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मेंडलीफ की आवर्त सारणी 150वें साल में भी अनमोल

तकनीकी तंत्र
देवांग्शु दत्ता /  November 19, 2019

मार्च 1869 में दिमित्री इवानोविच मेंडलीफ ने रशियन केमिकल सोसाइटी के समक्ष एक सारणी पेश की थी। इसे पहली आवर्त सारणी माना जाता है। पहली बार आवर्त सारणी तैयार होने के करीब 150 वर्ष बाद 21वीं सदी में भी इसमें नए तत्त्वों को जोड़ा गया है। यह अविश्वसनीय उपलब्धि थी। मेंडलीफ ने वह सिद्धांत खोज निकाला था जिसे 'पीरियॉडिक लॉ' (आवर्त नियम) के नाम से जाना जाता है। उन्होंने पाया था कि अपने परमाणु भार के क्रम में व्यवस्थित अवयवों को नियमित अंतराल पर समान गुणों के आधार पर एक समूह में रखा जा सकता है।

 
मेंडलीफ की मूल सारणी में केवल 63 तत्त्व ही रखे गए थे। लेकिन उन्होंने यह कहा था कि भविष्य में नए तत्त्वों की तलाश होगी और उनके लिए उन्होंने सारणी में रिक्त स्थान रख छोड़ा था। उन्होंने नए तत्त्वों की रासायनिक संरचना के बारे में भी भविष्यवाणी की थी। इस सारणी को परमाणु भार की गणना के आधार पर तैयार किया गया था जिसे सापेक्षिक परमाणु द्रव्यमान भी कहते हैं। रसायन विज्ञानियों ने 19वीं सदी में समान संख्या वाले विभिन्न तत्त्वों के द्रव्यमान की गणना कर उनकी तुलना सबसे हल्के तत्त्व हाइड्रोजन के भार के अनुपात में की थी। हाइड्रोजन का परमाणु भार 1 दिया गया। इस तरह हाइड्रोजन की तुलना में 12 गुना भारी कार्बन का परमाणु भार 12 हो गया। कार्बन को परमाणु भार के लिए आधुनिक मानक माना जाता है।
 
बाद में हुई खोजें इस समझ की तरफ ले गईं कि अधिकांश हाइड्रोजन परमाणुओं में केवल एक प्रोटॉन होता है। अन्य तत्त्वों का परमाणु भार इससे अधिक होता है क्योंकि उनके परमाणु में प्रोटॉन एवं न्यूट्रॉन की संख्या अधिक होती है। 1930 के दशक में न्यूट्रॉन एवं प्रोटॉन की खोज होने के बाद तत्त्वों को परमाणु द्रव्यमान के बजाय प्रोटॉन की संख्या के आधार पर वर्गीकृत किया जाने लगा। इन दिनों, आवर्त सारणी में परमाणु संख्या का इस्तेमाल किया जाता है जो कि हरेक परमाणु में मौजूद प्रोटॉन की संख्या है।
 
परमाणु संख्या हरेक तत्त्व के लिए अनूठी होती है क्योंकि नाभिक में प्रोटॉन की संख्या समान होगी। एक ही तत्त्व के विभिन्न समस्थानिकों के लिए परमाणु भार अलग-अलग हो सकता है क्योंकि उनमें न्यूट्रॉन की संख्या अलग हो सकती है। जैसे, हाइड्रोजन के प्राकृतिक तौर पर ज्ञात तीन समस्थानिक हैं। ये प्राकृतिक रूप से स्थायी हाइड्रोजन (प्रोटियम), ड्यूटीरियम और ट्राइटियम हैं जिनका सापेक्ष परमाणु द्रव्यमान क्रमश: 1, 2 और 3 होता है। इन सभी समस्थानिकों का परमाणु भार 1 ही है। कई तत्त्वों का प्रकृति में मिल पाना मुश्किल है क्योंकि वे रेडियोधर्मी प्रवृत्ति के होते हैं। रेडियोधर्मी तत्त्व कणों का उत्सर्जन करते हैं और अधिक टिकाऊ तत्त्वों में परिवर्तित हो जाते हैं। कई रेडियोधर्मी तत्त्वों की संक्षिप्त अद्र्ध-आयु होने से वे क्षरण के चलते अधिक टिकाऊ तत्त्वों में बदल जाएंगे।
 
पृथ्वी 4.6 अरब वर्षों से अधिक समय से अस्तित्व में है। ऐसे में धरती पर अपेक्षाकृत संक्षिप्त अद्र्ध-आयु वाले कई तत्त्व मौजूद रहे हो सकते हैं लेकिन उनका इस कदर क्षरण हो चुका है कि अब उन्हें तलाशा नहीं जा सकता है। उच्च रेडियोधर्मिता वाले ऐसे तत्त्वों को अधिक स्थिर तत्त्वों के नाभिक में प्रोटॉन डालकर कृत्रिम रूप से बनाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर मेटनेरियम एक कृत्रिम तत्त्व है जिसकी अद्र्ध-आयु महज 4.5 सेकंड ही है। इसे प्राकृतिक रूप में नहीं पाया जा सकता है। ऑक्सीजन और हाइड्रोजन जैसे समान तत्त्वों के कई समस्थानिकों को प्रयोगशालाओं में पल भर के लिए दिखाई देते हैं क्योंकि उनकी अद्र्ध-आयु एक सेकंड से भी काफी कम होती है। 
 
रसायनशास्त्रियों के नए तत्त्वों की खोज में लगने के साथ ही आवर्त सारणी में खाली स्थान धीरे-धीरे भरता चला गया। हाइड्रोजन (परमाणु संख्या-1) और प्लूटोनियम (94) के बीच के सभी तत्त्व धरती पर प्राकृतिक रूप में मौजूद हैं। लेकिन इनमें से कई तत्त्वों को पहले कृत्रिम तौर पर बनाया गया था और वे प्रकृति में बाद में खोजे गए। सारणी में अमेरिसियम (परमाणु संख्या 95) से लेकर उसके बाद जोड़े गए सभी तत्त्वों को कृत्रिम रूप से बनाना है। संश्लेषण के माध्यम से तलाशा गया पहला तत्त्व टेक्नेटियम (परमाणु संख्या-43) था जिसे वर्ष 1937 में खोजा गया। मेंडलीफ ने इसके वजूद के बारे में अनुमान जताया था और उसे 'इकामैंगनीज' के नाम से संबोधित किया था। प्राकृतिक तौर पर भी यह पाया जाता है। पूरी तरह से कृत्रिम पहला तत्त्व क्यूरियम था जिसे 1944 में प्लूटोनियम पर अल्फा कणों की बारिश कर बनाया गया।
 
हाल ही में खोजा गया तत्त्व टेनेसाइन है जिसकी परमाणु संख्या 117 है। अमेरिका एवं रूस के संयुक्त शोध में यह तत्त्व वर्ष 2010 में खोजा गया। रूस के दुबना में स्थित ज्वाइंट इंस्टीट्यूट फॉर न्यूक्लियर रिसर्च के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम तत्त्व बर्केलियम पर कैल्सियम किरणों की बारिश की तो कैल्शियम के प्रोटॉन बर्केलियम के परमाणु से जुड़ गए। इसी तरह की बौछार से वर्ष 2002 में ओगेनेसॉन (परमाणु संख्या 118) को भी खोजा गया था। परमाणु संख्या 92 से आगे वाले ट्रांस-यूरेनिक तत्त्वों के गुणों के बारे में बहुत कम जानकारी ही उपलब्ध हो सकी है। इसकी वजह यह है कि अधिकांश तत्त्व कृत्रिम हैं और उनकी अद्र्ध-आयु भी बहुत कम होती है। प्रयोगशालाओं में अध्ययन कर उनके रासायनिक गुणों के बारे में पता कर पाना मुश्किल है। इसी के साथ शोधकर्ता परमाणु संख्या 119 और उससे आगे के तत्त्व तलाशने की भी कोशिशों में लगे हुए हैं। इस तरह आवर्त सारणी अपने वजूद के 150वें साल में भी तत्त्वों के वर्गीकरण के लिए एक अनमोल संसाधन बनी हुई है। 
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