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म्युचुअल फंडों ने की फेमा रिपोर्टिंग में चूक

ऐश्ली कुटिन्हो / मुंबई November 17, 2019

विदेशी स्वामित्व अथवा नियंत्रण वाले एक भी म्युचुअल फंड ने करीब एक महीना पहले अधिसूचित नए विदेशी विनिमय प्रबंधन अधिनियम (फेमा) के खुलासा प्रावधानों पर अमल नहीं किया है। फिलहाल इस मुद्दे पर उन्हें सरकार से स्पष्टीकरण का इंतजार है। एक वरिष्ठ फंड अधिकारी ने अपनी पहचान जाहिर न करने की शर्त पर कहा, 'खुलासे के लिए एक समय-सीमा निर्धारित की गई थी जो शुक्रवार को खत्म हो गई। जबकि फंडों को संशोधित कानून के अनुसार खुलासा करना था। ऐसे में खुलासा न करते हुए हरेक दिन हम तकनीकी तौर पर नए दिशानिर्देशों का उल्लंघन कर रहे हैं।'
 
फंड हाउसों को बाजार नियामक के साथ-साथ संरक्षकों से आश्वासन मिला था कि म्युचुअल फंड को प्रभावित करने वाले दिशानिर्देशों में जल्द संशोधन किया जाएगा। उसके बाद फंड हाउसों ने फिलहाल यथास्थिति बरकरार रखी है। उद्योग संगठन एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया (एम्फी) ने कुछ दिन पहले भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) से इस मामले में ध्यान देने का आग्रह किया था। उसके बाद बाजार नियामक ने वित्त मंत्रालय को इस मुद्दे पर एक पत्र लिखा था। कई फंड हाउसों ने आर्थिक मामलों के विभाग को भी अपनी प्रस्तुति दी है।
 
एक अन्य व्यक्ति ने कहा, 'खुलासा संबंधी दिशानिर्देश जारी कर दिए गए हैं लेकिन ऐसा लगता है कि फंड हाउस उस पर अमल नहीं करना चाहते हैं।' नए प्रावधानों के अनुसार, विदेशी म्युचुअल फंडों को उन क्षेत्रीय सीमा और पाबंदियों का अनुपालन करना होगा जो फिलहाल भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश के लिए लागू हैं। शेयर बाजार में निवेश करने वाले म्युचुअल फंडों को 30 दिनों के भीतर अपने इक्विटी निवेश की विस्तृत जानकारी औद्योगिक व्यापार एवं उद्योग संवद्र्धन विभाग को देनी होगी। म्युचुअल फंडों को इक्विटी प्रतिभूतियों के आवंटन तिथि से 30 दिनों के भीतर आरबीआई का डीआई फॉर्म भी भरना होगा।
 
फंड अधिकारियों के अनुसार, यदि मौजूदा दिशानिर्देशों में बदलाव नहीं किया गया तो सरकार को अतिरिक्त स्पष्टीकरण जारी कर उन शर्तों को स्पष्ट करना चाहिए और बताना चाहिए कि फंडों को किस प्रकार क्षेत्रीय सीमा का अनुपालन करना चाहिए। उन्होंने कहा, 'कुछ शेयरों में मौजूदा निवेश का क्या होगा? मान लीजिए कि कई फंड सीमा का उल्लंघन कर रहा हो तो किसे अपनी हिस्सेदारी घटाने की जरूरत होगी और कितनी हिस्सेदारी घटानी होगी?' संशोधित फेमा कानून के तहत शेयरों में 50 फीसदी से अधिक निवेश वाले म्युचुअल फंडों को 'निवेश कंपनी' के तौर पर वर्गीकृत किया गया है। जबकि शेयरों की खरीदारी अथवा अधिग्रहण के जरिये इन फंडों के डाउनस्ट्रीम निवेश को 'अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश' कहा गया है वशर्ते वह निवेश मैनेजर अथवा प्रायोजक अथवा नियंत्रक प्रवासी हो।
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