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चीन की वायु सेना के लंबे सफर पर एक नजर

दोधारी तलवार
अजय शुक्ला /  November 18, 2019

एक अक्टूबर, 1949 को जब माओ त्से तुंग ने पेइचिंग में चीनी गणराज्य की स्थापना की घोषणा की थी तब चीन के पास केवल 17 सैन्य विमान थे। इनमें नौ लड़ाकू विमान, दो बमवर्षक, तीन मालवाहक, एक संचार और दो प्रशिक्षण विमान शामिल थे। देश की जनता को यह अहसास कराने के लिए कि उनके पास एक सक्षम वायुसेना है, इनमें से प्रत्येक विमान ने थ्येन आन मन चौक के ऊपर से दो-दो बार उड़ान भरी। अगले महीने 11 नवंबर, 1949 को माओ ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (वायु सेना) को अलग सेवा घोषित किया।

 
पीएलए (एएफ) में अब 4 लाख से अधिक जवान और 2,000 से अधिक लड़ाकू विमान हैं। यह भारतीय वायु सेना से तीन गुना से अधिक बड़ी है। पिछले दिनों पीएलए (एएफ) ने एक वीडियो जारी किया जो उसकी 70वीं वर्षगांठ के मौके पर बनाया गया है। इसमें अधिकांशतया वे विमान शामिल थे जो चीन में बने हैं। इनमें पांचवीं पीढ़ी के जे-20 लड़ाकू विमान, जे-16 शेनयांग लड़ाकू विमान (सुखोई का उन्नत रूप), एच-6एन सामरिक बमवर्षक (तंगफेंग 21डी बैलिस्टिक मिसाइल दाग सकता है), वाई-20 परिवहन विमान जो 66 टन भार ले जा सकता है और केजे-200 हवाई चेतावनी तंत्र शामिल थे।
 
सन 1962 का भारत-चीन युद्ध पूरी तरह जमीन पर लड़ा गया था। किसी पक्ष ने वायु सेना या नौसेना का प्रयोग नहीं किया था। परंतु आज यदि जंग होती है तो उसमें चीनी वायु सेना की अहम भूमिका होगी। ऐसे में उसके अब तक के सफर पर एक नजर डालना लाजिमी है। सन 1949 में शुरुआत के बाद पीएलए (एएफ) को कोरियाई युद्ध से मदद मिली। उस वक्त स्टालिन और माओ के बीच समझौता हुआ कि रूस चीन को ढेर सारे मिग-15 देगा और चीनी विमान चालकों तथा तकनीशियनों को इन्हें उड़ाने और रखरखाव का प्रशिक्षण देगा। बदले में चीन कोरिया में संयुक्त राष्ट्र गठजोड़ के खिलाफ रूस की मदद करेगा। सन 1950 से 1953 के बीच दोनों पक्षों के सैकड़ों विमान और विमान चालक मारे गए। इनमें दर्जनों रूसी विमान चालक शामिल थे जो उत्तर कोरियाई वर्दी में थे। रूस से आगे मिग-15 को मिग-17, मिग-19 और मिग-21 में बदला। चीन के पास इन्हें बनाने का लाइसेंस था। इस बीच अमेरिकी वायु सेना ने सुपरसोनिक एफ-86 का उन्नत संस्करण तैयार किया जिसका इस्तेमाल पाकिस्तान ने सन 1965 और 1971 में भारत के खिलाफ किया।
 
उस वक्त के दस्तावेज बताते हैं कि जब स्टालिन ने अमेरिकी वायु सेना के साथ हवाई युद्घ में उलझने की चीन की अनिच्छा को लेकर शिकायत की तो माओ ने कहा कि वह कोरिया के साथ जंग में लाखों चीनी योद्घा गंवाने को तैयार है लेकिन वह अपनी नई वायु सेना को दांव पर लगाने को तैयार नहीं। ध्यान देने वाली बात है कि चीन की नई वायु सेना के पास जंग का अनुभव नहीं था और वह अमेरिकी वायु सेना जैसी सिद्घ हस्त शक्ति के समक्ष तैयार नहीं थी। कोरियाई युद्घ के बाद चीन और सोवियत संघ के अलगाव के कारण तीव्र पराभव का दौर आया। माओ के निधन के बाद तंग श्याओ फिंग ने पीएलए में सुधार शुरू किया। कम्युनिस्ट पार्टी के अंदरूनी लोगों का कहना है कि सन 1979 में वियतनाम पर हमले के मूल में पीएलए की कमियों को उजागर करना ही था। चीन की वायु सेना ने ब्रिटेन द्वारा फॉकलैंड पर आक्रमण और इजरायल द्वारा लेबनान की बेक्का घाटी में सीरियाई हवाई रक्षा तंत्र को ध्वस्त करने से भी सबक लिया। तंग को हवाई क्षमता की महत्ता का अंदाजा था। उन्होंने वायु सेना को जमीनी अभियानों का सहयोग करने पर ध्यान केंद्रित करने को कहा ताकि स्वतंत्र नीति निर्माण की शुरुआत हो सके। 
 
सन 1991 के खाड़ी युद्घ में अमेरिका की सफलता के बाद चीन की सेना ने उच्च तकनीक वाले सीमित युद्घ पर ध्यान केंद्रित किया। इसके बाद 2004 के श्वेत पत्र में मौजूदा सिद्घांत को अपनाया गया। यहां डिजिटली एकीकृत सेंसर्स के साथ रियल टाइम संचार की बात शामिल है। इससे सटीक निशाना लगाने में मदद मिलती है। भारत के साथ भविष्य की किसी लड़ाई में चीनी वायु सेना की क्या भूमिका हो सकती है? यहां तिब्बत के पठार की अहम भूमिका होगी जो दोनों देशों के बीच 1,000-2,000 किलोमीटर का बफर क्षेत्र बनाता है। दक्षिण चीन के चेंगदू और कुनमिंग से उड़ान भरने वाले चीनी विमानों को असम पहुंचने में एक तरफ से 1,000 किमी का सफर तय करना होगा। चीनी वायु सेना को तिब्बत से उड़ान भरनी होगी। उसने ल्हासा, गोलमुड, नींगची और शिगात्से आदि में हवाई अड्डे बनाए हैं। ये भारत से काफी करीब हैं। ल्हासा तो तेजपुर से बमुश्किल 400 किमी है। परंतु यहां से उड़ान भरने पर उन्हें हथियारों के मोर्चे पर सीमित रहना होगा। इससे निजात पाने के लिए उनको हवा में ईंधन भरने की क्षमता की आवश्यकता होगी लेकिन ऐसा करते हुए वे भारतीय रडार की जद में आ सकते हैं। 
 
भारतीय वायु सेना की प्रतिक्रिया का समय और क्षमता कम करने के लिए पीएलए को तेजपुर, बागडोगरा और हाशीमारा के भारतीय वायु क्षेत्र में क्रूज और बैलिस्टिक मिसाइल से हमला करना होगा। इसके साथ ही भारतीय वायुसेना के निगरानी नेटवर्क, सैटेलाइट संचार और कमांड तथा कंट्रोल सिस्टम पर साइबर प्रहार करना होगा। ऐसा करके न केवल चीनी वायु सेना की राह आसान होगी बल्कि चीन भारत पर हमले का इस्तेमाल वैश्विक स्तर पर अपनी श्रेष्ठता दर्शाने के लिए भी कर सकता है। सन 1950 के दशक में लाल सेना के मार्शल झू दे ने कहा था, 'हम कैसा युद्घ लड़ेंगे यह इस बात पर निर्भर है कि हमारे हथियार कैसे होंगे।' चीन अब वैसे हथियार बनाने में व्यस्त है जो उसकी युद्घ संबंधी जरूरतों के लिए बेहतर हों। सन 1999 में करगिल जंग की आशंका के बीच तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वी पी मलिक बहादुरी पूर्वक मार्शल झू की बातें दोहरा रहे थे। 
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