बिजनेस स्टैंडर्ड - आर्थिक स्थिति को लेकर श्वेत पत्र जारी करने की जरूरत
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आर्थिक स्थिति को लेकर श्वेत पत्र जारी करने की जरूरत

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  November 20, 2019

देश की अर्थव्यवस्था ऐसे दौर से गुजर रही है जहां एक अदद अच्छी खबर तलाश करना मुश्किल है। आर्थिक वृद्धि में धीमापन है। निर्यात में गिरावट आ रही है, खुदरा मुद्रास्फीति बढ़ रही है, रोजगार बढ़ नहीं रहे हैं और बैंक ऋण की वृद्धि कम हुई है। बिजली का उपयोग कम हुआ है और यहां तक कि कर राजस्व में वृद्धि की गति भी धीमी हुई है। कर राजस्व की वृद्धि दर तो बजट में जताए गए अनुमान से काफी कम है। ऐसे में सरकार के लिए चालू वर्ष में राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को हासिल कर पाना मुश्किल है।

 
अर्थव्यवस्था में अहम कारक माने जाने वाले रुझान में भी गिरावट है। हालांकि सरकार ने बीते कुछ सप्ताह के दौरान आवश्यक कदम उठाए हैं। मसलन कॉर्पोरेशन कर की दर में कमी, आवास, अचल संपत्ति, वाहन और निर्यात क्षेत्र को गति प्रदान करने के लिए पैकेज की घोषणा आदि। लेकिन आर्थिक निराशा के दौर से उबरना शेष है। सरकार को क्या करना चाहिए? बताया जाता है कि अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए अभी कई प्रस्ताव विचाराधीन हैं। इनमें बुनियादी क्षेत्र में अतिरिक्त निवेश, आयकर दरों में बदलाव, नीतिगत सुधार और निजीकरण शामिल हैं। इन उपायों से मदद मिलेगी लेकिन उनका असर तात्कालिक नहीं होगा। आर्थिक वृद्घि के आंकड़ों में सुधार सुनिश्चित करने के पहले जरूरी है कि अर्थव्यवस्था की गिरी हुई मनोदशा में सुधार किया जाए। सरकार कुछ उपायों की सहायता से मौजूदा मिजाज बदलने का प्रयास कर सकती है। 
 
पहले बड़े कदम के रूप में सरकार को अर्थव्यवस्था की स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। सरकार तथा थिंकटैंक और रेटिंग एजेंसियों समेत तमाम अन्य संस्थानों के सदस्यों ने समस्या की प्रकृति और अर्थव्यवस्था की चुनौतियों को लेकर अलग-अलग टिप्पणी की है। बाजार और उद्योग जगत इस बात को लेकर स्पष्ट नहीं हैं कि उन्हें किस बात को स्वीकार करना चाहिए और किसे खारिज। अनिश्चितता ने भी अर्थव्यवस्था को लेकर नकारात्मक माहौल तैयार करने में मदद की है।  ऐसे में सरकार के लिए यह उचित समय है कि वह बताए कि देश की अर्थव्यवस्था की वास्तविक स्थिति और संभावनाएं क्या हैं? ऐसा दस्तावेज सहज तैयार किया जा सकता है। यदि यह काम किसी स्वतंत्र अर्थशास्त्री को सौंपा जाता है तो इसकी विश्वसनीयता में इजाफा होगा। वह अपनी रिपोर्ट सरकारी अर्थशास्त्रियों, विशेषज्ञों और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों की सहायता से तैयार कर सकता है। वर्ष 2012 में विजय एल केलकर द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट को याद कीजिए। आज देश को वैसी ही एक रिपोर्ट की आवश्यकता है।
 
इससे सरकार से सरकार को अगले 11 सप्ताह में पेश किए जाने वाले बजट से जुड़े अनुमानों का प्रबंधन करने में आसानी होगी। उम्मीदें परवान पर हैं और यदि इन्हें अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति के अनुरूप रखा जाए तो बेहतर होगा। स्वतंत्र विशेषज्ञ की रिपोर्ट मौजूदा हालात सामने रखेगी और आगे की चुनौतियां भी। बजट से पहले पेश की जाने वाली आर्थिक समीक्षा चूंकि बजट से एक-दो दिन पहले आती है इसलिए वह ऐसे अनुमानों का प्रबंधन नहीं कर पाएगी।  रिपोर्ट सरकार के भीतर अपने वित्त से जुड़ी समस्याओं से निपटने का भरोसा पैदा करेगी। इस वर्ष अब तक राजस्व की आवक बताती है कि सरकार 2019-20 में 3.3 फीसदी के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को शायद ही हासिल कर सके। चर्चा है कि सरकार राजकोषीय घाटे के संशोधित आंकड़े और संशोधित बजट से इतर उधारी प्रस्तुत कर सकती है।
 
अर्थव्यवस्था की स्थिति पर पर्चा सामने आने से ऐसी तमाम अटकलबाजी पर रोक लग जाएगी। ये आंकड़े बजट में जारी करने के बजाय बेहतर होगा कि बुरी खबर सामने लाने के लिए श्वेत पत्र का सहारा लिया जाए। इससे बजट में उन नीतियों पर ध्यान केंद्रित करने का अवसर मिलेगा जिनमें सुधार की जरूरत है। इसके साथ ही उसमें जरूरी नए व्यय पैकेज भी पेश किए जा सकेंगे। वित्त मंत्री वित्तीय तंत्र में उत्पन्न तनाव की बात स्वीकार करके तथा अर्थव्यवस्था की स्थिति सुधारने की बात दोहरा कर श्वेत पत्र के प्रयासों का पूरक प्रयास कर सकती हैं।
 
सरकार का दूसरा कदम यह होना चाहिए कि वह आर्थिक मंदी से मुंह न चुराए। कुछ माह पहले एक सरकारी सर्वेक्षण में ही दर्शाया गया था कि अर्थव्यवस्था में रोजगार वृद्घि में भारी गिरावट आई है। सरकार की पहली प्रतिक्रिया में कहा गया कि ये निष्कर्ष सर्वेक्षकों के प्रारंभिक नतीजे हैं। कुछ महीने बाद सरकार ने स्वीकार किया कि वह रिपोर्ट अंतिम थी। कुछ दिन पहले सरकार ने उपभोक्ता व्यय पर अपने ही सर्वे को खारिज करने का निर्णय किया क्योंकि आंकड़ों में कुछ दिक्कत थी। इस व्यय में गिरावट आई थी। ऐसे कदम अर्थव्यवस्था में लोगों और उद्योग जगत के भरोसे को सीमित करते हैं। यदि आंकड़ों में दिक्कत है तो सर्वे को खारिज करने के बजाय इस कमी को दूर करने के प्रयास किए जा सकते हैं। आर्थिक मंदी से निपटने के लिए केवल निवेश बढ़ाना और नीतिगत सुधार करना पर्यापत नहीं है। मंदी के स्वरूप को लेकर लोगों के साथ पारदर्शी संचार और इस दौरान उभरी चुनौतियों से निपटना भी अहम है। पारदर्शी संचार का लक्ष्य केवल तभी हासिल किया जा सकता है जबकि सरकार अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति पर श्वेत पत्र जारी करे और आर्थिक आंकड़ों तथा सर्वे के नतीजों को स्वीकार करे। 
 
नरेंद्र मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अर्थव्यवस्था की स्थिति पर पत्र जारी करने का विचार इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि उनको आशंका थी कि इससे देश की अर्थव्यवस्था में निवेशकों का भरोसा कमजोर होगा। निवेशक अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर पारदर्शिता पसंद करते हैं। आज वे ऐसे किसी भी कदम का स्वागत करेंगे जिसमें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अर्थव्यवस्था को लेकर श्वेत पत्र जारी करें। 
Keyword: india, economy, trade, export,,
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