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शेषन की विरासत

संपादकीय /  November 11, 2019

मतदाताओं के अधिकारों के अथक योद्धा तिरुनेल्लई नारायण शेषन का रविवार को 86 वर्ष की उम्र में चेन्नई में निधन हो गया। सारी सक्रिय जिंदगी लोक सेवा में व्यतीत करने वाले शेषन भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के सर्वोच्च पद कैबिनेट सचिव तक पहुंचे और वर्ष 1989 में राजीव गांधी के प्रधानमंत्री पद से हटने तक वह इस पद पर रहे। विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में वह योजना आयोग में रहे लेकिन कांग्रेस के समर्थन से सत्ता में आए चंद्रशेखर ने उन्हें देश का मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) नियुक्त कर दिया। सीईसी के पद पर रहने के दौरान ही शेषन ने अपना वह मुकाम बनाया कि पूरा देश उन्हें अपना नायक मानने लगा। 

 
शेषन के पहले तक चुनाव आयोग संविधान के तहत एक स्वतंत्र संस्था होने के बावजूद कई मायनों में सरकार की एक शाखा के तौर पर ही काम करता था। लेकिन शेषन ने यह सुनिश्चित किया कि चुनाव आयोग शब्दों में ही नहीं बल्कि कार्यों में भी स्वतंत्र संस्था बने। उन्होंने चुनावों में होने वाली गड़बडिय़ों की भारी-भरकम सूची तैयार करने के साथ ही निर्धारित नियमों का पालन नहीं करने पर कुछ केंद्रीय मंत्रियों की नकेल कसने से भी परहेज नहीं किया। उनकी निगरानी में उत्तर भारत के बड़े इलाके में 1993 में हुए विधानसभा चुनाव भारत के निर्वाचन इतिहास में मील का पत्थर साबित हुए। चुनाव में गड़बड़ी और हिंसा के लिए चर्चित इलाकों में भी अपेक्षाकृत स्वतंत्र एवं निष्पक्ष ढंग से चुनाव कराए गए थे। उन्होंने सरकार को यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य किया कि मतदाताओं को पहचान पत्र दिए जाएं। 
 
उन्होंने राज्यसभा के एक चुनाव में कानून का उल्लंघन होने के संदेह पर उसकी जांच भी की थी। उस चुनाव में तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह भी एक उम्मीदवार थे। शेषन का जीवन एवं कार्य हमें यह याद दिलाता है कि ठोस संवैधानिक समर्थन वाले संस्थानों को भी निर्धारित कर्तव्य पूरा करने के लिए सत्यनिष्ठ लोगों की जरूरत होती है। हालांकि जब ऐसा कोई व्यक्ति ऐसे किसी संस्थान की कार्यप्रणाली में नई जान डाल देता है और उसके बारे में आम-सहमति भी बन जाती है तो वह संस्था उस अगुआ की विदाई के बाद भी प्रभावी भूमिका में बनी रह सकती है। चुनाव आयोग के मामले में कुछ ऐसा ही हुआ। चुनाव आयोग को तीन-सदस्यीय निकाय बनाने पर आपत्ति हो सकती थी लेकिन इससे चुनावी नियमन में एक स्थायित्व आया और गठबंधन सरकारों के समूचे दौर में आयोग महज कागजी शेर नहीं बना रहा। हालांकि यह सवाल खड़ा हो सकता है कि गठबंधन युग की शुरुआत में ही शेषन का दौर होना क्या चुनाव आयोग की इस कहानी के लिए अहम है? भारत 1989 के पहले तक अमूमन एकदलीय व्यवस्था वाला देश ही था, कम-से-कम केंद्रीय स्तर पर ऐसा ही था। लेकिन 1990 और 2000 के दशकों में स्वतंत्र चुनाव आयोग एक अहम मध्यस्थ था और उसे मोटे तौर पर एक उपयोगी रेफरी के रूप में देखा जाता था। 
 
अब भारत एक बार फिर ऐसे दौर में है जहां केंद्रीय स्तर पर सरकार चलाने के लिए गठबंधन जरूरी नहीं है। यह शायद कोई संयोग नहीं है कि शेषन की विरासत गुम होती जा रही है क्योंकि चुनाव आयोग खुद को लगातार घेराबंदी में पाता है। जरा 2019 के आम चुनावों की इस घटना के बारे में सोचिए: प्रधानमंत्री एवं मौजूदा गृह मंत्री को आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन मामले में 'क्लीन चिट' देने का विरोध करने वाले आयोग के एक आयुक्त ने खुद को सरकारी एजेंसियों के निशाने पर पाया है। उनके परिवार के सदस्यों की जांच की जा रही हैं। डराने-धमकाने की ऐसी घटना आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता पर निश्चित रूप से असर डालेगी। फिर भी यह उम्मीद की जाए कि भावी चुनाव आयुक्त शेषन की अदम्य भावना का कुछ अंश अपने भीतर उतारेंगे और चुनावी निष्पक्षता के लिए संघर्ष करने के आयोग के गौरवशाली इतिहास को बनाए रखेंगे। 
Keyword: Election Commission of India, ECI, T. N. Seshan,,
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