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निजता कानून हों ज्यादा स्पष्ट : विशेषज्ञ

आशिष आर्यन और नेहा अलावधी /  November 17, 2019

फेसबुक के स्वामित्व वाली व्हाट्सऐप और भारत सरकार के बीच रस्साकशी से जासूसी और निगरानी के अस्पष्ट क्षेत्र को लेकर कई सवाल पैदा हुए हैं। हालांकि अभी मामले का कोई नतीजा नहीं निकला है और फिलहाल व्हाट्सऐप या केंद्र सरकार में से किसी एक पर पूरा दोष मढना जल्दबाजी होगी। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार द्वारा जासूसी किए जाने से संबंधित कानूनों का ज्यादा स्पष्ट होना जरूरी है। ऐसी खबरें सामने आई थीं कि इजरायली स्पाईवेयर पेगासस के जरिये भारत में पत्रकारों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की जासूसी की गई। यह रिपोर्ट आने के बाद सरकार ने इसे पूरी तरह खारिज कर दिया कि उसका स्पाईवेयर या जिन लोगों को निशाना बनाया गया है, उनके व्हाट्सऐप प्रोफाइल को हैक करने से कोई लेना-देना है। दूसरी तरह व्हाट्सऐप ने कहा कि उसने इस साल मई की शुरुआत में ही सरकार को संभावित हैकिंग की सूचना दे दी थी। 

 
इंडसलॉ में पार्टनर नमिता विश्वनाथ ने कहा कि दोनों ही पक्ष सही हो सकते हैं, लेकिन इस स्तर पर अस्पष्टता है। उन्होंने कहा, 'अभी कानून के मुताबिक सेवा प्रदाताओं को हैकिंग के बारे में 'जानकारी'  मिलने पर इसे सरकार के साझा करना अनिवार्य है। लेकिन 'जानकारी' की स्पष्ट परिभाषा नहीं है। विशेषज्ञों ने कहा कि दूसरी समस्या यह है कि इस समय सरकार के पास गुणवत्तायुक्त सर्विलांस और निगरानी क्षमताओं की भारी कमी है। मिशी चौधरी ऐंड एसोसिएट्स में तकनीकी वकील और प्रबंध साझेदार मिशी चौधरी ने कहा कि इसके अलावा जिन भारतीय नागरिकों के डिवाइस की हैकिंग होती है, उनके लिए सर्विलांस प्रक्रिया के किसी चरण में न्यायिक सहायता उपलब्ध नहीं है। 
 
उन्होंने कहा, 'कानून का कोई प्रावधान किसी भी हक से न्यायिक निगरानी की बात नहीं करता है। इस समय कानून में कोई भी ऐसा प्रावधान नहीं हैं, जिसके तहत यूजर्स के संवाद की जासूसी किए जाने पर उसे अधिसूचित किया जाए।' हालांकि एक सामान्य नियम के रूप में सरकार द्वारा ऑनलाइन जासूसी मंजूर है। इसमें केवल एक परिभाषित प्रक्रिया का पालन करना पड़ता है, जिसमें एक सक्षम प्राधिकारी एक आदेश जारी कर पूर्व मंजूरी देता है। जासूसी पहले मंजूरी लेकर या आकस्मिक मामलों में शुरू करने के तीन दिन के भीतर मंजूरी लेकर की जा सकती है। साईकृष्णा ऐंड एसोसिएट्स में पार्टनर अमीत दत्ता ने कहा कि यह जासूसी अधिकतम 180 दिन तक की जा सकती है। 
 
यह विशेष मामला इस वजह से और जटिल बन जाता है। दरअसल व्हाट्सऐप भारत में एक सोशल मीडिया इंटरमीडियरी के रूप में काम कर रही है। ऐसे में वह भारत के नियमों का पालन करने को बाध्य है। लेकिन यह साफ नहीं है कि स्पाईवेयर के मालिक इजरायल स्थित एनएसओ समूह को कैसे जिम्मेदार ठहराया जाएगा।  व्हाट्सऐप द्वारा एनएसओ के खिलाफ कैलिफोर्निया की अदालत में दायर किए गए मामले से पता चलता है कि एनएसओ ने व्हाट्सऐप के संसाधनों का इस्तेमाल करके व्यक्तिगत डिवाइसों में पेगासस 'रीमोट एक्सेस ट्रोजन' इंस्टॉल कर उनका ब्योरा हासिल किया। दत्ता ने कहा कि एनएसओ ने यह सामग्री अपने सर्वर पर ली और उसके बाद अपने ग्राहकों को मुहैया करा दी। 
 
उन्होंने कहा, 'भारत सरकार पर यह स्पष्ट करने की जिम्मेदारी होगी कि अगर उसके कहने पर भारतीय नागरिकों की जासूसी की गई तो इसमें आईटी अधिनियम की धारा और अन्य नियमों का पालन किया गया।' विशेषज्ञों ने कहा कि इस मामले से यह भी उजागर हुआ है कि देश का सर्विलांस तंत्र इतना मजबूत नहीं है कि भविष्य में ऐसे हमलों को रोक सके। चौधरी ने कहा, 'सीएमएस और नेत्र जैसे आगामी सर्विलांस सिस्टम दुनिया में सबसे अधिक निजता भंग करने वाले सिस्टम में शामिल हैं।' वर्तमान कानूनों के तहत भी जो समिति जासूसी की मंजूरी देती है, उसे अपने फैसले की हर दो महीनों में समीक्षा करनी होती है और निगरानी की मंंजूरी का नवीनीकरण करना होता है। साइबर कानून पोर्टल नावी के संस्थापक और साइबर कानून विशेषज्ञ ना विजयशंकर ने कहा कि ऐसी मंजूरी का नवीनीकरण न होना भी अपराध है। 
Keyword: social media, whatsapp, data,,
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