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आरसेप को इनकार के बाद एशिया में भारत की भूमिका

अनीता इंदर सिंह /  November 19, 2019

आरसेप समझौते का हिस्सा बनने से भारत का इनकार एक ठोस वैश्विक विनिर्माण आधार बनने का मौका गंवाने जैसा है। इसके तमाम पहलुओं पर रोशनी डाल रही हैं अनीता इंदर सिंह

 
एशिया में भारत किस मुकाम पर खड़ा है? आसियान के एजेंडे में 2012 से ही शामिल क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसेप) का हिस्सा बनने से इनकार के बाद भारत की स्थिति में क्या कोई बदलाव आया है? एशिया-प्रशांत आर्थिक सम्मेलन (एपेक) और प्रशांत-पार समग्र एवं प्रगतिशील भागीदारी समझौता (सीपीटीपीपी) जैसे समूहों का हिस्सा नहीं होने से भारत के पास एशिया के आर्थिक भविष्य को परिभाषित करने वाले गुट को प्रभावित कर पाने का मौका पहले से ही नहीं है। जापान जैसे मित्र देश इसे लेकर फिक्रमंद हैं कि भारत की गैरमौजूदगी से चीन को आरसेप पर दबदबा बनाने और एशिया पर आर्थिक ताकत बनाए रखने की छूट मिल जाती है।
 
आरसेप को लेकर भारत का इनकार एक ठोस वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने के गंवाए हुए मौकों में से एक को दर्शाता है। अर्थशास्त्र एवं सामरिक नीति के अंतर्संबद्ध होने के बाद कितने एशियाई देश ही अब एक वैश्विक शक्ति के तौर पर भारत की छवि को प्रसारित करेंगे? भारत का कहना है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आसियान को केंद्रीय भूमिका हासिल है। लेकिन इसी के साथ हिंद-प्रशांत के बारे में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप की धुंधली अवधारणा से भी भारत इत्तफाक रखता नजर आ रहा है। उसने इस अवधारणा को हिंद महासागर से भी आगे पश्चिमी प्रशांत तक भारत के आर्थिक एवं रक्षा स्वरूप के विस्तार के तौर पर देखा है। हालांकि दक्षिण-पूर्व एवं पूर्व एशियाई समूहों में से किसी भी आर्थिक गुट से बाहर भारत के लिए ऐसा होना एक सपने जैसा ही है।
 
खुद अमेरिका ने भी हिंद-प्रशांत की संकल्पना को लेकर फैला संदेह दूर करने की कोशिश नहीं की है। ट्रंप की 2017 में घोषित राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति (एनएसएस) के मुताबिक, 'हिंद-प्रशांत' चीन के आर्थिक एवं सैन्य उत्थान को काबू में रखने की एक रणनीति है। खुद ट्रंप ने वियतनाम के दा नांग में नवंबर 2017 में संपन्न एपेक के मुख्य कार्याधिकारियों (सीईओ) की बैठक में इस संकल्पना का ऐलान किया था। उस समय उन्होंने हिंद-प्रशांत के केंद्र में रहने के लिए वियतनाम की तारीफ की थी। (ध्यान रखें कि भारत एपेक समूह में भी शामिल नहीं है।) एनएसएस ने एपेक और आसियान को हिंद-प्रशांत का केंद्रीय तत्त्व बताया था। अगर भारत को अमेरिका एक अहम भूमिका निभाते हुए देखता है, तब भी उसने उस समय उसे हिंद-प्रशांत के केंद्र में नहीं रखा था। 
 
असुविधाजनक हकीकत यह है कि भारत अपनी 'ऐक्ट ईस्ट' नीति के तहत जिन देशों के साथ संबंध सशक्त करने की मंशा रखता है, उनका समूह आसियान ट्रंप की हिंद-प्रशांत अवधारणा को नापसंद करता है। उनके लिए इस संकल्पना से 'एशिया' को बाहर रखना आसियान की केंद्रीयता को नजरअंदाज करता है लिहाजा वे सदस्य देशों पर असर डालने वाली किसी भी रणनीति पर सशंकित हैं। आसियान ने गत जून में हिंद-प्रशांत को लेकर अपनी संकल्पना पेश की थी जिसमें एशिया-प्रशांत और हिंद महासागर क्षेत्रों को एक व्यापक आर्थिक चश्मे से देखने की बात कही गई। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही एशिया-प्रशांत का अमेरिका के दोस्त एवं सहयोगी बनने वाले दक्षिण-पूर्व एशियाई एवं पूर्व एशियाई देशों के लिए ऐतिहासिक अर्थ रहा है। आसियान की इस संकल्पना में भारत का उल्लेख नहीं है। असल में, अमेरिका एवं उसके एशियाई दोस्त लंबे समय से भारत को दक्षिण एशियाई देश ही मानते रहे हैं।
 
अमेरिका के सबसे सशक्त एशियाई सहयोगी जापान एवं दक्षिण कोरिया भी हिंद-प्रशांत पर बंटे हुए नजर आते हैं। वैसे जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ने ही इस शब्दावली को नाम दिया था लेकिन 1910-45 के दौरान कोरिया पर जापानी कब्जे के इतिहास और इस साल दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध छिडऩे से दक्षिण कोरिया को जापान पर भरोसा नहीं है और अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया एवं भारत के साथ जापान को जोडऩे की जापानी पहल को समर्थन देने में उसे अधिक लाभ नहीं दिखता है। चीन के अग्रणी कारोबारी साझेदार होने और उत्तर कोरिया पर सर्वाधिक बढ़त रखने वाला देश होने के नाते दक्षिण कोरिया अमेरिका एवं चीन के बीच तनी हुई रस्सी पर चलता है।
 
यह सच है कि आसियान के देश सीमा का विस्तार करने की चीन की नीति को लेकर सशंकित रहते हैं लेकिन वे व्यापार एवं निवेश के लिए काफी हद तक उस पर निर्भर भी हैं। लिहाजा वे ऐसी स्थिति में नहीं फंसना चाहते हैं कि उन्हें अमेरिका एवं चीन में से किसी एक को चुनना पड़े। खुद भारत को भी अमेरिका के साथ मजबूत भागीदारी की चाहत एवं चीन के साथ रिश्ते को स्थायित्व देने की जरूरत के बीच संतुलन साधना होगा। अर्थशास्त्र दक्षिण-पूर्व एवं पूर्व एशिया के साथ भारत के रिश्तों का एक अहम अवयव है। इन क्षेत्रों में भारत ने जापान, ऑस्ट्रेलिया, कई आसियान देशों और अमेरिका के साथ अपने रक्षा संबंधों को मजबूत बनाया है। लेकिन क्या इन रिश्तों ने भारत को प्रशांत क्षेत्र की एक ताकत बना दिया है? बमुश्किल ऐसा है। चीन एशिया की सबसे सशक्त सैन्य ताकत होने के साथ ही आसियान देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। चीन का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) आकार करीब 15 लाख करोड़ डॉलर है जबकि भारत का आकार तीन लाख करोड़ डॉलर है। इसी तरह चीन का रक्षा व्यय करीब 250 अरब डॉलर है जबकि भारत रक्षा पर 66 अरब डॉलर खर्च करता है। आसियान के साथ चीन 288 अरब डॉलर का कारोबार है जबकि भारत का कारोबार 142 अरब डॉलर है। आसियान सदस्यों के उलट भारत ने चीन की अंतर-महाद्वीपीय निर्माण परियोजना बेल्ट एवं रोड पहल से खुद को अलग रखा हुआ है। अकेला यही तथ्य बता देता है कि भारत और आसियान देश चीन से निपटने के तरीके और आरसेप को लेकर क्यों असहमत हैं? 
 
एक अन्य स्तर पर अर्थशास्त्र एवं सैन्य शक्ति का सम्मिलन यह बताता है कि भारत प्रशांत क्षेत्र में अपनी सैन्य ताकत का उस तरह से विस्तार करने में असमर्थ है जिस तरह से चीन ने हिंद महासागर क्षेत्र में अपना आर्थिक एवं सैन्य आभामंडल स्थापित किया है। जब चीन हिंद महासागर और भारत के पड़ोस में अपनी मौजूदगी बढ़ाता है तो भारत की आर्थिक एवं नौसैनिक शक्ति चीन का मुकाबला नहीं कर पाती है। दुनिया के सबसे बड़े व्यापार समझौते आरसेप से अलग रहने का भारत का फैसला भी इस करार के समर्थकों को आगे बढऩे से नहीं रोक पाएगा। असल में, इस समझौते का हिस्सा बनने पर चीन के आयातित माल से भारतीय बाजार के पट जाने की आशंका ही यह दर्शाती है कि भारत अपनी आर्थिक कमजोरियों से सही तरह से नहीं निपट पाया है। यह उसके संरक्षणवादी रुख और लालफीताशाही पर लगाम लगाने में नाकामी के रूप में नजर आता है। क्या संरक्षणवादी भारत आसियान के अधिकांश देशों, जापान एवं दक्षिण कोरिया से कम जीडीपी होते हुए भी एक सशक्त एशियाई शक्ति के रूप में आश्वस्ति का भाव दिखा सकता है? और आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के अंतर्संबद्ध होने से भारत को क्या वास्तव में एशिया में उदीयमान चीन के बरक्स एक संतुलन साधने वाली भूमिका में देखा जा सकता है? भारत को इन मुश्किल सवालों के जवाब तलाशने ही होंगे।
 
(लेखिका सेंटर फॉर पीस ऐंड कॉन्फ्लिक्ट रिजॉल्यूशन, नई दिल्ली की संस्थापक प्रोफेसर हैं)
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