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आवास परियोजनाओं के लिए नए कोष की बाधाएं

देवाशिष बसु /  November 13, 2019

रियल एस्टेट फंड वांछनीय है लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे लापरवाह वित्तीय कंपनियों और जिद्दी रियल एस्टेट डेवलपरों का संकट दूर हो पाएगा? बता रहे हैं देवाशिष बसु

 
सरकार ने अटकी पड़ी आवासीय परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक निवेश कोष (एआईएफ) बनाने की घोषणा की थी और अब इसके लिए 25,000 करोड़ रुपये का कोष गठित कर दिया। इससे तुरंत धारणा को बल मिला है और इससे उन परियोजनाओं के लिए तुरंत नकदी की व्यवस्था होगी जिनमें 60-70 फीसदी काम पूरा हो चुका है। इसकी गुंजाइश बहुत व्यापक है: इसका दायरा किफायती मकानों की श्रेणी से परे है और इसमें एक से दो करोड़ रुपये तक के मकान शामिल हैं। इससे वहां पैसा आएगा जहां इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है-फंसे रियल एस्टेट कर्ज या समाधान से गुजर रही परियोजनाओं में। अगर यह योजना कामयाब रही तो इससे मकान खरीदारों, रियल एस्टेट डेवलपरों और फाइनैंसरों को मदद मिलेगी। बाजार सूत्रों के मुताबिक इस फंडिंग से 1,500 परियोजनाओं को मदद मिलेगी और अटकी पड़ी करीब आधी परियोजनाएं अगले तीन साल में पटरी पर आ जाएंगी। 
 
यह योजना अमेरिका में अक्टूबर 2008 की शुरुआत में लाई गई योजना ट्रबल्ड ऐसेट रिलीफ प्रोग्राम (टीएआरपी) का लघु संस्करण है। टीएआपी का मकसद 2008 के आर्थिक संकट के कारण वित्तीय व्यवस्था को बचाना था। इसके तहत अमेरिकी वित्त विभाग ने वाणिज्यिक और निवेश बैंकों से गिरवी रखी प्रतिभूतियों और शेयरों को खरीद लिया था। टीएआरपी 2008 से 2010 तक चली और यह योजना वित्तीय रूप से सफल थी और इससे वित्त विभाग को फायदा हुआ। इस प्रक्रिया में टीएआरपी ने उन लापरवाह और दुस्साहसी फाइनैंंसरों को राहत पहुंचाई जो मुख्य रूप से संकट के लिए जिम्मेदार थे और इस तरह एक व्यवस्था के मूल में सुधार का मौका गंवा दिया। इसी तरह भारत में रियल एस्टेट कोष वांछनीय है लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे लापरवाह वित्तीय कंपनियां और जिद्दी रियल एस्टेट डेवलपरों का संकट दूर हो पाएगा? किसी भी स्थिति में इस कोष की सफलता कई कारकों पर निर्भर करेगी।
 
1. सवाल यह है कि तारणहार माने जा रहे एआईएफ का भुगतान सबसे पहले किसे होगा? सरकार द्वारा जारी किए गए 37 बिंदुओं के अक्सर पूछे जाने वाले सवालों (एफक्यूए) में इस अहम सवाल का जवाब नहीं दिया है? खुद को एआईएफ की जगह रखकर देखिए? सबसे पहले आप यह जानना चाहेंगे कि आपको नकदी प्रवाह में तरजीह मिलेगी या नहीं? आखिरकार इसका मकसद ऐसी परियोजनाओं को बचाना है जिनका प्रवर्तकों और बैंकों ने कबाड़ा कर दिया है। जाहिर तौर पर कई ऐसे मामले हैं जहां परियोजना का काम 80 से 90 फीसदी पूरा हो चुका है और यह अल्पावधि निजी सौदों के लिए तैयार है। एआईएफ यही काम करेगा। लेकिन इन सभी मामलों में संभावित निवेशक का यही सवाल होगा: 'चूंकि मैं एक अटकी हुई परियोजना को पूरा करने में मदद कर रहा हूं, तो क्या यह उचित है कि सबसे पहले मुझे अपना पैसा निकालने की अनुमति मिले।' बैंक इस पर सहमत नहीं हो सकते हैं। एआईएफ इसी स्थिति में होगा। अगर इसमें स्पष्टïता नहीं होगी तो निजी संस्थाएं एआईएफ में निवेश नहीं करेंगी और सरकार को इसके लिए विभिन्न सरकारी संस्थाओं को मजबूर करना पड़ेगा। आखिरकार इससे सरकार खजाने पर ही बोझ पड़ेगा। 
 
कुछ अन्य मसले भी हैं। एआईएफ एक ऋण कोष होगा। इसकी ब्याज दर कितनी होगी? कोष के साथ बैंकों और वित्तीय कंपनियों के अधिकार क्या होंगे जिनके लिए अपने पैसों की वसूली करना मुश्किल हो रहा है। अटकी परियोजनाओं पर निवेश को याद कीजिए जिन पर निवेश बढ़ता जा रहा है। इनमें से कई फंसे कर्ज बन चुके हैं या बनने के कगार पर हैं और जल्दी ही राष्टï्रीय कंपनी कानून पंचाट (एनसीएलटी) में होंगी। एफक्यूए इस बारे में स्पष्टï नहीं है, खासकर एआईएफ और बैंकों के अधिकार क्या होंगे।
 
2. प्रवर्तकों की क्या भूमिका होगी? यह माना जा रहा है कि इन सभी रुकी हुई परियोजनाओं का एकमात्र समाधान पैसा ही है। कुछ मामलों में ऐसा है। लेकिन अधिकांश मामलों में प्रवर्तक की गुणवत्ता जिम्मेदार है: खराब योजना, अतिमहत्त्वाकांक्षी परियोजनाएं, फंड अन्यत्र भेजना और कीमतों में कमी नहीं करना। एफएक्यू में कहा गया है कि एआईएफ यह सुनिश्चित करेगा कि फंड का इस्तेमाल परियोजनाओं को पूरा करने में हो लेकिन इसमें प्रवर्तकों की क्या भूमिका होगी? परियोजना को पूरा करने से काम पूरा नहीं होगा, पूरे बन चुके मकानों के लिए खरीदार भी खोजने होंगे। जाहिर है कि एआईएफ ऐसा नहीं कर सकता है। क्या प्रवर्तक कीमतों का निर्धारण जारी रखेंगे और बिक्री प्रक्रिया उनके जिम्मे होंगी? लेकिन कीमतों में कटौती से प्रवर्तकों के इनकार के कारण ही तो यह समस्या शुरू हुई। एफएक्यू में कहा गया है कि निवेश समीक्षा के हिस्से के रूप में निवेश प्रबंधक यह फैसला करेगा कि परियोजना का डेवलपर बदलने की जरूरत है या नहीं। यह बहुत अहम है लेकिन क्या वे ऐसा करेंगे?
 
3. मांग का मुद्दा: मान लीजिए कि रुकी हुई परियोजनाएं पूरी होती हैं और बाजार में आती हैं, तो फिर आगे क्या होगा? पहले ही बाजार में मांग से ज्यादा आपूर्ति है। यह मनोबल तोडऩे वाला गणित है। रियल एस्टेट एजेंटों के मुताबिक भारत में आठ अहम शहरों मुंबई, राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र, बेंगलूरु, चेन्नई, हैदराबाद, अहमदाबाद, पुणे और कोलकाता में हर साल करीब 250,000 फ्लैट बिकते हैं। इन शहरों में मामूली रूप से बिक्री (करीब 5 फीसदी) बढ़ रही है। मौजूदा परियोजनाओं के कारण पहले ही मांग से ज्यादा आपूर्ति है। नई परियोजनाओं (20 फीसदी वृद्घि) के कारण पहले की आपूर्ति वास्तविक मांग से ज्यादा हो चुकी है। इस पर अगर रुकी परियोजनाओं के 15 लाख यूनिट भी बाजार में आ गए तो फिर इन्हें कौन खरीदेगा? इस आपूर्ति को खपाने में कई साल लग जाएंगे। 
 
शायद सरकार को इस कोष के साथ कुछ और उपाय भी करने चाहिए थे। पहला उपाय यह हो सकता है कि पूरी हो चुकी परियोजनाओं पर खरीदारों को ब्याज में छूट दी जाए। दूसरे उपाय में ऐसे मजबूत डेवलपरों को विलय एवं अधिग्रहण के लिए प्रोत्साहित किया जाए जो रुकी हुई परियोजनाओं को लेने के लिए बैंकरों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं। रियल्टी क्षेत्र को पटरी पर लौटाने के लिए ऐसा करना अपरिहार्य है। तीसरा उपाय यह है कि प्रवर्तकों को कीमतों में कटौती करने और मांग बढ़ाने के लिए अच्छा काम करने वाले प्रवर्तकों को प्रोत्साहित किया जा सकता है और ऐसा नहीं करने वाले प्रवर्तकों को दंडित किया जा सकता है। पूरी अर्थव्यवस्था की तरह रियल्टी में भी आपूर्ति से ज्यादा मांग पर ध्यान देने की जरूरत है। 
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