बिजनेस स्टैंडर्ड - गुणवत्ता शेयरों में असामान्य उछाल
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गुणवत्ता शेयरों में असामान्य उछाल

आकाश प्रकाश /  November 11, 2019

मजबूत बैलेंस शीट और स्वच्छ प्रशासन से कंपनियों को शेयरों से जुड़े जोखिम से बचने में उल्लेखनीय मदद मिली है। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं आकाश प्रकाश 

 
ऐबेकस ऐसेट मैनेजर के सुनील सिंघानिया ने भारत में गुणवत्तापूर्ण शेयरों की कीमतों में असामान्य उछाल को लेकर एक दिलचस्प लेख लिखा है। सिंघानिया एक चतुर निवेशक हैं, उनका रिकॉर्ड अच्छा रहा है और वह बाजार के पुराने खिलाड़ी हैं। उन्होंने हर तरह का दौर देखा है। शेयर बाजार के सभी निवेशकों और छात्रों को उनका आलेख पढऩा चाहिए। वह कहते हैं कि देश में गुणवत्तापूर्ण शेयर काफी ऊंची दरों पर हैं। अगर हम संबंधित कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन पर नजर डालें या वैश्विक समकक्षों से उनकी तुलना करें तो यह कीमत वाजिब नहीं प्रतीत होती। उच्च आरंभिक मूल्यांकन को देखते हुए ये कंपनियां 10 वर्ष की अवधि में बहुत कम या नकारात्मक प्रतिफल देंगी। ऐसे में वह कहते हैं कि निवेशकों को इन कंपनियों से परे अपना पोर्टफोलियो व्यापक बनाना चाहिए।
 
अपनी इस दलील को साबित करने के लिए उन्होंने इन उच्च गुणवत्ता, उच्च मूल्य आय अनुपात वाले शेयरों का अध्ययन किया और 2010 से अब तक उनके वित्तीय प्रदर्शन का आकलन किया। इनमें एचयूएल, एशियन पेंट्स, नेस्ले इंडिया, एबीबी, बर्गर पेंट्स और पिडिलाइट समेत 27 गुणवत्ता वाले शेयर शामिल थे। इन कंपनियों का मूल्य आय चर 65 गुना से अधिक था। कंपनियों की वित्तीय स्थिति का अध्ययन कर उन्होंने पता लगाया कि बीते नौ साल में इनकी औसत कर पूर्व वृद्धि बमुश्किल 12 फीसदी रही है और शुद्ध लाभ 11 फीसदी। ये आंकड़े व्यापक बाजार से बेहतर लेकिन 13 फीसदी की नॉमिनल जीडीपी वृद्धि से कम हैं। उनका सवाल है कि इस स्थिति में निवेशकों को इन पर इतना व्यय क्यों करना चाहिए? इस सूची में 20 फीसदी से अधिक मुनाफा वृद्धि वाली इकलौती कंपनी टाइटन है। 
 
इसके बाद इस पर्चे में मूल्यांकन पर अधिक बुनियादी दृष्टि से विचार किया गया है। डिस्काउंटेड कैश फ्लो (डीसीएफ) को उलटकर देखें तो मौजूदा मूल्य पर वृद्धि अनुमान को समझा जा सकता है। ऐबेकस की टीम ने एचयूएल के मामले में पाया कि मौजूदा मूल्यांकन को उचित ठहराने के लिए कंपनी को मुक्त नकदी प्रवाह में 25 वर्ष तक 12 फीसदी की वृद्धि दर हासिल करनी होगी। यह आसान नहीं है। इस पर्चे में एशियन पेंट्स और शेरविन विलियम की तुलना करते हुए कहा गया है कि शेरविन विलियम ने बीते नौ वर्ष के दौरान एशियन पेंट्स की तुलना में आय में उच्च वृद्धि और इक्विटी पर उच्च प्रतिफल हासिल किया लेकिन वह उसके एक तिहाई चर पर कारोबार कर रहा है। इसी प्रकार फेसबुक और अल्फाबेट का मुक्त नकद प्रवाह और वृद्धि अधिकांश गुणवत्ता वाले भारतीय शेयरों से बेहतर है लेकिन वह 30 गुना से कम आय पर कारोबार कर रहा है। प्रपत्र ने विभिन्न क्षेत्रों की तुलना कर बताया कि एचयूएल और नेस्ले इंडिया की बाजार हिस्सेदारी देश में सीमेंट, इस्पात और धातु क्षेत्र के समस्त कारोबार के बराबर है। ऐसा तब है जबकि मूल क्षेत्रों के शेयर बिक्री का 16 गुना और मुनाफे का 10 गुना हैं। 
 
सिंघानिया की दलील है कि यदि माना जाए कि अगले नौ वर्ष तक ये कंपनियां यही वृद्धि दर कायम रखेंगी तो इनमें से अधिकांश कंपनियों को 55 से 75 गुना के मूल्य आय चर पर व्यापार करना होगा। वह कहते हैं कि मुद्रास्फीति में ढांचागत गिरावट के बीच नॉमिनल जीडीपी आने वाले नौ वर्ष में 13 फीसदी पर नहीं रहेगी और तमाम कंपनियों के उच्च आधार के साथ अगले नौ वर्ष में इस प्रदर्शन को दोहराना भी मुश्किल होगा। दुनिया के किसी बाजार में लार्ज कैप शेयरों ने एक दशक तक ऐसे चरों पर कारोबार नहीं किया है। इस पर्चे में दिए गए तर्कों से मैं इत्तफाक रखता हूं। मेरा मानना है कि मूल्यांकन का अंतर उच्चतम स्तर तक पहुंच गया है। इसमें दो राय नहीं कि ऐबेकस ने जिन कंपनियों का जिक्र किया है, उनका कारोबार बहुत अच्छा है और पूंजी पर रिटर्न और मुक्त नकद प्रवाह के मामले में वे अच्छी हैं। हर कोई उनके शेयर चाहेगा लेकिन उनका मूल्य बहुत ज्यादा है।
 
भारत में बीते छह सात वर्षों में गुणवत्ता मूल्यांकन का प्रीमियम बढ़ा है। ऐसा तमाम कारोबारी क्षेत्र में मुनाफा कमजोर होने से हुआ है। सन 2019 में भारत और अमेरिका में कॉर्पोरेट मुनाफे का शेयर और जीडीपी अनुपात लगभग आठ फीसदी के समान स्तर पर था। आज अमेरिका में यह 10 फीसदी से अधिक है जबकि भारत में बमुश्किल 3.5 फीसदी रह गया है। भारतीय शेयर बाजारों की प्रति शेयर आय वृद्धि बीते छह वर्षों के दौरान पांच फीसदी से कम रही है। ऐसे कमजोर मुनाफे के साथ, स्थिर रूप से दो अंकों की आय वृद्धि दर्शा रही कोई भी कंपनी असंगत दिखेगी।
 
हमारे यहां कारोबारी प्रशासन की चूक के कई मामले भी देखने को मिले और कॉर्पोरेट जगत में एक किस्म का सफाई अभियान चल रहा है। शेयरों को लेकर बढ़े जोखिम के बीच सुरक्षित बही खातों और बेहतर संचालन वाली कंपनियों को लाभ हुआ। नियामकीय और न्यायिक हस्तक्षेपों के बीच वित्तीय तंत्र में नकदी की कमी तथा अन्य जोखिम के बीच पूंजी आधारित कारोबारी मॉडलों को चुनौती मिली है। निवेशकों ने भी सीमित निवेश आवश्यकता वाले कारोबारों को प्राथमिकता दी है। उपरोक्त तमाम बातें उच्च गुणवत्ता, उपभोक्तामुखी, कम पूंजी वाले कारोबार के लिए सकारात्मक माहौल बनाती हैं। इन कंपनियों के बेहतरीन प्रदर्शन के बाद भारत में निवेशकों के लिए यह कहना फैशनेबल हो गया है कि उनका निवेश रुख अच्छी कंपनियों में शेयर खरीदने और बिक्री नहीं करने का है। बेहतर कारोबार और प्रबंधन वाली कुछ कंपनियां ऐसी हो सकती हैं जिनके शेयर न बेचना सही रुख हो सकता है लेकिन ऐसी कंपनियां दुर्लभ हैं। क्या ऐसी कंपनियों से पोर्टफोलियो बन सकता है? चुनिंदा कंपनियां वृद्घि अनुमान पर खरी उतर सकती हैं लेकिन मौजूदा मूल्यांकन को देखकर लगता है कि शेयर कीमतों के बेहतरीन प्रदर्शन के दिन बीत गए।
 
बेहतर आर्थिक वृद्घि, बेहतर कारोबारी मुनाफे और संचालन के साथ बाजार का दायरा बढ़ेगा। देश की दीर्घावधि की वृद्घि की कहानी के लिए यह आवश्यक है। पूंजी आधारित कंपनियों की इक्विटी पूंजी की लागत ज्यादा है और इक्विटी बाजार तक पहुंच न के बराबर है। यदि हमें बुनियादी ढांचा मजबूत करना है और निजी क्षेत्र में निवेश का चक्र शुरू करना है तो इसमें बदलाव लाना होगा। दीर्घावधि की वृहद आर्थिक स्थिरता के लिए गुणवत्ता प्रीमियम में कमी करनी होगी। आशंकाओं में कमी आने के बाद नकदी की स्थिति सामान्य हो जाएगी और संचालन संबंधी समस्याएं दूर होंगी। इससे निवेशकों का जोखिम भी स्थिर होगा। 
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