बिजनेस स्टैंडर्ड - एनएसओ सर्वेक्षण जारी करने की मांग
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एनएसओ सर्वेक्षण जारी करने की मांग

सोमेश झा / नई दिल्ली November 21, 2019

दुनियाभर के 200 से अधिक प्रख्यात अर्थशास्त्रियों और विद्वानों ने आज एक बयान जारी कर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सरकार से आग्रह किया कि वह रद्दी की टोकरी में डाली गई राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) की 2017-18 की उपभोक्ता खर्च सर्वेक्षण रिपोर्ट जारी करे। अर्थशास्त्रियों ने सरकार की इस बात से सहमति जताई कि एनएसओ का सर्वेक्षण राष्ट्रीय लेखों के समष्टि आर्थिक अनुमानों से अलग रुझान दिखा सकता है। लेकिन उन्होंने कहा कि आंकड़ों को सार्वजनिक करने के बाद विसंगतियों की वजहों की पहचान की जा सकती है और उन्हें दूर किया जा सकता है। 
 
इन अर्थशास्त्रियों ने गुरुवार को एक पत्र में कहा, 'वस्तुओं की आपूर्ति और घरेलू खपत के आंकड़ों में विसंगति आपूर्ति पक्ष से संबंधित आंकड़ों पर सवालों की तरफ इशारा करती है। ऐसे में सर्वेक्षण के तरीकों में सुधार करने की जरूरत है।' इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले जाने-माने अर्थशास्त्रियों में नोबेल पुरस्कार विजेता एंगस डीटन, फ्रांस के अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी, ऑक्सफर्ड यूनिवर्सिटी की अवकाश प्राप्त प्रोफेसर बारबरा हैरिस-व्हाइट, योजना आयोग के पूर्व सदस्य अभिजित सेन और ए वैद्यनाथन आदि शामिल हैं। 
 
बिज़नेस स्टैंडर्ड ने शुक्रवार को रिपोर्ट प्रकाशित की थी कि एनएसओ के घरेलू खपत के मुख्य संकेतक सर्वेक्षण के मुताबिक वर्ष 2011-12 से 2017-18 के बीच उपभोक्ता खर्च में 3.7 फीसदी गिरावट आई है। इसमें चार दशकों में पहली बार गिरावट आई है। यह सर्वेक्षण जुलाई 2018 से जून 2019 के बीच किया गया था और एक विशेषज्ञ समिति ने 19 जून 2019 को इसे तत्काल जारी करने की मंजूरी दी थी। इस खबर के बाद सांख्यिकी मंत्रालय ने एक बयान जारी किया। इसमें कहा गया कि उसने 'आंकड़ों की गुणïवत्ता' से संबधित दिक्कतों के कारण सर्वेक्षण को रद्दी की टोकरी में डालने का फैसला किया है। मंत्रालय ने कहा कि सर्वेक्षण रद्द करने की मुख्य  वजह यह है कि इसके और राष्ट्रीय खातों के आंकड़ों में विसंगति है। 
 
ऐसा पहली बार हुआ है जब सरकार ने एनएसओ का सर्वेक्षण जारी नहीं करने का फैसला किया है। एनएसओ को पहले राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के नाम से जाना जाता था और इस सांख्यिकी संस्था का गठन 1950 में हुआ था। बयान में कहा गया है, 'यह देश के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है कि सांख्यिकी संस्थानों को राजनीतिक दखल से स्वतंत्र रखा जाए और उन्हें सभी आंकड़े स्वतंत्र रूप से जारी करने की मंजूरी हो। इस पैमाने पर मौजूदा सरकार का रिकॉर्ड बहुत खराब रहा है।'
 
इस सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल के आखिर में 2017-18 के आïवधिक श्रम बल सर्वेक्षण को पांच महीने तक रोके रखा था। इस सर्वेक्षण में दर्शाया गया था कि देश में बरोजगारी की दर 6.1 फीसदी पर पहुंच गई है, जो 45 साल का सर्वोच्च स्तर है। इस सर्वेक्षण को भारत की सांख्यिकी प्रणाली को संभालने वाली स्वायत्त संस्था राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी) ने दिसंबर 2018 में मंजूरी दी थी। लेकिन सर्वेक्षण को संसदीय चुनावों के नतीजों की घोषणा के बाद मई 2019 में जारी किया गया। सरकार के आंकड़े जारी नहीं करने के कारण एनएससी के दो सदस्यों ने इस्तीफा दे दिया था। इन दो सदस्यों में एनएससी के चेयरमैैन पीसी मोहनन भी शामिल थे। 
 
अर्थशास्त्रियों ने कहा, 'अब तक भारत अपनी सांख्यिकी प्रणाली को लेकर गर्व का अनुभव करता था और एनएसएसओ के नमूना सर्वेक्षण इसके बेहतर उदाहरण हैं। भारत बाकी दुनिया के लिए एक मॉडल था।' उन्होंने कहा है कि सरकार ने भारत के प्रतिष्ठित संस्थान पर हमला करने का फैसला इसलिए लिया है क्योंकि सर्वेक्षणों के नतीजे अर्थव्यवस्था को लेकर उसके नारों से मेल नहीं खाते हैं। इस बयान के मुताबिक, 'आवश्यक आंकड़ों को दबाना जवाबदेही और यह सुनिश्चित करने में बाधक है कि नागरिकों को संग्रहीत आधिकारिक आंकड़ों का लाभ मिले, जिनमें उनके कर का पैसा खर्च होता है। यह स्थिति सरकार के लिए भी प्रतिकूल है क्योंकि इससे वह अर्थव्यवस्था के वास्तविक रुझानों को लेकर अंधेरे में रहेगी और उचित नीतियां नहीं बना सकेगी।' इस पत्र पर दस्तखत करने वाले अन्य लोगों में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के कई प्रोफेसर, राजनीतिक विज्ञानी क्रिस्टोफी जैफरलॉट और स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव शामिल हैं। 
Keyword: NSO, MPCI, rural, survey,,
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