कि भारी उद्योग और बुनियादी ढांचे में अधिक एनपीए के कारण बैंकों की ऋण वितरण में तगड़ी वृद्धि की क्षमता कम हुई है, जिससे एमएसएमई को कर्ज मिलने पर असर पड़ा है। 

आयोग ने देश में आर्थिक वृद्धि को उबारने के लिए जरूरी कदमों के बारे में कई सुझाव दिए हैं। इनमें लगातार कारोबारी सहूलियत पर ध्यान देना, औद्योगिक क्षेत्र के लिए बिजली शुल्क को तर्कसंगत बनाना और बांग्लादेश और वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों की तर्ज पर पारेषण और वितरण घाटे को कम करना शामिल हैं। आर्थिक वृद्धि को बढ़ाने के लिए नीति आयोग ने जो सुझाव दिए हैं, उनमें से एक लॉजिस्टक लागत को कम करना भी है। यह लागत इस समय जीडीपी की 14 फीसदी है, जिसे घटाकर वैश्विक स्तरों पर लाने की जरूरत है। 

आयोग ने कहा है कि बीते वर्षों के दौरान भारतीय रेल में कम निवेश, कम यात्री किराया और अधिक मालभाड़े की स्थिति पर भी विचार करने की जरूरत है। आयोग ने सड़क क्षेत्र को लेकर कहा है कि 2014 से सड़क निर्माण में काफी तेजी आई है। लेकिन भूमि अधिग्रहण की लागत को कम करने की जरूरत है, जो इस समय कुल लागत की करीब 40 फीसदी है। इसके अलावा इसमें लगने वाले समय को भी कम करने की जरूरत है, जो इस समय औसतन 4.5 वर्ष है। 

आयोग ने निर्यात को लेकर कहा है कि भारत को उच्च तकनीक और ऊंची कीमत के विनिर्मित उत्पादों पर ध्यान देने की जरूरत है। आयोग ने कहा, 'उदाहरण के लिए फिलहाल भारत पश्चिम एशिया और अफ्रीका को मुख्य रूप से सस्ते फोनों का निर्यात करता है। लेकिन यूरोप और अमेरिका को महंगे फोनों का निर्यात बढ़ाने पर ध्यान देने की जरूरत है।'

आयोग ने कपड़ा निर्यात को लेकर सरकार की नीति को ठीक नहीं बताया। आयोग ने कहा कि भारत से कपड़े का निर्यात घट रहा है क्योंकि देश में ऐसी व्यवस्था ही नहीं है कि वैश्विक बाजारों दबदबा कायम किया जा सके। आयोग ने कृषि को लेकर सुझाव दिया कि उत्पादकता बढ़ाने और इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के बराबर लाने के लिए तत्काल ढांचागत सुधारों की दरकार है। नीति आयोग ने कहा कि जीडीपी वृद्धि में गिरावट की एक प्रमुख वजह भूमि बाजार में उठापटक है। राज्यों  को केंद्र द्वारा बनाए गए मॉडल के मुताबिक अधिनिययम अपनाना चाहिए। 

आयोग ने फिनटेक क्षेत्र को लेकर कहा कि इस क्षेत्र में 2015 से आया धन और निवेश उल्लेखनीय है। लेकिन इसे और ऊपर ले जाने के लिए नई और नवोन्मेषी तरीके अपनाने की जरूरत है। आयोग ने पूंजी बाजारों को लेकर कहा कि भारत को पूंजी बाजारों को व्यापक बनाने की जरूरत है। इसके लिए जरूरी है कि बुनियादी ढांचे लिए फंडिंग सुधरे और बैंकों पर बोझ कम हो। वहीं कॉरपोरेट बॉन्डों और एनबीएफसी को नॉमिनल जीडीपी से अधिक तेजी से बढऩे की जरूरत है।
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