बिजनेस स्टैंडर्ड - पूर्ण और अंतिम वाउचर मध्यस्थता में बाधा नहीं
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पूर्ण और अंतिम वाउचर मध्यस्थता में बाधा नहीं

अदालत से
एमजे एंटनी /  November 17, 2019

बीमा कंपनियों और सरकारी संस्थाओं के बकाया राशि का वितरण करने से पहले डिस्चार्ज वाउचर मांगने का मुद्दा एक बार फिर उच्चतम न्यायालय में उठा और उसने इस मुद्दे पर बंबई उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ ओरियंटल इंश्योरेंस कंपनी की अपील खारिज कर दी। यह मामला तब उठा जब बीमा कंपनी और डिसिटैक्स फर्निशिंग लिमिटेड के बीच विवाद पैदा हुआ। आग के कारण लिमिटेड के तीन गोदाम नष्ट हो गए जिससे कंपनी पर वित्तीय संकट आ गया। बीमा कंपनी ने लिमिटेड को हुए नुकसान का जायजा लेने के लिए कई बार सर्वेक्षण किया और इस आधार पर उसके दावे को खारिज कर दिया। बीमा कंपनी का मानना था कि लिमिटेड ने जितना दावा किया है, उसे उससे कहीं कम नुकसान हुआ है। अपनी नाजुक वित्तीय स्थिति को देखते हुए लिमिटेड ने डिस्चार्ज वाउचर पर हस्ताक्षर कर दिए और जो कुछ राशि मिली उसे स्वीकार कर लिया। वाउचर में कहा गया कि यह भुगतान स्वेच्छा से किया गया पूर्ण और अंतिम निपटान है और इससे लिमिटेड के सभी तरह के दावों का निपटान हो गया है। जब लिमिटेड ने इसमें मध्यस्थता की मांग की तो बीमा कंपनी ने दलील दी कि लिमिटेड ने डिस्चार्ज वाउचर पर हस्ताक्षर किए थे और जिस राशि की पेशकश की थी, उसे स्वीकार कर लिया था। इसलिए यह मध्यस्थता लायक विवाद नहीं है। उच्च न्यायालय ने उसकी इस दलील को खारिज कर दिया जिसके खिलाफ बीमा कंपनी ने उच्चतम न्यायालय में अपील की। उच्चतम न्यायालय ने अपील यह कहते हुए खारिज कर दी कि यह मध्यस्थता लायक विवाद था और इसमें जांच के लिए प्रथम दृष्टया आधार यह था।

 
चिट फंड सदस्य की चूक गंभीर
 
अगर किसी चिट फंड योजना का सदस्य चूक करता है, तो फर्म को उससे भविष्य की सदस्यता की समेकित राशि एकमुश्त वसूलने का अधिकार है। ऐसा इसलिए है क्योंकि चिट फंड सदस्य और इस योजना को चलाने वाले (चिट फोरमैन) के बीच संबंध एक अनुबंधात्मक दायित्व है, जो सदस्य बनने के दिन ऋण बनाता है। उच्चतम न्यायालय ने ओरियंटल कुरीज लिमिटेड बनाम लीसा वाद में यह व्यवस्था दी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि चूक की स्थिति में शेष राशि एकमुश्त वसूलने के लिए चिट फोरमैन को सशक्त बनाने की शर्त का मकसद यह सुनिश्चित करना है योजना का प्रत्येक सदस्य समय पर भुगतान करे। न्यायालय ने साथ ही कहा कि अगर समय पर भुगतान न हो तो यह व्यवस्था नहीं चल पाएगी और फोरमैन चिट फंड के अन्य सदस्यों के प्रति अपनेे दायित्व का निवर्हन नहीं कर पाएगा। केरल उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा था कि चिट फंड समझौते पर हस्ताक्षर करके ग्राहक भविष्य की सभी किस्तों की राशि के संबंध में ऋण नहीं बनाता है। उच्चतम न्यायालय ने केंद्रीय कानून चिट फंड अधिनियम 1982 का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया। 
 
लोक अदालत के बाद गड़बड़ चेक अपराध
 
लोक अदालत के समक्ष निपटान के बाद जारी किया गया चेक एक देनदारी के निर्वहन के लिए है और अगर बैंक द्वारा स्वीकार नहीं किया जाता है तो इसे जारी करने वाले के खिलाफ नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट के तरह मुकदमा चलाया जा सकता है। उच्चतम न्यायालय ने अरुण कुमार बनाम अनीता शर्मा वाद में यह व्यवस्था दी। इस मामले में अरुण को अनीता से एक चेक मिला था जिसे बैंक ने स्वीकार नहीं किया। अनीता पर मुकदमा चला और उन्हें छह महीने जेल की सजा भुगतान या 3.3 लाख रुपये जुर्माना भरने को कहा गया। बाद में यह मामला लोक अदालत में पहुंचा। अदालत के समक्ष हुए निपटारे के मुताबिक उन्हें उसी दिन 3.51 लाख रुपये का भुगतान करना था। निपटान के मुताबिक उन्होंने बाद की तारीख का चेक दिया गया। लेकिन यह चेक भी बाउंस हो गया जिससे उनके खिलाफ दूसरे दौर में फौजदारी मामला चला। जब मजिस्ट्रेट ने अभियोजन खत्म करने की उनकी अर्जी खारिज कर दी तो उन्होंने मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया। उच्च न्यायालय ने इस आधार पर अभियोजन को खारिज कर दिया कि चेक कोई कर्ज उतारने या देनदारी के लिए जारी नहीं किया गया था। यह एक निपटान को पूरा करने के लिए दिया गया था। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि निपटान के कारण स्पष्ट देनदारी थी। इतना ही नहीं मुकदमेबाजी के पहले दौर से साफ था कि देनदारी चुकाने के लिए चेक जारी किया गया था।  
 
तेल में मिलावट गंभीर श्रेणी में
 
सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों द्वारा जारी विपणन अनुशासन दिशानिर्देशों के मुताबिक पेट्रोल और डीजल में गिरावट एक गंभीर अनियमितता है। ऐसा होने पर तेल कंपनी और डीलर के बीच अनुबंध तोडऩे की बात कही गई है। उच्चतम न्यायालय ने इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन बनाम आर एम सर्विसेज सेंटर वाद में यह बात कही। उच्चतम न्यायालय ने गोहाटी उच्च न्यायालय के फैसले को खारिज कर दिया जिसने कहा था कि गुणवत्ता में अंतर गंभीर नहीं था और इसके लिए अनुबंध तोडऩा उचित नहीं था। इस मामले में डीलर को विकलांग व्यक्ति के तौर पर अनुबंध दिया गया था। परिसर का मुआयना करने पर डीजल में मिलावट पाई गई और भंडार में भी अंतर था। भंडार में अंतर के मामले में सजा चेतावनी और निलंबन था। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि दिशानिर्देशों के मुताबिक मिलावट के मामले में अनुबंध खत्म करना उचित था। न्यायालय ने डीलर की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि नमूने के परीक्षण में पांच दिन की देरी हुई। न्यायालय ने कहा कि 10 दिन की समयसीमा अनिवार्य नहीं है और इसका सख्ती से पालन नहीं किया गया। इतने कम समय में गुणवत्ता में अंतर नहीं आता है। 
 
आईबीसी समाधान से मुक्त नहीं होता गारंटर
 
कॉरपोरेट देनदार के ऋण के गारंटर की देनदारी कॉरपोरेट देनदार की दिवालिया समाधान योजना के साथ खत्म नहीं हो जाती है। कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पिछले सप्ताह गौरी शंकर बनाम पंजाब नैशनल बैंक वाद में अपनेे फैसले में यह बात कही। इस मामले में एक  कंपनी के निदेशक बैंक ऋण के लिए व्यक्तिगत गारंटी दी। जब कंपनी ने ऋण के भुगतान में चूक की तो बैंक ने राष्ट्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) के कोलकाता पीठ का रुख किया। पंचाट ने ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के तहत एक समाधान योजना को मंजूरी दी। बकाये की कुल राशि में कुछ कटौती झेलने के बाद योजना के मुताबिक बैंक को बाकी राशि का भुगतान कर दिया गया। लेकिन इस योजना में निदेशक की व्यक्तिगत गारंटी का जिक्र नहीं था। जब बैंक ने गारंटी के मुताबिक निदेशक से भुगतान मांगा तो उसने कहा कि उसकी देनदारी कॉरपोरेट देनदार के साथ समव्यापी थी और इसलिए वह गारंटी से मुक्त हो चुका है। न्यायालय ने उसकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि आईबीसी में निजी गारंटर को अपनी देनदारी से बचने की अनुमति नहीं दी गई है। अनुबंध और ऋणशोधन पर आए फैसलों का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि आईबीसी के तहत कार्यवाही में कॉरपोरेट देनदार अपने लेनदारों के प्रति अपनी देनदारी का निर्वहन कर सकता है लेकिन इससे देनदारी की गारंटी खत्म नहीं हो जाती है। 
 
उपकरण की जब्ती सही बरकरार
 
उच्चतम न्यायालय ने खराब प्रदर्शन करने वाले ठेकेदार की सुरक्षा जमा राशि और उपकरण की जब्ती को सही ठहराया है। विजय ट्रेडिंग ऐंड ट्रांसपोर्ट बनाम केंद्रीय भंडारण निगम वाद में कंपनी को वाराणसी में इनलैंड क्लीयरेंस डिपो में सामान की आवाजाही संभालने का ठेका दिया गया। लेकिन कंपनी के खराब प्रदर्शन और डिपो में स्थिति के बदतर होने के कारण निगम ने उसका अनुबंध रद्द कर दिया। कंपनी ने इसका विरोध किया और मामला मध्यस्थता में चला गया। उसने इसे दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। उच्चतम न्यायालय ने भी उसकी अपील को खारिज कर दिया। 
Keyword: supreme court, high court,,
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