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दूरसंचार क्षेत्र की रक्षा

संपादकीय /  November 17, 2019

दूरसंचार क्षेत्र भीषण दबाव में है। इस क्षेत्र की दो बड़ी कंपनियों के दूसरी तिमाही के नतीजे इसके गवाह हैं। वोडाफोन आइडिया को हुआ घाटा, देश के कारोबारी जगत को किसी एक तिमाही में हुआ सबसे बड़ा घाटा है। भारतीय एयरटेल को 24 वर्ष के इतिहास के सबसे बड़े नुकसान का सामना करना पड़ा। जुलाई-सितंबर तिमाही में दूरसंचार क्षेत्र की इन दोनों दिग्गज कंपनियों का समेकित घाटा 74,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि उन्हें समायोजित सकल राजस्व बकाये (एजीआर) के लिए अलग से प्रावधान करना पड़ा।

 
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक हालिया निर्णय में एजीआर की सरकार द्वारा दी गई परिभाषा को बरकरार रखा और कहा कि दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियों को लाइसेंस शुल्क का अपना पुराना बकाया चुकाना होगा। जनवरी 2020 के आखिर तक उन्हें स्पेक्ट्रम उपयोग शुल्क (एसयूसी) भी चुकाना होगा। दूरसंचार विभाग ने सभी सेवा प्रदाताओं से कहा है कि वे अपने-अपने बकाये का आकलन करें और सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के मुताबिक तीन महीने में इसे चुका दें। अनुमान बताते हैं कि यदि कारोबार से बाहर हो चुकी कंपनियों तथा अधिग्रहीत कंपनियों को शामिल कर लिया जाए तो दूरसंचार कंपनियों पर कुल मिलाकर 1.33 लाख करोड़ रुपये का बकाया निकल सकता है। भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया ने भारी नुकसान, बढ़ते कर्ज और लंबित एजीआर बकाये को देखते हुए भविष्य के लिए शंकाएं जाहिर की हैं।
 
कंपनियों का कहना है कि सरकार को जल्द से जल्द पहल करनी होगी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राह दिखाते हुए कहा है कि वह नहीं चाहतीं कि किसी दूरसंचार कंपनी को बंदी का शिकार होना पड़े। उन्होंने तो हर कंपनी के फलने-फूलने की मंशा जताई। ऐसे में माना जा सकता है कि सरकार जल्द कदम उठाएगी। यदि सरकार मदद नहीं करती है तो ब्रिटिश कंपनी वोडाफोन भारतीय बाजार से बाहर जा सकती है। इसका कारोबारी रुझान पर बुरा असर होगा। खासतौर पर विदेशी निवेश इससे प्रभावित होगा। वोडाफोन भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के सबसे बड़े स्रोतों में शामिल रही है। वोडाफोन के मुख्य कार्याधिकारी निक रीड ने पिछले दिनों मीडिया से कहा था यदि कोई कंपनी मुनाफे में नहीं है तो वह नकदीकरण की प्रक्रिया की ओर बढ़ सकती है। बात को इससे साफ तरीके से नहीं कहा जा सकता। उन्होंने ज्यादातर चिंताओं के लिए नियामकीय माहौल पर अंगुली उठाई। बाद में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर कहा कि उन्हें संदर्भ से काटकर उद्घृत किया गया और वोडाफोन भारत में निवेश जारी रखना चाहती है। 
 
बहरहाल, आंकड़े असली कहानी बताते हैं। यकीनन न केवल वोडाफोन बल्कि समूचे दूरसंचार उद्योग के लिए आगे की राह कठिन है और यह क्षेत्र सरकार से मिलने वाली संभावित राहत पर निर्भर है। अब तक संकेत यही हैं कि सरकार लाइसेंस कम कर सकती है और स्पेक्ट्रम शुल्क भुगतान को फिलहाल स्थगित कर सकती है। उद्योग जगत को उम्मीद है कि एजीआर बकाये के लिए लंबी अवधि का विकल्प मिलने के अलावा उसे जुर्माने और ब्याज चुकता करने से राहत भी मिलेगी। हालांकि सरकार के लिए दूरसंचार कंपनियों को ऐसी रियायतें देना एक चुनौती हो सकती है क्योंकि राजस्व की कमी है। यह सही है कि अतीत में दूरसंचार कंपनियां स्पेक्ट्रम नीलामी के दौरान भारी-भरकम बोली में शामिल रहीं जिसका असर उनकी वित्तीय स्थिति पर पड़ा। कीमतों की प्रतिस्पर्धा में उलझने के बाद हालात कुछ ऐसे बन गए कि केवल दो बड़ी दूरसंचार कंपनियां बची रह सकती हैं। इनमें से एक ही मजबूत स्थिति में रह सकती है। इस क्षेत्र में एकाधिकार की स्थिति, और अधिक नौकरियां जाने और कारोबारी भरोसा टूटने से बचने के लिए सरकार को तत्काल कदम उठाना होगा। आखिर विभिन्न शुल्कों और करों के रूप में कंपनियों का एक तिहाई राजस्व उसी के पास जाता है।
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