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'मेरा परिवार भी पीडि़त, मगर मैं क्या करूं'

संजीव मुखर्जी /  November 11, 2019

पचहत्तर साल की महेंद्र कौर पिछले कुछ वर्षों से सांस की समस्या से पीडि़त हैं। सर्दियों में, खास तौर पर दीवाली के बाद उनकी परेशानी काफी बढ़ जाती है। यह वह समय है जब उनके पति जोगिंदर सिंह पंजाब के पटियाला जिले के नाभा तहसील के मोहाल गवारा गांव में अपने 15 एकड़ खेत में फसलों की ठूंठ (पराली) जलाते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो कौर की जिंदगी खेतों में लगाई जाने वाली आग से उठने वाले खतरनाक धुंओं के बीच झूल रही है और इसी धुएं की वजह से राष्टï्रीय राजधानी क्षेत्र में भी गंभीर प्रदूषण का खतरा बढ़ा है।

 
हर साल गेहूं और धान की खेती करने वाले सिंह ने कहा, 'पिछले कुछ वर्षों से दवाओं पर मेरी पत्नी की निर्भरता बढ़ गई है और उन्हें बार-बार डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है।' वह कहते हैं, 'मैं जानता हूं कि पराली जलाना गलत है और इससे मेरे खुद के परिवार की सेहत पर बुरा असर पड़ रहा है लेकिन आप ही बताएं मैं क्या कर सकता हूं? क्या हमारे पास कोई विकल्प है?' सिंह फसल अवशिष्टï को काटकर खेतों से हटाने के लिए मशीन खरीदने या उसे किराये पर लेने का खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने कहा, '15 एकड़ में हमें तीन बार ट्रैक्टर चलाने होंगे - अवशिष्टï काटने, उसे उलट-पलट करने और फिर खेत को समतल करने के लिए। एक ट्रैक्टर में करीब 65 से 70 लीटर डीजल की खपत होगी, जबकि मैं पहले से ही काफी लागत खर्च कर चुका हूं। सबसे अहम यह कि मैं इसके लिए अलग मशीन कैसे खरीद सकता हूं जिसकी कीमत डेढ़ लाख रुपये से कम नहीं होती है।' सिंह का मानना है कि उनके जैसे किसानों के लिए श्रेष्ठï विकल्प यह है कि सामूहिक रूप से फसल कटाई की मशीन का उपयोग किया जाए और बचे हुए अवशिष्टï को जला दिया जाए। सिंह ने कहा, 'हम धान की कटाई के लिए हार्वेस्टर पर निर्भर हैं और इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।'
 
इलाके के अधिकांश किसानों का भी कुछ ऐसा ही कहना था। वे उच्चतम न्यायालय के आदेश का स्वागत करते हैं, जिसमें पराली प्रबंधन के लिए प्रति क्विंटल 100 रुपये की अंतरित राहत देने का आदेश दिया गया है। लेकिन अधिकांश का मानना है कि जब तक इस समस्या का व्यवहारिक और दीर्घावधि का समाधान नहीं मिल जाता है, पराली जलाने  बंद नहीं किया जा सकता। कृषि मंत्रालय के अनुसार 1 अक्टूबर से 3 नवंबर के दौरान पंजाब, हरियाण और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पराली जलाने के 31,402 मामले सामने आए हैं, जिनमें से 80 फीसदी से ज्यादा मामले अकेले पंजाब के हैं। हालांकि पिछले साल के मुकाबले पराली जलाने के मामले में करीब 12 फीसदी की कमी आई है।
 
नाभा के कोट खुर्द गांव के प्रीतम सिंह ने कहा कि पुराने समय में जब हाथ से धान की कटाई की जाती थी तो फसल का अवशिष्टï खेतों में नहीं बचता था लेकिन मजदूरों की कमी के कारण अब खेती का तरीका बदल गया है। जोगिंदर सिंह ने सहमति जताते हुए कहा कि आजकल हार्वेस्टर चलाने के लिए भी मजदूर मिलना कठिन हो गया है। दिलचस्प है कि नाभा कृषि मशीन उद्योग के लिए जाना जाता है। इलाके में करीब 200 से 300 इकाइयों हैं जो कृषि मशीन का कारोबार करती हैं। यहां के कंबाइन हार्वेस्टर को देश भर में बेचा जाता है।
 
लेकिन कंबाइन हार्वेस्टर के इस्तेमाल और पराली जलाने से इलाके के लोगों की सेहत पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। नाभा के सिविल अस्पताल की वरिष्ठï चिकित्सा अधिकारी डॉ. दलबीर कौर ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों से पराली जलाने के समय छाती और आंखों से संबंधित समस्याएं लेकर अस्पताल आने वाले मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।  कौर कहती हैं, 'हमारे पास ओपीडी में रोजाना करीब 800 से 900 मरीज आते हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों के दौरान यह संख्या कम से कम 15 से 20 फीसदी बढ़ गई है।' कौर साफ-सुथरे मगर भीड़-भाड़ वाले अस्पताल में बैठी हैं। वह कहती हैं कि इससे सबसे ज्यादा प्रभावित बूूढ़े और कमजोर व्यक्ति होते हैं।  कौर ने कहा, 'हम उन्हें सलाह देते हैं कि घर के अंदर रहें और दवा लें। लेकिन हम अपने स्तर पर कोई बड़ी पहल नहीं कर सकते क्योंकि प्रदूषण हमारे नियंत्रण से बाहर है।' उनका मानना है कि किसान अपने इलाकों और कई सौ किलोमीटर दूर स्थित शहरों में प्रदूषण के स्तर में भारी बढ़ोतरी के लिए जिम्मेदार हैं। वहीं किसान कहते हैं कि अगर प्राधिकारी ऐसे वैकल्पिक समाधान नहीं मुहैया कराते हैं, जिन्हें प्रभावी तरीके से लागू किया जा सके तो हम अपने स्तर पर बहुत कुछ नहीं कर सकते। 
 
घानुड़की गांव के चमकौर सिंह ने अपनी पराली का एक वैकल्पिक समाधान खोजने की कोशिश की थी, लेकिन अब वह इसे पछताते हैं। उन्होंने दो साल पहले अपनी पराली पटियाला के पंजाब बायोमास पावर प्लांट को 11.50 लाख रुपये में बेची थी। लेकिन उन्हें अब तक महज 2.45 लाख रुपये मिले हैं। चमकौर सिंह अपनी बकाया रकम वसूलने के लिए यहां से वहां चक्कर लगा रहे हैं। वह कहते हैं, 'मैं और मेरे गांव के 40 अन्य किसान गेहूं की बुआई के बाद मुंबई जाकर कंपनी के प्रतिनिधियों से मिलेंगे और अपनी बकाया राशि हासिल करने की कोशिश करेंगे।' (मीडिया खबरों में दावा किया गया है कि पंजाब बायोमास पावर प्लांट बंद हो चुका है क्योंकि यह पिछले कुछ वर्षों घाटे में चल रहा था।)
 
चमकौर सिंह ने सवाल किया, 'अब भी मैं धान की पराली नहीं जलाता हूं और विकल्प तलाशता हूं। लेकिन मैं कितने समय तक ऐसा कर सकता हंू।' पंजाब सरकार बायोमास पावर प्लांटों की स्थापना को प्रोत्साहन देने की कोशिश कर रही है, जिनमें पराली का अच्छा इस्तेमाल हो सकता है। पंजाब ऊर्जा विकास प्राधिकरण (पीईडीए) की वेबसाइट के मुताबिक 13 बायोमास आधारित विद्युत संयंत्र परियोजनाओं का आवंटन किया गया है, जिनमें से पांच चालू हो गई  हैं।  फसल की पराली में सिलिका की मात्रा अधिक होती है। इस वजह से बायोमास पावर प्लांटों को पराली के प्रसंस्करण से पहले इसमें सिलिका को हटाने के लिए अतिरिक्त निवेश करना पड़ता है। यही कारण है कि निजी उद्यमियों की पराली का इस्तेमाल करने वाले बायोमास विद्युत इकाइयों की स्थापना में रुचि नहीं है। हालांकि अब राज्य सरकार निवेशकों को बिजली की आकर्षक दरें मुहैया कराने की कोशिश कर रही है, जिससे बहुत से निजी उद्यमियों ने इन संयंत्रों की स्थापना में रुचि दिखाना शुरू किया है। 
 
लेकिन धान की पराली के निपटान के लिए अन्य कई सस्ते विकल्प भी उपलब्ध हैं। एक तरीका यह है कि किसानों को धान और गेहूं की लंबी अवधि की फसल उगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। लेकिन किसान इसके लिए धान और गेहूं की तरह आय का आश्वासन चाहते हैं। भारतीय किसान यूनियन (राजेवाल) के महासचिव ओमकार सिंह खेड़ा ने कहा, 'अब हम धान नहीं उगाना चाहते हैं। लेकिन हमें उन फसलों के लिए लाभकारी वैकल्पिक इंतजाम चाहिए, जो हम धान के बदले उगा सकें। इसके अलावा कृषि आधारित उद्योगों या सरकार द्वारा खरीद का आश्वासन चाहिए।'
 
खेड़ा ने कहा कि इस क्षेत्र के किसान बासमती चावल उगा सकते हैं, जिसे चावल की अन्य किस्मों की तुलना में कम पानी की जरूरत होती है। इसमें पराली की समस्या भी पैदा नहीं होती है। लेकिन किसानों को बासमती की खेती के लिए प्रोत्साहित करने की खातिर उन्हें कम से कम 3,000 रुपये प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य का आश्वासन देना होगा। 
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