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गहराता जा रहा है रोजगार का संकट

शंकर आचार्य /  November 21, 2019

देश में बढ़ती बेरोजगारी और रोजगार संबंधी असुरक्षा के लिए आर्थिक मंदी आंशिक तौर पर ही जवाबदेह है। इसके पीछे सबसे प्रमुख वजह हैं कमजोर नीतियां। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं शंकर आचार्य

 
देश की आबादी में कामकाजी लोगों की भारी और बढ़ती हुई तादाद उसके लिए बहुत अहम संसाधन है। करीब एक अरब ऐसे लोगों की मदद से हम तेज और स्थायी आर्थिक विकास हासिल कर सकते हैं। 16 वर्ष पहले मैंने चेतावनी दी थी कि यदि सही नीतियां नहीं अपनाई गईं तो यह जनांकीय लाभ गंवा दिया जाएगा। तब से अब तक एक के बाद एक सरकारों ने गलत या कमजोर नीतियां और कार्यक्रम ही अपनाए हैं। इसमें कमजोर सार्वजनिक शिक्षा और कौशल व्यवस्था तथा अत्यंत जटिल एवं रोजगार विरोधी श्रम कानून शामिल हैं। व्यापार और विनिमय दर नीतियां ऐसी हैं जो निर्यात और आयात प्रतिस्पर्धा वाले घरेलू उत्पादन में श्रम को हतोत्साहित करती हैं। कमजोर बुनियादी ढांचा जो उत्पादकता और संचार को प्रभावित करता है, कमजोर सरकारी बैंक और टाले जा सकने लायक नीतिगत झटके मसलन नोटबंदी आदि भी इसमें शामिल हैं। जून 2019 में प्रकाशित पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2017-18 इसके बेहद निराश करने वाले परिणाम सामने रखता है। आंकड़े बताते हैं कि वर्ष 2004-05 से 2017-18 के बीच देश में रोजगार की स्थिति में जबरदस्त गिरावट आई। खासतौर पर वर्ष 2011-12 के बाद लगभग तमाम संकेतकों पर गिरावट देखने को मिली। एक नजर डालें तो:
 
सन 2011-12 से अब तक बेरोजगारी दर लगभग तीन गुनी बढ़कर 6.1 फीसदी हो गई है। चूंकि गरीबों के लिए बेरोजगार रह पाना संभव नहीं इसलिए इस बेरोजगारी में बड़ा हिस्सा शिक्षित बेरोजगारों का है।
 
युवा (15 से 29 वर्ष) बेरोजगारी दर भी तीन गुना बढ़कर 2017-18 में 17.8 फीसदी हो गई। यह भी रोजगार में आ रही कमी को ही दर्शाता है। दिलचस्प बात यह है कि अनुमान के मुताबिक ही वर्ष 2017-18 में युवा बेरोजगारी की दर शिक्षा के स्तर के साथ तेजी से बढ़ी। अशिक्षितों में यह 7.1 फीसदी थी तो सेकंडरी स्कूल की शिक्षा वालों में 14.4 फीसदी तथा स्नातकों और परास्नातकों में 36 फीसदी। यह आंकड़ा गंभीर सामाजिक और आर्थिक निराशा का द्योतक है।
 
खुली बेरोजगारी से भी अधिक परेशान करने वाले रुझान श्रम शक्ति की भागीदारी दर (एलएफपीआर) में देखने को मिलते हैं। यह दर श्रम लायक उम्र के लोगों में उन लोगों का अनुपात दर्शाती है जो रोजगार शुदा हैं या रोजगार चाहते हैं। एलएफपीआर में भारी गिरावट आई और यह 2004-05 के 64 फीसदी से घटकर 2017-18 में 50 फीसदी के नीचे आ गई। यानी देश की कामकाजी आबादी के आधे से कम के पास रोजगार है।
 
आश्चर्य नहीं कि देश का कुल रोजगार 2011-12 और 2017-18 के बीच कई लाख घटा। सन 1972-73 में राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण द्वारा रोजगार की स्थिति की शर्तें तय करने के बाद पहली बार ऐसा हुआ।
 
कुल एलएफपीआर में गिरावट के एक बड़े हिस्से के लिए महिला एलएफपीआर में गिरावट उत्तरदायी है। यह 2004-05 के 43 फीसदी से घटकर 2017-18 में 23 फीसदी रह गई। सन 2018 में चीन में महिलाओं के लिए यह 61 फीसदी, इंडोनेशिया में 52 फीसदी और बांग्लादेश में 36 फीसदी था। महिला एलएफपीआर में इस गिरावट को शिक्षा में महिलाओं के बढ़ते नामांकन से जोड़कर भी नहीं देखा जा सकता है क्योंकि 20 से अधिक उम्र की महिलाओं के एलएफपीआर में 20 फीसदी से अधिक गिरावट देखी गई। ऐसे में महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक सशक्तीकरण के लिए भविष्य दुखद है।
 
गत माह संतोष मेहरोत्रा और ययाति परीदा ने एक पर्चे में कहा कि देश के एलएफपीआर में भारी गिरावट के लिए प्रमुख वजह यह है कि लोग लगातार काम न मिलने के चलते निराश होकर भी इस बाजार से बाहर हो जाते हैं। 15 से 29 की उम्र के युवाओं पर ध्यान केंद्रित करते हुए वे कहते हैं कि इस श्रेणी में बेरोजगारों की तादाद सन 2004-05 के 7 करोड़ से बढ़कर 2017-18 में 10 करोड़ हो गई। रोजगार से विमुख श्रमशक्ति को ध्यान में रखें तो करीब 24 करोड़ की समायोजित श्रम शक्ति में से 12.5 करोड़ लोग बेरोजगार निकलेंगे। इस तरह देखें तो सन 2017-18 में समायोजित युवा बेरोजगारी का स्तर 52 फीसदी पहुंच जाएगा। 
 
बीते समय के दौरान क्षेत्रवार रोजगार हिस्सेदारी का दायरा भी दिखाता है कि श्रम शक्ति कम उत्पादकता वाले कृषि क्षेत्र से अधिक उत्पादकता वाले औद्योगिक और आधुनिक सेवाओं का रुख कर रहा है। इसके बावजूद सन 2017-18 में देश के कुल रोजगार में कृषि की हिस्सेदारी 44 फीसदी है। यह तमाम अन्य जी-20 देशों से अधिक है। इससे भी बुरी बात यह कि निर्माण सहित उद्योग जगत की हिस्सेदारी 2011-12 और 2017-18 के बीच ठहरी रही। सबसे निराश करने वाली बात यह कि विनिर्माण की हिस्सेदारी 2004-05 और 2017-18 के बीच 12 फीसदी पर स्थिर रही।
 
राष्ट्रीय रोजगार में स्वरोजगार और आंशिक श्रमिकों की हिस्सेदारी आज भी 80 फीसदी है। यह कई वजहों से चिंतित करने वाली बात है। इन श्रेणियों को अक्सर व्यापक कार्य साझेदारी व्यवस्था से परिभाषित किया जाता है और बेरोजगारी से जोड़ा जाता है। इनमें कम औसत आय होने का खतरा भी रहता है। कई दफा तो यह न्यूनतम राष्ट्रीय आय के औसत से भी कम रहता है।
 
सकारात्मक पहलू को देखें तो रोजगार में नियमित वेतन वाले कर्मचारियों की हिस्सेदारी 2004-05 के 14.4 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 22.8 फीसदी हो गई है। गैर कृषि क्षेत्र में बिना किसी लिखित अनुबंध के नियमित वेतन वाले कर्मियों की तादाद 2004-05 के 59 फीसदी से बढ़कर 2017-18 में 71 फीसदी हो गई है। 
 
संक्षेप में कहा जाए तो देश में रोजगार की स्थिति बीते 15 वर्ष में बेहद खराब हुई है। आज यानी सन 2019-20 के मध्य में हालात वाकई खराब है क्योंकि आर्थिक वृद्धि में नाटकीय गिरावट दर्ज की गई है। उपरोक्त रुझान को बदलने के लिए क्या किया जा सकता है? इस समस्या को हल करने की ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं है। हकीकत तो यह है कि वास्तव में नीतिगत और कार्यक्रम आधारित कमियों को दूर करने का कोई विकल्प नहीं है। जब तक हम इस दिशा में गंभीर प्रगति नहीं करेंगे तब तक बेरोजगारी, अल्परोजगार आदि में इजाफा होता रहेगा, श्रमिक हतोत्साहित होते रहेंगे और रोजगार की असुरक्षा बढ़ती रहेगी। इन बातों का देश की आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक समरसता पर बुरा असर होगा।
 
(लेखक इक्रियर के मानद प्रोफेसर और भारत सरकार के पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार हैं। लेख में व्यक्त विचार निजी हैं)
Keyword: india, Unemployment,,
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