बिजनेस स्टैंडर्ड - स्थिरता को प्राथमिकता
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स्थिरता को प्राथमिकता

संपादकीय /  November 13, 2019

सरकार देश को कारोबार के लिए सुगम बनाना चाहती है और इस क्रम में उसने केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर सुधार को बढ़ावा दिया है। उसके कुछ प्रयासों को सफलता भी मिली और विश्व बैंक की कारोबारी सुगमता सूची में भारत की रैंकिंग में सुधार हुआ। आशा है कि इससे घरेलू और वैश्विक दोनों स्तरों पर निवेश में सुधार करने में मदद मिलेगी। परंतु यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि आखिर पूंजी के भारी नुकसान का जोखिम होने पर भी निवेशक भारत क्यों आना चाहते हैं? वह भी तब जबकि खुद भारतीय राज्य एक बड़ा जोखिम बना हुआ है। एक अहम जोखिम इस आशंका से जुड़ा हुआ है कि चुनाव के बाद सत्ता प्रतिष्ठान में बदलाव होने पर सरकार समझौतों को नकार सकती है। आंध्र प्रदेश का घटनाक्रम इसकी बानगी है। जगन मोहन रेड्डी के नेतृत्व वाली प्रदेश की नई सरकार ने पहले कहा था कि वह बिजली खरीद समझौतों को दोबारा तय करेगी। इसके बाद देशभर में नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र का निवेश संकट में पड़ गया। अब खबर है कि सरकार राज्य की नई राजधानी अमरावती की एक विकास परियोजना को समाप्त कर रही है जिसके तहत नए शहर में कृष्णा नदी के तट पर एक वाणिज्यिक अचल संपत्ति क्षेत्र विकसित किया जाना था। 

 
इसके तहत वह समझौता भी समाप्त किया जाएगा जो सिंगापुर के निवेशकों के साथ हस्ताक्षरित था। अमरावती परियोजना को इस बात की नजीर होना था कि कैसे विदेशी पूंजी भारतीय राज्य के साथ मिलकर काम कर सकती है और कैसे इसकी मदद से विश्व स्तरीय बुनियादी ढांचा विकसित किया जा सकता है। इसके बजाय अब एकदम उलट होता नजर आ रहा है। ऐसे जोखिम अखिल भारतीय स्तर पर भी बढ़े हैं। वोडाफोन द्वारा पहली छमाही के नतीजे घोषित करने के बाद उसके मुख्य कार्याधिकारी निक रीड ने मीडिया से बातचीत में कहा कि भारत में कंपनी की हालत खराब है। यह इसलिए हुआ क्योंकि सरकार कंपनी के साथ राजस्व साझेदारी के एक मसले को सर्वोच्च न्यायालय तक ले गई। सर्वोच्च न्यायालय ने अब कर्ज में डूबे दूरसंचार क्षेत्र से कहा है कि वह सरकार को 13 अरब डॉलर की राशि चुकाए। इसमें वोडाफोन-आइडिया की हिस्सेदारी 4 अरब डॉलर की है।
 
न्यायिक निर्णय के लिए सरकार उत्तरदायी नहीं है लेकिन मामले को इस स्तर तक पहुंचाने में उसकी भूमिका है। साथ ही उसने इस बात पर भी विचार नहीं किया है कि इन मांगों का इस क्षेत्र के मुनाफे और निवेश पर क्या असर पड़ रहा है। वोडाफोन का यह कहना सही है कि कंपनी भारत के सबसे बड़े विदेशी निवेशकों में शामिल है। ऐसे में बुनियादी ढांचा आदि क्षेत्रों में काम कर रहे अन्य बड़े निवेशकों पर क्या असर होगा जिनका सरकार के साथ साझेदारी करना लाजिमी है? वे दूरसंचार क्षेत्र की घटनाओं से क्या सबक लेंगे? ऐसा लगता है कि अब सरकार का निशाना सफल साबित हुए ई-कॉमर्स क्षेत्र पर है। यह क्षेत्र भी उच्च निवेश वाला है। मंत्रिगण अक्सर इस क्षेत्र में आक्रामक मूल्य निर्धारण की बात करते नजर आते हैं और सरकार ने भारी निवेश होने के बाद इस क्षेत्र की कारोबारी शर्तों में तब्दीली की। साधारण सी बात यह है कि जब तक सरकार नीतिगत स्थिरता की प्रतिबद्धता के बजाय राजनीतिक निहितार्थों पर ध्यान देगी तब तक देश में निवेश और वृद्धि दोनों प्रभावित होंगे। यह बहुत अहम है कि केंद्र और राज्य सरकारें दोनों निवेश को लेकर अपने रुख पर पुनर्विचार करें और नीतिगत स्थिरता को प्राथमिकता दें।
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