बिजनेस स्टैंडर्ड - पराली जलाने से रोकने के लिए किसानों को देना होगा मुआवजा
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पराली जलाने से रोकने के लिए किसानों को देना होगा मुआवजा

सम सामयिक
टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  November 11, 2019

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) का करीब 55,000 वर्ग किलोमीटर इलाका गत 10 वर्षों से हर साल इस समय भयंकर  प्रदूषण की चपेट में आ जाता है। खेतों में खड़ी पराली को जलाना इसके कई कारकों में से एक है। हर साल अक्टूबर की शुरुआत होते ही धान की कटाई होने लगती है। दिल्ली, पंजाब और हरियाणा की सरकारें किसानों को पराली न जलाने के लिए मनाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन किसान उनकी बात नहीं मान रहे हैं क्योंकि उनके पास कोई चारा नहीं है। इसकी वजह से गतिरोध की स्थिति पैदा हो गई है। वैसे यह गतिरोध दूर किया जा सकता है लेकिन उसके लिए पहले समस्या को परखना होगा। निदान यह है कि पराली जलाना नहीं बल्कि धान की खेती ही असल समस्या है। 

 
पंजाब और हरियाणा परंपरागत तौर पर धान की खेती करने वाले राज्य नहीं हैं क्योंकि इस फसल के लिए पानी की अधिक जरूरत होती है लेकिन दक्षिण या पूर्वी भारत की तुलना में इन राज्यों में प्राकृतिक तौर पर पानी कम है। इसके बावजूद पंजाब और हरियाणा सरकारों ने गत दो दशकों में पानी और बिजली की मुफ्त आपूर्ति कर अनजाने में ही किसानों को धान उगाने के लिए प्रेरित किया है। आज यहां करीब 1.5 करोड़ टन उपज हो रही है। यह मामला अर्थशास्त्र की नजर में पूरी तरह से नकारात्मक बाह्यता का है। 'श्रीमान ए' अपना लाभ 'श्रीमान बी' की कीमत पर बढ़ाते हैं। 
 
'श्रीमान ए' के कार्य 'श्रीमान बी' के लिए नकारात्मक बाह्यता का निर्माण करते हैं। पराली जलाने की समस्या भी यही है। धान की खेती कम करने का एक तरीका यह है कि किसानों से खेती में इस्तेमाल होने वाली बिजली और पानी पर शुल्क लिया जाए। लेकिन उससे उनकी आय और भी कम हो जाएगी। बेहद प्रतिस्पद्र्धी लोकतंत्र में ऐसा कर पाना व्यावहारिक नहीं है। फिर क्या किया जाना चाहिए? अर्थशास्त्र का कोज सिद्धांत नकारात्मक बाह्यता की समस्या के आंशिक समाधान की बात करता है। इस सिद्धांत के प्रतिपादक स्वर्गीय रोनाल्ड कोज को 1991 में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
 
प्रदूषक को मुआवजा : कोज सिद्धांत कई अगर-मगर की बात करता है लेकिन इसका मूल संदेश यही है कि अगर आपको मुनासिब लगे तो प्रताडऩा बंद करने के लिए अपने उत्पीड़क को भुगतान कर दें। भारत और चीन ने जलवायु परिवर्तन संबंधी मुद्दों पर ऐसे ही मुआवजे की मांग वैश्विक स्तर पर की थी। लेकिन दुनिया को यह मुआवजा देना मुनासिब नहीं लगा और आज हर कोई खराब हालत में है। बहरहाल इसका अहसास करने के लिए आप एकदम सटे तीन मकानों का उदाहरण ले सकते हैं। बीच वाले मकान के निवासी बाकी दोनों मकानों में रहने वाले लोगों से अधिक संपन्न हैं। गरीब घरवालों ने मकान के बाहर चहारदीवारी से सटकर शौचालय बनाया हुआ है। इसका नतीजा यह होता है कि बीच वाले मकान में दोनों तरफ से दुर्गंध पहुंचती रहती है। 
 
बीच वाले मकान के संपन्न मालिक के पास पांच विकल्प हैं- बगल के दोनों मकानों को खरीद लेना, अपना घर बेचकर कहीं और चले जाना, दोनों पड़ोसियों को घर के भीतर शौचालय बनवाने के लिए पैसे देना, घर के बाहर बने शौचालयों पर रोक के लिए सरकार को राजी करना और इस मामले में दखल देने की अदालत से गुहार लगाना। अमीर मकान वाले को इनमें से क्या करना चाहिए? इस सवाल का जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि हरेक विकल्प की लागत कितनी है? देखने पर तो यही लगता है कि दोनों पड़ोसियों के शौचालय बनवाने का खर्च देना सबसे सस्ता विकल्प है। लेकिन अगर दोनों पड़ोसी वसूली पर उतारू हो जाएं तो ऐसा नहीं भी हो सकता है। अक्सर ऐसा ही होता है। वह सरकार पर आश्रित भी नहीं हो सकता है क्योंकि सत्तासीन दल को एक के बजाय दो परिवारों के मतों की जरूरत अधिक होगी। वहीं अदालतें भी ऐसे फरमान सुनाएंगी जिन्हें लागू नहीं किया जा सकता है। इसी वजह से यह मूल सवाल खड़ा होता है कि अमीर मकान मालिक को अपना पूरा घर बदबू से भर जाने और पानी की आपूर्ति को दूषित होने से रोकने की कीमत क्या है?
 
आसान नहीं रास्ता : दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पंजाब और हरियाणा की सरकारों को भी इसी सवाल का जवाब देना है। एक रास्ता यह है कि किसानों को धान की खेती नहीं करने के लिए भुगतान किया जाए। करीब 36,000 रुपये प्रति टन के भाव वाले धान की उपज इन राज्यों में करीब 1.5 करोड़ टन है। इस हिसाब से काफी बड़ी राशि देनी पड़ेगी। यह लागत दिल्ली-एनसीआर के करीब पांच करोड़ लोगों पर म्युनिसिपल टैक्स या उपकर लगाकर जुटाई जा सकती है। इसका मतलब है कि प्रति व्यक्ति को प्रति वर्ष करीब 10,000 रुपये का कर देना होगा। लेकिन यह सवाल पूछा जा सकता है कि अगर आप किसानों को धान न उगाने के लिए मुआवजा दे सकते हैं तो फिर सभी प्रदूषकों को क्यों नहीं? कार मालिकों को भी गाड़ी न चलाने, कोयला-आधारित बिजली संयंत्रों को बंद करने और निर्माण कंपनियों को निर्माण न करने के लिए भी मुआवजा दिया जाए?
 
लिहाजा हम स्थायी निषेध के बजाय अस्थायी समाधान पर ही लौट आते हैं। इसमें तकनीकी समाधानों, बेहतर ईंधन के समकक्ष और बेहतर कार इंजनों की भी जरूरत है। कुछ लोग कहते हैं कि हम पराली के लिए बाजार पैदा कर सकते हैं लेकिन इतने अधिक कृषि अवशिष्ट को बाहर कैसे निकालेंगे? दरअसल, ठिकाने लगाने का सबसे सस्ता तरीका होने से ही पराली को जला दिया जाता है। आप खुद यह देख सकते हैं कि कोई भी तरीका सस्ता नहीं है। किसी को तो समाधान की लागत उठानी होगी और प्रदूषण फैलाने वालों को छोड़कर हर किसी को वह बोझ साझा करना होगा। लेकिन पराली जलाने की समस्या केवल एक महीने तक ही रहने से इस लागत की भरपाई के लिए कोई भी तैयार नहीं होगा।
 
निष्कर्ष: आप साफ हवा नहीं ले सकते हैं अगर आप इसका भुगतान नहीं करेंगे। वायु प्रदूषण तो हर रोज की समस्या है।
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