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तत्काल समाधान जरूरी

संपादकीय /  November 19, 2019

देश के राजनेताओं में आम जनता की समस्याओं को राजनीतिक मुद्दा बना देने की क्षमता है जिससे समस्या का समाधान असंभव सा हो जाता है। भारतीय मानक ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट से पता चलता है कि देश की राजधानी में पेयजल की गुणवत्ता बेहद खराब हो चुकी है। इस रिपोर्ट ने भी एक नए राजनीतिक विवाद को जन्म दे दिया है और अब ध्यान समस्या का समाधान तलाश करने से दूर हो चुका है। गत सप्ताह आई इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के 21 राज्यों की राजधानियों में नई दिल्ली का पेयजल सर्वाधिक असुरक्षित है। दिल्ली सभी 19 मानकों पर विफल रहा जबकि मुंबई (एक भी नाकामी नहीं), भुवनेश्वर और हैदराबाद (एक-एक कमी) के साथ शीर्ष तीन स्थानों पर रहे।  किसी भी जवाबदेह राज्य प्रशासन के लिए यह रिपोर्ट कुछ गंभीर आत्मावलोकन के अवसर लेकर आती है। निश्चित रूप से यह प्रदेश की सत्ताधारी आम आदमी पार्टी (आप) के लिए भी अच्छी बात नहीं है। आप के लिए तो यह रिपोर्ट खासतौर पर शर्मिंदा करने वाली है क्योंकि यह मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के 2015 के उस विवादास्पद कदम को खारिज करती है जिसके तहत उन्होंने नि:शुल्क या भारी रियायत पर पानी उपलब्ध कराने की बात कही थी। इसके विरोध में एक वरिष्ठ अफसरशाह ने इस्तीफा भी दिया था। इस वर्ष के आरंभ में प्रदेश सरकार ने पानी के बिल का पूरा बकाया माफ करने की घोषणा कर हालात और जटिल बना दिए।

 
वास्तव में बीते पांच वर्षों से दिल्ली सरकार नागरिकों को प्रदूषित पानी वितरित करती आई है। जल उपचार संयंत्रों में निवेश करना तथा जल संरक्षण के उपाय अपनाना कहीं अधिक सटीक हल है लेकिन शायद यह तीन महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनावों की दृष्टि से उपयुक्त न हो। परंतु जिस तरह अधिकांश राजनेता अपने ही बुने लोकलुभावन जाल में फंस जाते हैं, केजरीवाल ने भी आक्रामक तरीके से रिपोर्ट को नकारने का रुख अपनाया है। उन्होंने इस रिपोर्ट को गलत और राजनीति से प्रेरित बताया है। उन्होंने न केवल सरकार की मानक तय करने वाली संस्था के प्रति अविश्वास दर्शाया है बल्कि वह यह भी नहीं बता सके कि आखिर अन्य विपक्षी दलों द्वारा शासित राज्यों की राजधानियों का प्रदर्शन दिल्ली से बेहतर कैसे है। बेहतर होता अगर वह मानक ब्यूरो की रिपोर्ट को स्वीकार कर लेते और प्रशासन के साथ मिलकर तंत्र की खामियां दूर करने की दिशा में प्रयास करते।
 
उपभोक्ता मामलों के केंद्रीय मंत्री राम विलास पासवान भी हालात को संभाल नहीं पाए और उन्होंने एक चुनौती के माध्यम से पूरे प्रकरण का राजनीतिकरण करने का प्रयास किया। पासवान ने अधिकारियों की एक संयुक्त टीम के माध्यम से दिल्ली के पेयजल की दोबारा जांच कराने की बात कही। यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसा करने की क्या आवश्यकता है। हालांकि केजरीवाल ने इसे स्वीकार करते हुए अपनी तरफ से प्रतिस्पर्धी चुनौती सामने रख दी है। यह विचित्र है कि दो ऐसे राजनेता जो इस समस्या को हल करने की स्थिति में हैं, वे इस प्रकार आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं जबकि दिल्ली के गरीब नागरिक गंदा और संक्रमित पानी इस्तेमाल करने को विवश हैं। अमीरों के पास जल उपचारित करने वाले उपकरण खरीदने की क्षमता है। विडंबना यह है कि कुछ महीनों में नेता इन्हीं गरीबों के पास वोट मांगने पहुंचेंगे। वायु प्रदूषण की तरह पानी की गुणवत्ता को लेकर छिड़ी राजनीतिक लड़ाई नेतृत्व के दिवालियेपन को ही दर्शाती है। पासवान शायद इस रिपोर्ट के आप की चुनावी संभावनाओं पर असर को देख रहे होंगे लेकिन जब उनकी ही सरकार के 2024 तक पूरे देश को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने के वादे की बारी आती है तब उनको समग्रता में जोखिम का आकलन करना होगा। उन्हें पता चलेगा कि वायु प्रदूषण और जल प्रदूषण राजनीतिक मुद्दे नहीं हैं।
Keyword: delhi, water, BIS,,
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