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बाजार में सब्र रखेंगे तभी मीठा फल चखेंगे

संजय कुमार सिंह /  November 10, 2019

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 20 सितंबर को कॉर्पोरेट कर की दरों में कटौती का ऐलान किया। उससे एक दिन पहले यानी 19 सितंबर को नैशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 10,704 अंक पर बंद हुआ था और उसका एक साल का प्रतिफल -4.71 फीसदी रहा था। वित्त मंत्री के ऐलान से शेयर बाजार में दम आ गया और 23 सितंबर को निफ्टी उछलकर 11,600 अंक पर बंद हुआ। उस दिन सूचकांक का एक साल का प्रतिफल 4.08 फीसदी हो गया। इस तरह केवल दो कारोबारी दिनों में निफ्टी करीब 8.37 फीसदी चढ़ गया।  अगर इन दो अहम तारीखों (20 और 23 सितंबर) पर आपकी रकम शेयरों नहीं लगी होगी तो आपके पोर्टफोलियो को कितना नुकसान हुआ होगा, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है।

जाहिर है आप अचानक उछल जाने की बाजार की उसी फितरत का शिकार हो गए, जिसके बारे में पुराने उस्ताद कहते रहे हैं: 'बाजार में वक्त बिताने से ज्यादा जरूरी है सही वक्त का अंदाजा लगाना।' मॉर्निंगस्टार ने अमेरिकी और भारतीय शेयर बाजारों पर अध्ययन कराए हैं और सही वक्त का अंदाजा लगाने की अहमियत उनमें भी साबित हुई है। मॉर्निंगस्टार के विश्लेषकों ने अमेरिका में 15 साल की अवधि के श्रेणी बेंचमार्क लेकर लार्ज-कैप ऐक्टिव फंडों के प्रदर्शन की तुलना की। हरेक फंड ने बेंचमार्क की तुलना में जितना बेहतर प्रदर्शन किया, उसे ज्यादा अच्छे से कम अच्छे के क्रम में लगाया गया।

उसके बाद ऊपर से शुरू करते हुए बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन वाले महीनों के प्रतिफल को एक-एक कर हटा दिया। फिर वह बिंदु आया, जहां फंड का प्रतिफल बेंचमार्क से कम हो गया। उस बिंदु तक पहुंचने से पहले जो भी महीने हटाए गए थे और जिनमें फंडों ने बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन किया था, उन्हें 'महत्त्वपूर्ण महीने' या 'क्रिटिकल मंथ्स' का नाम दिया गया। अध्ययन में पता चला कि महज 5 फीसदी महीनों में फंड बेंचमार्क से बेहतर प्रतिफल दे पाए थे।

उसके बाद मॉर्निंगस्टार ने भारतीय बाजार में भी शेयरों और डायवर्सिफाइड इक्विटी फंडों के लिए इसी तरह का अध्ययन कराया। बीएसई 100 शेयरों के प्रदर्शन की तुलना नकदी (लिक्विड फंड के प्रतिफल को नकदी माना गया) के प्रदर्शन से की गई। ऐक्टिव फंडों के प्रतिफल की तुलना श्रेणी के बेंचमार्क को मिले प्रतिफल से की गई। अध्ययन में पता चला कि जुलाई 2009 से जून 2019 के बीच कुल 120 महीनों में से केवल 8 महीने ऐसे थे, जिनमें शेयर और फंड दोनों ने बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन किया।

बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन की बात करें तो केवल 6.7 फीसदी महीनों (औसत संख्या) में ऐसा हुआ। मॉर्निंगस्टार इन्वेस्टमेंट एडवाइजर इंडिया में निदेशक-प्रबंधक शोध कौस्तुभ बेलापुरकर कहते हैं, 'अध्ययन से पता चलता है कि हो सकता है आपने पूरे 112 महीनों तक किसी फंड में निवेश रखा हो, लेकिन अगर उन 8 महत्त्वपूर्ण महीनों में आपकी रकम उस फंड में नहीं थी तो आपका प्रतिफल बेंचमार्क के प्रतिफल से अधिक किसी कीमत पर नहीं हो पाएगा।'

शेयर बाजार से कभी स्थिर प्रतिफल नहीं मिलता। प्रतिफल घटता-बढ़ता रहता है। कोटक ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी के मुख्य निवेश अधिकारी (इक्विटी) हर्ष उपाध्याय कहते हैं, 'इसकी वजह यह है कि बाजार एक के बाद एक बदलावों पर प्रतिक्रिया देता है, चाहे बदलाव सकारात्मक हों या नकारात्मक। उसी के हिसाब से शेयरों के भाव पर भी असर दिखता है।' वह यह भी कहते हैं कि किसी भी निवेशक के लिए ऐसे बदलावों का अंदाजा लगाना और उनसे फायदा उठाने की स्थिति में पहुंचना मुश्किल होता है और लंबी अवधि में तो ऐसा करना करीब-करीब नामुमकिन ही होता है।

छोटे निवेशकों ही नहीं तजुर्बेकार फंड प्रबंधकों पर भी यह बात लागू होती है। उपाध्याय कहते हैं, 'यही वजह है कि हम अपने इक्विटी फंडों में एक निश्चित सीमा से अधिक नकदी रखने से बचते हैं।' मिंटवॉक के सह-संस्थापक निखिल बनर्जी का कहना है, 'चूंकि यह अंदाजा लगाना लगभग असंभव है कि ऊंचा प्रतिफल देने वाले दिन कब आएंगे, इसलिए निवेशक उनका फायदा तभी उठा सकते हैं, जब वे लंबे समय के लिए अपना निवेश बनाए रखें।' 

बाजार में सही समय के फेर में न पड़ें

यह आदत अक्सर दिख जाती है। जब बाजार बुरे दौर से गुजर रहा होता है तो लोग इक्विटी फंडों में अपने सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) को या तो रोक देते हैं या उसका नवीकरण टाल देते हैं। इस समय मिड और स्मॉल-कैप श्रेणियों के साथ ऐसा ही हो रहा है। उपाध्याय कहते हैं, 'कई छोटे निवेशक केवल पिछले प्रदर्शन को आधार बनाकर ही निवेश करते हैं। जब पिछले प्रतिफल कमजोर दिखने लगते हैं तो वे अपने एसआईपी रोक देते हैं। ऐसा बिल्कुल भी नहीं करें। एसआईपी का मकसद ही यह होता है कि आप उतार-चढ़ाव से सुरक्षित रहें या उससे फायदा कमाएं।' 

फंड योजनाएं बदलने से करें परहेज

जब किसी निवेशक को दिखता है कि कोई फंड पिछले एक साल से अच्छा प्रदर्शन कर रहा है तो वह उसमें निवेश कर देता है। छह महीने या साल भर बाद उस फंड का प्रदर्शन कमजोर पड़ जाता है। उस बीच उसे कोई दूसरा फंड बढिय़ा प्रतिफल देता नजर आता है तो वह अपने पुराने फंड को बेच देता है और नए फंड में रकम लगा देता है। यह सिलसिला तब तक चलता रहता है, जब तक निवेशक को अपनी गलती का अहसास नहीं होता।

निवेशक अक्सर फंड में निवेश कर डालते हैं और उससे पहले फंड की प्रकृति और उसके साथ जुड़े जोखिमों को नहीं समझते। फंड लार्ज-कैप, मिड-कैप या स्मॉल-कैप हो सकते हैं। कुछ साल लार्ज-कैप फंडों का प्रदर्शन अच्छा रहता है और बाकी साल में मिड-कैप तथा स्मॉल-कैप फंड अच्छा करते दिखते हैं।

इसी तरह फंड प्रबंधक निवेश के तीन तरीकों - वृद्घि या ग्रोथ, मूल्य या वैल्यू और मिश्रित या ब्लेंड में से किसी एक पर अमल करते हैं। ग्रोथ-केंद्रित प्रबंधक ऐसे शेयरों में निवेश करते हैं, जिनमें अधिक आय की संभावना नजर आती है। उनके लिए वे अधिक कीमत चुकाने को भी तैयार रहते हैं। वैल्यू-केंद्रित प्रबंधक ऐसे शेयरों में निवेश करना चाहते हैं, जो बुनियादी तौर पर मजबूत हों मगर इस समय पिटे हुए हों। इन शेयरों को इसीलिए चुना जाता है क्योंकि ये बहुत बढिय़ा कीमत पर मिल रहे होते हैं और फंड प्रबंधकों को यकीन होता है कि आगे जाकर कंपनी की किस्मत बदल जाएगी। अंत में ऐस फंड प्रबंधक होते हैं, जो जीएआरपी (वाजिब कीमत पर वृद्घि) की मिश्रित रणनीति अपनाते हैं।

उन्हें ऐसे शेयरों में निवेश सही लगता है, जिनमें वृद्घि की ठीकठाक संभावना हो, लेकिन वे बहुत ज्यादा कीमत अदा करने को तैयार नहीं होते। निवेश की कोई भी शैली सभी बाजारों में कारगर नहीं होती। कई बार वृद्घि आधारित निवेश अच्छा प्रतिफल देता है और कई बार मूल्य आधारित या मिश्रित निवेश काम कर जाता है। बेलापुरकर कहते हैं, 'अगर बाजार के हालात फंड प्रबंधक की निवेश शैली के माफिक नहीं हों तो निवेशकों को धैर्य रखना रखना चाहिए और प्रबंधक पर भरोसा बरकरार रखना चाहिए।'

फंडों की स्टाइल शीट पर विचार करें और उसके विभिन्न हिस्सों में फैले फंडों के मिश्रण का चुनाव करें। अच्छे फंड प्रबंधक चुनें और कम से कम 7 साल के लिए फंड में बने रहें ताकि बाजार में उतार-चढ़ाव के चक्र के दौरान आपको अच्छा प्रतिफल हासिल हो सके। 

बार-बार पोर्टफोलियो न देखें

फंड पोर्टफोलियो के प्रबंधन में जरूरत से ज्यादा सक्रियता कभीकभार नुकसानदेह भी साबित हो सकती है। मॉर्निंगस्टार के अध्ययन से पता चलता है कि फंड अपने बेंचमार्क से बेहतर प्रदर्शन केवल छोटी सी अवधि के लिए ही करते हैं। बाकी वक्त में अच्छा प्रदर्शन मुश्किल से ही रह पाता है। इक्विटी पोर्टफोलियो पर बार-बार नजर डालने और उनके प्रदर्शन को बार-बार कसौटी पर कसने से गलतियां हो सकती हैं। बनर्जी की सलाह है, 'छह-छह महीने पर या साल में एक बार अपने पोर्टफोलियो का जायजा लेना काफी होगा।'
Keyword: Finance Minister, Nirmala Sitaraman, Corporate Tax, Portfolio, NSE, NIfty, Liquid Fund,
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