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वक्त के साथ बदलकर चमक रहा 'ब्रांड अमिताभ'

सोहिनी दास /  November 12, 2019

पिछले दिनों बीकानेर के नमकीन बनाने वाले ब्रांड 'बीकाजी' का एक विज्ञापन में टेलीविजन पर नजर आया, जिसमें 77 साल के अमिताभ बच्चन नमकीन के एक पैकेट पर किसी सहयात्री के साथ बच्चों की तरह बहस कर रहे थे। ब्रांड पिछले 17-18 साल में पैदा हुए युवाओं को पारंपरिक भारतीय नमकीनों के साथ जोडऩा चाहता है। इन नमकीनों को वैश्विक ब्रांडों के अधिक 'आधुनिक' उत्पादों से तगड़ी टक्कर मिल रही है। बीकाजी ने अपनी पहुंच बढ़ाने और 'कूल-देसी' ब्रांड के तौर पर अपनी पहचान बनाने के लिए अमिताभ को चुना। इसीलिए उसकी टैगलाइन है 'अमित जी लाइक्स बीकाजी।' विशेषज्ञों को लगता है कि अमिताभ की 'सुलझे हुए और वक्त के हिसाब से चलने वाले बुजुर्ग' की शख्सियत ही विज्ञापन में नजर आने वाली हस्ती के तौर पर उनकी सबसे बड़ी दौलत है।

 
मोगे मीडिया के संस्थापक संदीप गोयल कहते हैं, 'उनके बराबर किसी की हस्ती ही नहीं है और न ही कोई उनका हमउम्र है। वह कई दशकों से प्रासंगिक बने हुए हैं और उनकी शख्सियत सुलझी हुई तथा आधुनिक ही रही है। वह इतने सालों से उद्योग में बने हुए हैं, यही देखकर उन पर भरोसा कई गुना बढ़ जाता है।' पचास साल के अपने करियर में अमिताभ फिल्म अभिनेता, निर्माता, टेलीविजन प्रस्तोता, शौकिया पाश्र्वगायक और राजनेता बनकर हमारे सामने आए हैं। 1970 के दशक में बड़े पर्दे पर उनकी एंग्री यंग मैन की छवि छाई हुई थी और उन्हें देखकर लगता था कि 'गुस्सा अच्छा है'। अब उन्हें देखकर किसी दयालु बुजुर्ग की छवि उभरती है।
 
विशेषज्ञ मानते हैं कि बच्चन अपनी छवि गढ़ते में खूब सावधानी बरतते हैं। मसलन फोटो और वीडियो शेयरिंग प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर हाल ही में उन्हें चटख लाल रंग का विंडचीटर पहने देख गया। उनके पोस्ट में लिखा है, 'कलरफुल एट वर्क... टू मच कलर हैपनिंग..' यानी 'काम करने में मजा... बहुत-बहुत मजा...'। दूसरी तस्वीर में वह नीला चश्मा लगाए हैं और उनके बालों में एक लट भी नीले रंग की है। वेलस्पन होम फर्निशिंग के एक विज्ञापन में वह ऐसे ही नजर आए थे। कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान जब अमिताभ की जिंदगी खतरे में पड़ी, उनकी फिल्में बॉक्स ऑफिस पर दम तोडऩे लगीं या राजनीति में उन्हें नाकामी मिली तो हर बार कई फिल्मी पंडित उनके करियर को खत्म बताते नजर आए। लेकिन सदी के महानायक ने ब्रांड अमिताभ को नए सिरे से गढ़ दिया। इसकी शुरुआत लोकप्रिय टेलीविज शो कौन बनेगा करोड़पति यानी 'केबीसी' से हुई और उसके बाद उन्होंने मुड़कर नहीं देखा।
 
ब्रांडों को जल्द ही समझ आ गया कि अमिताभ के भीतर अब भी वह करिश्मा है, जो हफ्ते के किसी भी दिन पूरे परिवार को टीवी के आगे बिठा सकता है। हाइपरकलेक्टिव के मुख्य क्रिएटिव अधिकारी केवी श्रीधर याद करते हैं कि जब वह अमिताभ को साथ लेकर विज्ञापन बनाने की सोच रहे थे तो ब्रांड कितने संशय में थे। श्रीधर बताते हैं, 'कई ब्रांडों को लगा कि अब उनमें भीड़ खींचने की कुव्वत नहीं रही। केबीसी के बाद शोध में पता चला कि उस वक्त के युवा और किशोर उन्हें एंग्री यंग मैन नहीं बल्कि 'केबीसी अंकल' के तौर पर जानते थे। अपने शो में वह खूब चुटकुले सुनाते थे, हाजिरजवाब थे, इसलिए लोग उन्हें पसंद करने लगे थे।'
 
बच्चन ने आर बाल्की की चीनी कम (2007) और पा (2009) में तथा शुजित सरकार की पीकू (2015) और पिंक (2016) में कुछ अलहदा किस्म के किरदार निभाए। श्रीधर बताते हैं कि लोवे लिंटास में उनके साथ काम करने वाले बाल्की अमिताभ की ही फिल्में देखक बड़े हुए थे और अमिताभ को केंद्र में रखकर कहानी लिखना उनका बचपन का सपना था। श्रीधर को लगता है, 'अमिताभ ने कई फिल्मों में ऐसे मुख्य किरदार निभाए, जिन्हें कोई और कर ही नहीं सकता था। इसकी वजह से उनकी छवि एकदम बदल गई।'
 
वक्त बदला और उम्र बढ़ी तो अमिताभ ने खुद को टेलीविजन कलाकार, लाड़ करने वाले पिता, समर्पित पति और बाद में सेहत की बात करने वाले शख्स की छवि में ढाल लिया। बतौर अदाकार 50 साल पूरे करने जा रहे अमिताभ को पिछले महीने ही प्रतिष्ठित दादा साहेब फालके पुरस्कार देने का ऐलान किया गया। इससे ब्रांड अमिताभ में कोई बदलाव आया? विशेषज्ञों को कोई बदलाव नजर नहीं आता। ब्रांड इंटेलिजेंस और डेटा इनसाइट प्रदान करने वाली कंपनी टीआरए के मुख्य कार्य अधिकारी एन चंद्रमौलि कहते हैं, 'वह सदाबहार हैं क्योंकि वह खुद को लगातार बदलते रहते हैं।' टीआरए रिसर्च की वर्ष 2019 की सबसे भरोसेमंद हस्तियों की सूची में अमिताभ बॉलीवुड के सबसे भरोसेमंद शख्स रहे।
 
चंद्रमौलि मानते हैं कि नाकामियों के बाद भी वापसी करने की अमिताभ की कुव्वत और काबिलियत ने उनकी विश्वसनीयता को कई गुना बढ़ाया है। मगर इसका दूसरा पहलू यह भी है कि उनका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है। चंद्रमौलि कहते हैं, 'उदाहरण के लिए जस्टडायल कैंपेन में जो भी प्रमाण पत्र दिया जाता है, उस पर अमिताभ का चेहरा बना होता है। बेशक विज्ञापनों में बहुत ज्यादा नजर आने से भरोसे में कमी नहीं आती मगर किसी भी ब्रांड के लिए यह बहुत अच्छी बात तो वाकई नहीं है।' गोयल भी उनकी बात से सहमत नजर आते हैं। उनका कहना है, 'भारत में चर्चित हस्तियां विज्ञापन देने वालों को इनकार करना नहीं सीख पाई हैं। उन्हें चुनाव करना सीखना होगा। रोजर फेडरर ज्यादा से ज्यादा 4 या 5 ब्रांडों के प्रचार की हामी भरते हैं और करीब 25 ब्रांडों का विज्ञापन करने वाले विराट कोहली से ज्यादा कमा लेते हैं।'
 
कोई हस्ती अगर ढेर सारे विज्ञापनों में नजर आए तो लोग उन विज्ञापनों को याद नहीं रख पाते। उद्योग पर नजर रखने वाले यह भी कहते हैं कि दो साल पहले अमिताभ को हरेक ब्रांड पर औसतन 5 करोड़ रुपये मिलते थे, जो घटकर 3 करोड़ रुपये ही रह गए हैं। विशेषज्ञों को अर्थव्यवस्था में आई मंदी इसकी एक वजह लगती है। लेकिन कुछ हस्तियां अब केवल 50 लाख रुपये में विज्ञापन करने को तैयार हैं। ऐसे में खरीदारों पर उनकी बातों का असर भी शायद कम होता जा रहा है।
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