बिजनेस स्टैंडर्ड - श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव भारत के लिहाज से अहम
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Sunday, December 15, 2019 05:52 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव भारत के लिहाज से अहम

सियासी हलचल
आदिति फडणीस /  November 15, 2019

अब से कुछ घंटों के बाद श्रीलंका को नया राष्ट्रपति मिल जाएगा जो इस पड़ोसी देश का आठवां कार्यकारी प्रमुख होगा। वर्ष 2015 में एक अविश्वसनीय गठजोड़ तैयार हुआ था जिसमें वामपंथी रुझान वाली श्रीलंका फ्रीडम पार्टी (एसएलएफपी) और मुक्त बाजार की समर्थक यूनाइटेड नैशनल पार्टी (यूएनपी) जैसे विरोधी मत वाले दल भी शामिल थे। इस गठजोड़ ने तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की अगुआई वाली श्रीलंका पीपुल्स पार्टी (एसएलपीपी) को हरा दिया था। मौजूदा राष्ट्रपति मैत्रीपाल श्रीसेना के नेतृत्व वाले इस गठजोड़ को प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे का भी समर्थन हासिल था। गठजोड़ ने मिलकर पहली नैशनल यूनिटी सरकार (एनयूजी) का गठन किया था।

 
हालांकि दो साल पहले इस गठजोड़ की गांठें खुलनी शुरू हो गई थीं। यह तनातनी एवं सत्ता संघर्ष उस समय चरम पर पहुंच गया जब श्रीसेना ने 2018 में एक तरह का संवैधानिक तख्तापलट करते हुए प्रधानमंत्री विक्रमसिंघे को बर्खास्त कर दिया और उनकी जगह पर राजपक्षे को नया प्रधानमंत्री बना दिया। आखिर में सर्वोच्च अदालत के दखल के बाद विक्रमसिंघे को दिसंबर 2018 में प्रधानमंत्री पद पर बहाल किया जा सका। लेकिन श्रीलंका के राष्ट्राध्यक्ष एवं शासनाध्यक्ष के संघर्षपूर्ण संबंधों से शासन पूरी तरह पंगु हो चुका है और गत 21 अप्रैल को ईस्टर के दिन हुए आतंकी हमलों के पीछे भी यही मुख्य कारण रहा है। श्रीलंका में 2009 के बाद हुए इस पहले हमले ने एक बार फिर यहां आंतरिक संघर्ष छिडऩे की आशंका पैदा कर दी। हालत यह है कि इस भीषण बम धमाके की जांच के लिए राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री दोनों ने अलग-अलग आदेश जारी किए थे।
 
श्रीसेना और विक्रमसिंघे के बीच की खाई उस समय गहरी हो गई जब राष्ट्रपति ने रक्षा सचिव से कहा कि प्रधानमंत्री को राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठकों में आमंत्रित न किया जाए। पूर्व रक्षा सचिव कपिला वैद्यरत्ने ने हाल ही में संसदीय आयोग के समक्ष अपनी गवाही में इसकी पुष्टि भी की है। राजनीतिक अस्थिरता का असर अर्थव्यवस्था को भी उठाना पड़ा है। बम धमाकों के बाद पर्यटन गतिविधियां सुस्त पडऩे से श्रीलंका को करीब 20 अरब रुपये का नुकसान झेलना पड़ा है। राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के बीच का राजनीतिक साहचर्य असरदार नहीं हो पाया है। राजपक्षे अपने लाभ के लिए अपने सर्वशक्तिमान कार्यालय का इस्तेमाल करने वाले आखिरी राष्ट्रपति थे। उन्होंने गृहयुद्ध तो जीत लिया लेकिन चीन के साथ गलबहियां कर पश्चिमी देशों एवं भारत के साथ अपने रिश्तों को तल्ख कर लिया।
 
राष्ट्रपति चुनाव की प्रक्रिया खत्म होते ही यह राजनीतिक गतिरोध टूटने के आसार हैं। यूएनपी की अगुआई वाले गठबंधन नैशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट के एजेंडे में राष्ट्रीय सुरक्षा, लोकतंत्र एवं अर्थव्यवस्था है। इस गठबंधन की तरफ से आवासीय एवं निर्माण मंत्री सजित प्रेमदासा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बनाए गए हैं। वह पूर्व राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा के बेटे हैं जिनकी लिट्टे विद्रोहियों ने हत्या कर दी थी। अगर सजित इस चुनाव में जीत जाते हैं तो पिता के बाद पुत्र के भी श्रीलंकाई राष्ट्रपति बनने का एक दृष्टांत होगा।
 
वहीं फरवरी 2018 में संपन्न स्थानीय निकाय चुनावों में बड़ी जीत दर्ज करने वाली एसएलपीपी जोश से भरी हुई है। राजपक्षे के छोटे भाई गोताबया राजपक्षे को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाना पूर्वविदित ही था। अपने बड़े भाई की ही तरह गोताबया (गोता के नाम से लोकप्रिय) भी एक मजबूत एवं निष्ठुर नेता माने जाते हैं। उन्हें तमिल विद्रोहियों के खिलाफ लड़ाई में अहम भूमिका के लिए याद किया जाता है। श्रीलंकाई सेना में कर्नल रह चुके गोता निर्णायक संघर्ष के दौरान रक्षा सचिव के पद पर तैनात थे। भले ही वह श्रीलंका में सजित की तुलना में अधिक चर्चित हैं लेकिन उन पर जंग से जुड़े बोझ भी चस्पा हैं। लेकिन सिंहल बौद्ध समुदाय का समर्थन और एक सख्त प्रशासक की उनकी छवि गोता के पक्ष में जाती है। हालांकि उत्तरी एवं पूर्वी इलाकों में उन्हें निराशा हाथ लग सकती है जहां अल्पसंख्यकों का वर्चस्व है। 
 
इसके उलट, सजित को श्रीलंका के आकांक्षावान युवा एक संभावित अच्छे प्रशासक के रूप में देखते हैं। वैसे उन पर भी अपनी पार्टी के पिछले कर्मों का बोझ है जिसमें मौजूदा आर्थिक समस्याओं का ठीकरा भी शामिल है। ईस्टर पर धमाकों से उपजे हालात से सही तरीके से नहीं निपट पाना सत्तारूढ़ गठजोड़ पर भारी पड़ सकता है। गोता अगर चुनाव जीत जाते हैं तो वह इसी मुद्दे को आधार बनाकर देश की खुफिया एवं आतंकवाद-रोधी व्यवस्था का पुनर्गठन कर सकते हैं। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा के अलावा भी राष्ट्रीय हित के लिए बहुत कुछ है।
 
वर्ष 2014-15 में महिंदा राजपक्षे को सत्ता से हटाने की अंतरराष्ट्रीय मुहिम में भारत की भी भूमिका रही थी। दरअसल चीन, पाकिस्तान, रूस, लीबिया एवं उत्तर कोरिया जैसे देशों के साथ महिंदा की नजदीकी असहज करती थी। महिंदा के राष्ट्रपति काल में ही चीन ने दक्षिण एवं मध्य श्रीलंका में अपना प्रभाव फैलाया था। बंदरगाहों, हवाईअड्डों और एक्सप्रेस राजमार्गों के अलावा चीन श्रीलंका में एक वािणज्यिक शहर के विकास से भी जुड़ा था। इसके अलावा दोनों देशों के बीच राजनीतिक एवं रक्षा सहयोग भी मजबूत हुए थे। उनके कार्यकाल में ही चीन की पनडुब्बी पहली बार कोलंबो के तट पर पहुंची थी। चीन की महत्त्वाकांक्षी बेल्ट एवं रोड परियोजना में फंस चुके श्रीलंका को अपने हम्बनटोटा बंदरगाह को 99 वर्षों और प्रस्तावित कोलंबो पोर्ट सिटी कॉम्प्लेक्स को 90 वर्षों के लिए चीन के सुपुर्द करना है।  यूएनपी सरकार के कार्यकाल में श्रीलंका के भीतर चीन की भूमिका एक हद तक काबू में रही है। वहीं पिछले पांच वर्षों से सत्ता से बाहर राजपक्षे की जीत चीन को सामरिक बढ़त दे देगी। 
Keyword: sri lanka, Mahinda Rajapaksa, president,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या बैंकों की तरह सख्त नियम से एनबीएफसी में बढ़ेगी जवाबदेही?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.