बिजनेस स्टैंडर्ड - जल परिवहन पर देना होगा अधिक ध्यान
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जल परिवहन पर देना होगा अधिक ध्यान

विनायक चटर्जी /  November 18, 2019

भारत में जल परिवहन में यह क्षमता है कि वह सामान लाने ले जाने की समस्या का समाधान कर सके। इस विषय पर विस्तार से जानकारी दे रहे हैं विनायक चटर्जी 

 
इस वर्ष जनवरी में केंद्रीय नौवहन मंत्री नितिन गडकरी तथा रेल मंत्री पीयूष गोयल ने कांडला बंदरगाह से मंगलूरु और कोच्चि के रास्ते तूतीकोरिन तक के लिए कंटेनर कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (कॉनकॉर)की तटीय माल नौवहन सेवा को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था। यहां प्रयोग किए गए प्रतीक अत्यंत अहम हैं। कॉनकॉर भारतीय रेल की कंपनी है जो स्पष्ट रूप से तटीय नौवहन के लिए बनाई गई है। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि दो केंद्रीय मंत्री (दो ऐसे मंत्री जो अहम बुनियादी क्षेत्रों के परिवहन को निर्धारित करते हैं) इस अवसर पर उपस्थित थे। इससे पता चलता है कि दो अलग-अलग तरह के परिवहन के आपसी संबंधों को किस कदर महत्ता दी जा रही है।
 
सितंबर में कॉनकॉर ने आंध्र प्रदेश के कृष्णापत्तनम बंदरगाह से बंगलादेश के चटगांव बंदरगाह तक माल नौवहन सेवा की शुरुआत की। इसके बाद सन 2018 में दोनों देशों के अधिकांश बंदरगाहों को दायरे में लाने के लिए इनलैंड वाटर ट्रांजिट ऐंड ट्रेड प्रोटोकॉल की शुरुआत हुई। ये कदम अपने आप में छोटे हैं लेकिन लॉजिस्टिक्स के क्षेत्र में बन रही व्यापक योजना की दृष्टि से ये काफी मायने रखते हैं। सड़क तथा रेल के अलावा अन्य मार्गों से माल ढुलाई की सुविधा लागत कम करने तथा भारतीय वस्तुओं को विश्व बाजार में अधिक से अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने की दृष्टि से अहम है। अब तक जल मार्गों के इस प्रयोग पर ध्यान नहीं दिया गया था।
 
सड़क मार्ग से माल वहन की लागत प्रति टन किलोमीटर 2.58 रुपये पड़ती है जबकि रेल से यह 1.41 रुपये प्रति टन-किमी और जलमार्ग से 1.06 रुपये प्रति टन-किमी पड़ती है। इसके बावजूद देश में मालवहन का अधिकांश हिस्सा यानी करीब 60 फीसदी हिस्सा सड़क मार्ग के माध्यम से ढोया जाता है। चीन में मालवहन में सड़क की हिस्सेदारी 24 प्रतिशत और जर्मनी में महज 11 प्रतिशत है। सड़क मार्ग पर जरूरत से अधिक निर्भरता के कारण हमारे देश में किसी उत्पाद के अंतिम मूल्य में लॉजिस्टिक्स की हिस्सेदारी 18 प्रतिशत तक है। विकसित देशों में यह बमुश्किल 9 से 10 प्रतिशत है। इतना ही नहीं सड़क परिवहन की तुलना में जलमार्ग से होने वाले परिवहन में प्रदूषण भी अत्यंत कम होता है।
 
ऐसे बदलाव की आवश्यकता सरकार बहुत लंबे समय से महसूस कर रही थी। वर्ष 2015 में उसने महत्त्वाकांक्षी सागरमाला परियोजना की शुरुआत की थी। इस परियोजना के तहत जलमार्गों में मालवहन की सुविधा विकसित करने का लक्ष्य रखा गया। इस परियोजना में नए बंदरगाहों का विकास करना, बंदरगाहों का आपसी संपर्क कायम करना और उनके आसपास औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ावा देना शामिल था।  इस प्रकार का संचार स्थापित करना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जलमार्गों के इस्तेमाल से लागत में होने वाली बचत गंवाई जा सकती है अगर जहाजों को टर्मिनलों पर खड़े होकर माल को ट्रक या रेल से जहाज पर पहुंचाए जाने की प्रतीक्षा करनी पड़ी।
 
चूंकि सागरमाला परियोजना की शुरुआत के बाद से कई अन्य सुधार भी शुरू किए गए हैं। केंद्रीय सड़क फंड अधिनियम में 2017 में संशोधन किया गया ताकि कुल संग्रहीत फंड के 2.5 फीसदी हिस्से का इस्तेमाल जलमार्ग विकास के लिए किया जाए। भारत में इस वक्त 14,500 किमी ऐसा जलमार्ग है जिस पर परिवहन किया जा सकता है। गत वर्ष के आरंभ में भारत सरकार ने नियमों को शिथिल करके विदेशी कंटेनर जहाजों को स्थानीय तटीय मार्गों पर माल ढुलाई करने की अनुमति दे दी थी।  सरकार ने 1,500-2,000 टन भारवहन वाले जहाजों के नौवहन को लेकर जल मार्ग विकास परियोजना तैयार की है ताकि राष्ट्रीय जलमार्ग-1 में हल्दिया से वाराणसी के बीच वाणिज्यिक परिवहन हो सके। इस परियोजना की लागत 5,369 करोड़ रुपये है। 
 
अनुमान है कि यह परियोजना 2023 तक पूरी हो जाएगी। कॉनकॉर के रूप में तटीय नौवहन की शुुरुआत के चंद महीने पहले इस क्षेत्र में उस समय एक बड़ी उपलब्धि हासिल की गई जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी में एमवी रवींद्रनाथ टैगोर नामक जहाज का स्वागत किया। इस जहाज में पेय पदार्थ बनाने वाली कंपनी पेप्सी का 16 ट्रक माल कोलकाता से ढो कर लाया गया था। चार वर्ष की अवधि में सागरमाला परियोजना में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है। सरकार का दावा है कि सितंबर तक इस योजना के अधीन 31,447 करोड़ रुपये मूल्य की 125 परियोजनाएं पूरी हो चुकी हैं। इसमें एन्नोर और मुंद्रा बंदरगाहों पर एलएनजी टर्मिनल (प्रत्येक की लागत करीब 5,000 करोड़ रुपये) और 6,600 करोड़ रुपये की लागत से जेएनपीटी बंदरगाह का उन्नयन शामिल हैं। परंतु अभी भी यह शुरुआती दौर है क्योंकि कुल मिलाकर 5.7 लाख करोड़ रुपये मूल्य की 1,314 परियोजनाएं अभी भी पाइपलाइन में हैं। 
 
गत वर्ष सामने आए क्रिसिल के जगन्नारायण पद्मनाभन और सुदीप्त साहा के एक अनुमान के मुताबिक अगले कुछ वर्षों में जल परिवहन क्षेत्र में तकरीबन 90,000 करोड़ रुपये का निवेश करना होगा। लेखकों ने जल परिवहन को प्रोत्साहन देने के लिए कर सब्सिडी देने की बात की थी। साथ ही जमीन पर स्थित टर्मिनलों पर कार्गों के किफायती निपटान की बात भी इसमें शामिल थी। राष्ट्रीय जलमार्गों के आसपास स्थित उद्योगों को प्रोत्साहन देने को भी एक विकल्प बताया गया है। दूसरी ओर सरकार कोयला तथा अन्य ज्वलनशील पदार्थों के सड़क मार्ग से परिवहन पर भारी भरकम कर भी लगा सकती है। ऐसा करके वह ट्रांसपोर्टरों को लंबी दूरी के सफर के लिए जलमार्गों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है। बहुत लंबे समय तक ध्यान इस बात पर केंद्रित था कि नौवहन कंपनियों को सड़क से रेल मार्ग की ओर स्थानांतरित किया जाए। परंतु सागरमाला परियोजना में निवेश बढऩे तथा तमाम अन्य जरूरी नीतिगत बदलावों को मंजूरी मिलने के साथ ऐसा प्रतीत हो रहा है कि वास्तव में जलमार्ग एक ऐसा क्षेत्र है जिसकी अनदेखी की जाती रही है। अब इस पर वह ध्यान दिया जा रहा है जिसके वे हकदार हैं। परंतु इस दिशा में और जोरदार तरीके से प्रयास करने की आवश्यकता है। 
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