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आरसेप में भारत के पक्ष में ऑस्ट्रेलिया व न्यूजीलैंड

शुभायन चक्रवर्ती / नई दिल्ली November 13, 2019

प्रस्तावित क्षेत्रीय समग्र आर्थिक भागीदारी (आरसेप) समझौते से भारत के बाहर निकलने के एक हफ्ते बाद भी ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड उसे इस भागीदारी समझौते में शामिल करने के लिए जोर लगा रहे हैं। इस मामले के जानकार सूत्रों ने कहा कि दोनों देशों के अधिकारी इस मामले को लेकर दूसरे आरसेप साझेदार देशों के साथ संपर्क में हैं और इन्हीं दोनों देशों ने भविष्य में आरसेप में भारत के आने का दरवाजा खुला रखने के लिए साझेदार देशों को तैयार किया था। राजनयिक सूत्रों ने कहा कि ये देश निर्यात का पावर हाउस बन चुके चीन के साथ बहुत अधिक भागीदारी करने को लेकर रुचि नहीं दिखा रहे हैं। इसी कारण से ये देश लगातार बैक चैनल से सक्रिय हैं और इन्होंने भारत और चीन के बीच मध्यस्थता कराने के लिए महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
 
भारत ने इससे पहले द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता पर बातचीत स्थगित करने का निर्णय लिया था जो दोनों देशों के साथ आरसेप पर अधिक ध्यान देने को लेकर चल रही थी। अब भारत सरकार अमेरिका के साथ समझौता करना चाह रही है और इसी तरह की वार्ता यूरोपीय संघ के साथ फिर से शुरू करने का निर्णय लेने जा रही है। ऐसे में दोनों दक्षिणी देश भारत के साथ कारोबारी समझौता नहीं होने को लेकर चौकन्ना हैं।  
 
ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड का हित  
 
ऑस्ट्रेलिया के कारोबारी योजनाओं में भारत का स्थान काफी महत्त्वपूर्ण है। द्विपक्षीय व्यापार पर भारत में ऑस्ट्रेलिया के राजदूत रहे पीटर एन वर्गीज द्वारा लिखित रिपोर्ट में दोनों देशों के बीच और अधिक आर्थिक संबंधों की वकालत की गई थी। उस समय भारत के कारोबारी नए वैश्विक बाजार तलाश रहे थे जिसमें सरकार सहायक बन रही थी। रिपोर्ट में भारत को ऑस्ट्रेलिया के लिए एकमात्र सबसे अधिक तेजी से बढऩे वाला बाजार बताया गया है जबकि ऑस्ट्रेलिया के नीति निर्माताओं के एक धड़े में ऑस्ट्रेलिया के लिए चीन और जापान पर अपने व्यापारिक निर्भरता में कटौती करने के लिए भारत की भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है।
 
500 पृष्ठ की यह रिपोर्ट ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपी जा चुकी है और वह देश रिपोर्ट पर आधिकारिक सिफारिशों को कारगार बना रहा है। वर्गीज ने पिछले हफ्ते नई दिल्ली में कहा कि दूसरे देशों की ओर से पूरी गंभीरता के साथ आरसेप का दरवाजा भारत के लिए खुला रखा गया है और सरकार को फिर से अपने कदम पर विचार करने की जरूरत है। आधिकारिक आंकड़ों से पता चलता है कि विगत वित्त वर्ष में भारत ने ऑस्ट्रेलिया को 3.5 अरब डॉलर का निर्यात किया जबकि वहां से होने वाला आयात 13 अरब डॉलर का रहा। जबकि कच्चे तेल की कम कीमतों से प्रसंस्कृत पेट्रोलियम खेपों से होने वाली आय को चोट पहुंची है। ज्यादातर दूसरी श्रेणियों के निर्यातों में भी ठहराव आया है।
 
दूसरी तरफ बढ़ते व्यापार घाटे की प्रमुख वजह 9.6 अरब डॉलर से अधिक मूल्य का ऑस्ट्रेलियाई कोयला और प्राकृतिक गैस निर्यात है। ऑस्ट्रेलिया को भारत की कृषि जरूरतों के लिए भी बड़े आपूर्तिकर्ता के रूप में खुद को स्थापित होने की उम्मीद है। उसे विशेष तौर उतार चढ़ाव वाले दलहनों के कारोबार से उम्मीद है। 2017-18 में उसने 92.4 करोड़ डॉलर मूल्य के छोले और दालों तथा 12.563 करोड़ डॉलर मूल्य के गेहूं का निर्यात किया था। बातचीत के हालिया चरण में में भी भारत ने न्यूजीलैंड की ओर से बड़े घरेलू उपभोक्ता बाजार तक पहुंच देने की मांग को अस्वीकार कर दिया गया था। 
 
भारत सरकार में नव गठित पशुपालन मंत्रालय के अधिकारियों के साथ ही राष्ट्रीय डेरी विकास बोर्ड द्वारा बार बार वाणिज्य विभाग से संपर्क साध कर भारतीय किसानों के हितों को सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह किए जाने के बाद सरकार समझौते की शर्तों से डेयरी क्षेत्र को बाहर रखने पर मजबूर हो गई थी। लेकिन न्यूजीलैंड बाजार में पैठ बनाने को लेकर संकल्पित नजर आ रहा है। इस हफ्ते न्यूजीलैंड के व्यापार मंत्री डेमियनओकोनोर ने अहमदाबाद में डेयरी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी अमूल के संयंत्र का दौरा कर तकनीक और बेहतर तरीकों को साझा करने की पेशकश की थी। न्यूजीलैंड दूध, मक्खन और पाउडर उत्पादों में दुनिया भर में अग्रणी है और इनका निर्यात उसकी कमाई का बड़ा जरिया है।
Keyword: RCEP, FTA, export,,
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