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विविध असमताओं के लक्षित समाधान पर अब हो ध्यान

जिंदगीनामा
कनिका दत्ता /  November 17, 2019

स्टालिन के बाद से ही मजबूत सरकारें ओलिंपिक की ऊंचाइयों को निर्बाध रूप से अपना लक्ष्य बनाती रही हैं। उनकी उपलब्धियां हमेशा सबसे बड़ी, सबसे लंबी, सबसे ऊंची और सबसे तेज जैसी श्रेणियों में रखी जाती हैं। खुद स्टालिन भी दुनिया का सबसे बड़ा डिपार्टमेंटल स्टोर होने का दावा करते हुए अपने पूंजीवादी प्रतिस्पद्र्धियों को निशाना बनाता था। एक खास सोच वाले भारतीय भी ऐसे दावे करने की आदत रखते हैं। मसलन भारत के कारोबारी प्रतिनिधिमंडल दावोस एवं अन्य वैश्विक मंचों पर 'सबसे तेजी से बढ़ते लोकतंत्र' के आख्यान को जोर-शोर से उछालते रहते थे। कुछ समय तक उस दावे में सच्चाई का अंश भी था। लेकिन अब हम उस बयान को नहीं दोहरा सकते हैं, लिहाजा हमारे पास दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति बनाने, दुनिया का सबसे बड़ा स्वच्छता अभियान और दुनिया का सबसे बड़ा शिनाख्त कार्यक्रम चलाने जैसे फुटकर दावे ही करने की स्थिति रह गई है। केवल यही योजनाएं एवं कार्यक्रम ही ठोस उपलब्धि के तौर पर प्रशंसा के लायक हैं।

 
मौजूदा समय में खुद से बनाई आर्थिक सुस्ती के खत्म होने तक हम मिथकीय स्वर्ण युग वाली भारतीय महानता में सुरक्षित पनाह ले सकते हैं। उस स्वर्ण युग में परमाणु हथियारों और प्लास्टिक सर्जरी तक के बारे में हम सबकुछ जानते थे। इस तरह के बयान देने के लिए भारतीय नेताओं को मामूली जगहंसाई का पात्र नहीं बनना पड़ा है, लिहाजा उन्होंने भारत को एक राजनीतिक एवं आर्थिक महाशक्ति में तब्दील होने की संभावना संबंधी दावों से खुद को अलग कर लिया है। अगर हम इस दावे को प्रत्यक्ष मूल्य के रूप में लें कि दुनिया ने भारत को अचानक 21वीं सदी की एक गतिशील शक्ति के रूप में इज्जत देना शुरू कर दिया है तो दुनिया सर्वोच्च न्यायालय के हाल के एक फैसले को लेकर पूरे देश के आवेश में आ जाने पर काफी उलझन में पड़ गई होगी। यह विवाद इतिहास की धुंध में लिपटे दावों की ओट में था। 
 
इस फैसले के गुण-दोष को किनारे रखकर देखें तो निश्चित रूप से दूसरे मसले भी हैं जिन पर देश की सर्वोच्च अदालत के लिए तत्काल ध्यान देना जरूरी है। अयोध्या मामले की सुनवाई को फास्टट्रैक किया गया था जबकि अदालत में करीब 60,000 मामले लंबित पड़े हुए हैं। अब जब इस मामले में बहुसंख्यक आबादी काफी हद तक संतुष्ट लग रही है, तब हमें आधुनिक एवं आकांक्षी भारत में मौजूद अन्य असमताओं पर करीबी निगाह डालनी चाहिए। इन असमताओं पर सरकार के लक्षित ध्यान की जरूरत है।
 
ऐसा ही एक मसला यह है। देश इलाज के लिए आने वाले विदेशी पर्यटकों का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। यह महज साधारण सर्जरी का ही मामला नहीं है, भारतीय डॉक्टर जटिल ऑपरेशन को भी बखूबी अंजाम दे सकते हैं जिन्हें मीडिया में जगह भी मिलती है। विडंबना यह है कि केवल समृद्ध विदेशी एवं बेहद अमीर भारतीयों का बहुत छोटा हिस्सा ही इन महंगी स्वास्थ्य सेवाओं का भार उठा सकते हैं। आयुष्मान भारत चिकित्सा बीमा योजना ने भारत के गरीब एवं निम्न मध्यम तबकों की पहुंच डायलिसिस एवं जटिल ऑपरेशन जैसे बेहतर स्वास्थ्य-देखभाल तक कर दी है। लेकिन डॉक्टरों, अस्पताल के बिस्तरों, नर्सिंग देखभाल एवं असली दवाओं की उपलब्धता जैसे बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं तक एक आम भारतीय की पहुंच अब भी काफी निचले स्तर पर बनी हुई है। आर्थिक समीक्षा में भी हर साल इन बिंदुओं का जिक्र रहता है।
 
एक और मसले पर गौर करते हैं। आईएटीए के आंकड़े बताते हैं कि भारत की घरेलू हवाई यात्रा में वृद्धि पिछले चार वर्षों से लगातार तीव्र वृद्धि पर है। नागरिक उड्डïयन महानिदेशालय के मुताबिक पिछले साल करीब 14 करोड़ भारतीयों ने हवाई यात्रा की थी। वैसे इस आंकड़े में थोड़े संशोधन की जरूरत है क्योंकि इन यात्रियों में कई लोग ऐसे भी होंगे जिन्होंने कई बार हवाई यात्रा की होगी। दुनिया में नौवां सबसे व्यस्त हवाईअड्डïा भारत में ही है। यह हवाई परिवहन में तेजी को दर्शाता है और यह एक-दूसरे से तगड़ी प्रतिस्पद्र्धा में लगीं  निजी एयरलाइंस की सस्ती टिकटों की पेशकश के दम पर बढ़ा है। सस्ते टिकट मिलने से मध्य वर्ग के लिए भी हवाई यात्रा पहुंच में आ गई है। लेकिन अब भी बड़ी संख्या में लोग ट्रेनों से ही सफर करते हैं और भारतीय रेल नेटवर्क एवं ढांचे की तेजी से बिगड़ती हालत के चलते कई दशकों बाद भी रेल सफर को लेकर जारी चर्चाएं थम नहीं पाई हैं।
 
तीसरा मसला शिक्षा से जुड़ा हुआ है। यूं तो हर साल आईआईटी और आईआईएम से हजारों ऐसे छात्र पढ़कर निकलते हैं जिन्हें अपने यहां नौकरी देने के लिए दुनिया की शीर्ष कंपनियां भी बहुत ऊंचे वेतन की पेशकश करती हैं। इसके बावजूद तमाम सर्वे से पता चलता है कि देश के लाखों स्कूली बच्चे अपनी कक्षा से निचले स्तर के सवाल भी नहीं हल कर पाते हैं। इनमें से कोई भी समस्या मौजूदा सरकार की खड़ी की हुई नहीं है। असल में इन समस्याओं का वजूद तो दशकों से है। लेकिन प्रगति एवं विकास पर केंद्रित मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान के लिए ऐसे मसले एक मंदिर-मस्जिद मामले से कहीं अधिक राजनीतिक तवज्जो के हकदार नजर आते हैं। 
Keyword: aviation, flight, airport, AAI,,
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