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डूबते दल को भगवा तिनके का सहारा!

राष्ट्र की बात
शेखर गुप्ता /  November 17, 2019

राजनीति और युद्ध का सबसे पुराना सिद्धांत कहता है कि शत्रु का शत्रु आपका मित्र होता है। लेकिन उस स्थिति में क्या जबकि आप लड़ाई लडऩे तक की स्थिति में नहीं हों? अब पारंपरिक नियम पर्याप्त नहीं हैं। एक बार इस नियम को उलट कर देखते हैं: यदि आपके शत्रु का सबसे अच्छा मित्र आपका भी मित्र बन गया तो? यदि उनके रिश्ते में मामूली सी दरार भी नजर आती है तो उसकी जांच परख क्यों न की जाए? महाराष्ट्र मे कांग्रेस और उसकी साझेदार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) यही कर रही हैं। दोनों ने शिवसेना के साथ मिलकर सरकार बनाने की इच्छा जताई है। इससे पता चलता है कि भारतीय राजनीति बदल रही है। दूसरा दशकों पुराने दो प्रतिबद्ध धर्मनिरपेक्ष साझेदार एक ऐसी पार्टी के साथ जुडऩे जा रहे हैं जिसकी वे दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी और सांप्रदायिक दल होने के चलते आलोचना करते रहे हैं। यानी देश का प्रमुख धर्मनिरपेक्ष गठजोड़ वैचारिक लक्ष्मण रेखा लांघने को तैयार है।

 
शरद पवार की राकांपा के बारे में हम सब जानते हैं लेकिन कांग्रेस के लिए यह और अधिक चौंकाने वाला है। जैसा कि मैंने पहले भी लिखा था, बीते तीन दशक से पवार देश के सबसे अधिक तगड़े संपर्क वाले राजनेता हैं। पुरानी शैली की भारतीय राजनीति की तरह वह किसी को शत्रु नहीं मानते। वह हमेशा भाजपा और शिवसेना से जूझते रहे, दोनों दल उन्हें लगातार धोखेबाज कहते रहे हैं और मोदी सरकार के प्रवर्तन निदेशालय ने भी विधानसभा चुनाव के ऐन पहले उनका नाम कुछ घोटालों से जोड़ा। 
 
यह भी याद रहे कि इसी मोदी सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण भी दिया था जो भारत रत्न के बाद सबसे बड़ा नागरिक सम्मान है। पवार और ठाकरे परिवार के बीच भी कारोबार जैसे राजनैतिक रिश्ते रहे हैं। दूसरी ओर कांग्रेस, कभी उस दिशा में नहीं गई। कांग्रेस के प्रतिबद्ध आलोचक इसका विरोध करते हुए इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग और केरल कांग्रेस (ईसाई) के साथ तथा कुछ अवसरों पर हैदराबाद में असदुद्दीन ओवैसी की एमआईएम के साथ उसके रिश्तों की याद दिलाएंगे। ऐसे समझौते स्थानीय, बहुत छोटे और सबसे अहम बात अल्पसंख्यकों की राजनीति करने वाले छोटे समूहों के साथ हैं। आजादी के बाद यह पहला मौका है जब कांग्रेस खुलकर किसी हिंदुत्ववादी दल की ओर झुकी है।
 
यदि आप कांग्रेस की राजनीति को समझते हैं, खासकर बीते दो दशक में सोनिया गांधी के नेतृत्व में पार्टी की राजनीति को आप समझते हैं तो उसने हिंदुत्ववादी दलों को प्रमुख वैचारिक विरोधी माना। उसकी पूरी राजनीति इनका विरोध करने की रही है। सन 2003 में एनडीटीवी के कार्यक्रम वॉक द टॉक में साक्षात्कार के दौरान लालकृष्ण आडवाणी ने शिकायत की थी कि सोनिया गांधी ने उनकी पार्टी को प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि शत्रु माना। एक बार जब उसने अपनी राजनीति को यह स्वरूप दे दिया तो कांग्रेस हर उस दल के साथ जाने की आकांक्षी रहने लगी जो भाजपा और उसके साझेदारों से लड़ सकता था। इन साझेदारों में शिरोमणि अकाली दल और शिवसेना प्रमुख थे।
 
कांग्रेस ने कई बार वाम दलों के साथ गठजोड़ किया। इसकी शुरुआत एचडी देवेगौड़ा और आईके गुजराल की संयुक्त मोर्चा सरकारों को बाहर से समर्थन देने से हुई ताकि सांप्रदायिक ताकतों को बाहर रखा जा सके। 2004 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार की वापसी के वक्त भी यह साथ कायम रहा। गठबंधन के दौर में उसने कभी न कभी ऐसे दलों के साथ गठबंधन किया जो कभी भाजपा के साथ रहे थे। इनमें ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार शामिल रहे लेकिन उसने कभी किसी हिंदुत्ववादी दल अथवा अकाली दल के साथ गठबंधन नहीं किया। सोनिया गांधी की कांग्रेस अल्पसंख्यकवाद की ओर और अधिक झुकती चली गई। पहले उसने आतंकवाद निरोधक अधिनियम पोटा हटाया और उसके बाद उसने मुस्लिमों के सामाजिक आर्थिक दर्जे की जांच परख के लिए सच्चर कमेटी का गठन किया।
 
आप समझ सकते हैं कि पार्टी को इतनी बड़ी वैचारिक छलांग लगाने से पहले किस कदर मंथन से गुजरना पड़ा होगा। आप यह भी देख सकते हैं कि पार्टी के पुराने राजनेताओं और राहुल गांधी के इर्दगिर्द मौजूद युवा, वाम रुझान वाले नेताओं के बीच किस तरह की बहस-मुबाहिसा हुआ। आप समझ सकते हैं कि पुराने राजनेता अलग तरह से क्यों सोचते हैं? भले ही वे सार्वजनिक रूप से न स्वीकारें लेकिन वे मानते हैं कि राहुल कई बार नाकाम हो चुके हैं और कम से कम इन नेताओं के बचे राजनीतिक जीवन में तो वापसी की संभावना नहीं दिखती। दूसरी बात, सीबीआई या ईडी की हिरासत की आशंका बढ़ चुकी है। तीसरा, अपेक्षाकृत नई पीढ़ी के विपरीत उनमें भी जेएनयू से आए कट्टर सोच वाले युवाओं के उलट वे अपना राजनैतिक इतिहास जानते हैं।
 
उदाहरण के लिए वे मानते हैं कि जब उनकी पार्टी का दबदबा था और उनके प्रतिद्वंद्वी गहरे भंवर में थे (जहां आज वे खुद हैं)। याद रहे भाजपा के पास सन 1984 में केवल दो सांसद थे। उनमें वैचारिक लचीलापन था। सन 1966 में जब पंजाब को तीन राज्यों में बांटा गया और हरियाणा तथा हिमाचल प्रदेश दो नए राज्य बने तब तक भारतीय जन संघ शिरोमणि अकाली दल का शत्रु हुआ करता था। सन 1967 के चुनाव में दोनों कांग्रेस के खिलाफ एकजुट थे। भारतीय राजनीति इंदिरा गांधी के नेतृत्व में एकध्रुवीय होती जा रही थी। ऐसे में न केवल जन संघ और उसके समाजवादी आलोचक बार-बार आए बल्कि उन्होंने वाम का भी साथ लिया। हमने अपने कामकाजी जीवन में तीन बार भाजपा और वाम को साथ देखा। पहली बार सन 1989-90 में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में और 2008 और 2012 में संप्रग के खिलाफ क्रमश: भारत-अमेरिका नाभिकीय समझौते और बहुब्रांड खुदरा में एफडीआई के मामले में।
 
यदि भाजपा और वाम जैसे दो वैचारिक छोर पर मौजूद दल यदि एक साझा शत्रु के खिलाफ साथ आने में नहीं हिचकते तो कांग्रेस ने भारतीय राजनीति को एकध्रुवीय क्यों बना दिया। वह वैसा लचीलापन क्यों नहीं दिखा पा रही? यह सवाल तो उठता ही है। कई बार भाजपा और वाम की दलील यह होती थी कि वे भ्रष्टाचार (बोफोर्स) और वंशवाद से निपटने के लिए ऐसा कर रहे हैं। तो कभी वे अमेरिका या बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नाम पर साथ आए। कांग्रेस अब वैसा क्यों नहीं करती? खासकर तब जबकि पुरस्कार में उसे देश के दूसरे सबसे अधिक सांसद (48 लोकसभा सीट) भेजने वाले और सर्वाधिक संसाधन संपन्न राज्य से मोदी-शाह को दूर रखने का मौका मिल रहा हो। कांग्रेस के पास खोने को क्या है? वह संसद में 52 और महाराष्ट्र विधानसभा में 44 तक (चार बड़े दलों में सबसे कम) लुढ़क चुकी है। भले ही यह ज्यादा दिन न चले और भाजपा सत्ता में लौट आए? उसे तो वैसे भी आना है।
 
हम इस बहस में कमियां निकालते हुए हजार शब्द और लिख सकते हैं और पवार इस व्यवस्था को स्थायित्व नहीं देते तो भंगुरता तो नजर आ ही रही है। परंतु जब आप ऐसी नाउम्मीदी की स्थिति में हों तो आप तिनके का भी सहारा ले लेते हैं। भले ही यह भगवा रंग में रंगा हो।
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