बिजनेस स्टैंडर्ड - इक्विटी में इलेक्ट्रॉनिक कारोबार के 25 साल
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इक्विटी में इलेक्ट्रॉनिक कारोबार के 25 साल

ऐश्ली कुटिन्हो /  November 10, 2019

सन 1980 के दशक के आखिरी वर्षों में घरेलू ब्रोकरेज मोतीलाल ओसवाल फाइनैंशियल सर्विसेज अपनी खूबी (यूएसपी) के रूप में अहमदाबाद और मुंबई के एक्सचेंजों में आर्बिट्राज कारोबार की सुविधा को पेश करती थी। एक समय इस ब्रोकरेज कंपनी के एक सह-संस्थापक रामदेव अग्रवाल का काम मुंबई में सूचीबद्ध शेयरों की कीमत की सूचनाएं अहमदाबाद में अपने ग्राहकों तक पहुंचाना था। 

अग्रवाल ने कहा, 'हम अहमदाबाद में हाजिर बाजार में शेयर खरीदते थे और उन्हें मुंबई में नियमित बाजार में बेचते थे। मुंबई में ट्रेडिंग रिंग (कारोबारी स्थान) में बोली जाने वाली कीमतों का अहमदाबाद में तत्काल पता नहीं चलता था। इसके चलते मेरे ग्राहकों को आर्बिट्राज में 1-2 फीसदी का लाभ मिलता था।' भौतिक निपटान और आवाज लगाने का बीता युग आज के मोबाइल और इंटरनेट कारोबार से बिल्कुल अलग लगता है।

फिर भी 25 साल पहले भारत में शेयर बाजार ऐसे ही काम करते थे। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज ऑफ इंडिया (एनएसई) ने 1994 में इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग शुरू की थी। एक्सचेंज ने अपने शुरुआती दिनों में वीसैट तकनीक के जरिये इलेक्ट्रॉनिक कारोबार शुरू करने के लिए कड़ी मेहनत की। एक्सचेंज ने नैशनल एक्सचेंज ऑफ ऑटोमेटेड ट्रेडिंग (एनईएटी) विकसित की, जो उसकी स्क्रीन आधारित कारोबारी व्यवस्था थी। 

कोटक सिक्योरिटीज के गैर-कार्यकारी चेयरमैन एस ए नारायण ने कहा, 'इलेक्ट्रॉनिक कारोबार और अभौतिकीकरण अब तक भारतीय पूंजी बाजार के दो सबसे महत्त्वपूर्ण मील के पत्थर रहे हैं।' 1990 के दशक के मध्य तक कारोबारी शेयरों की खरीद और बिक्री के लिए आवाज देकर लगाई जाने वाली बोलियों पर निर्भर थे। आम तौर पर ब्रोकरों के पास कागज के बंडल दिखते थे। ऐसा आश्चर्यजनक नहीं था क्योंकि लेनदेन के रिकॉर्ड भौतिक शेयर प्रमाणपत्र के रूप में रखे जाते थे। 

सबसे बड़ी दिक्कत खराब डिलिवरी और बेमेल लेनदेन थे। अग्रवाल के मुताबिक 100 लेनदेन में से पांच बेमेल होते थे और खराब डिलिवरी को लेकर विवाद मध्यस्थता अदालत में पहुंच जाते थे। क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंज केवल स्थानीय कंपनियों के शेयरों में कारोबार करते थे। मुंबई या कोलकाता के एक्सचेंजों से शेयर लेने के इच्छुक निवेशकों को अग्रिम भुगतान करना होता था, जो आम तौर पर चेक के जरिये होता था। शेयरों की डिलिवरी में तीन महीने तक का समय लग सकता था और निवेशकों के लिए फर्जी शेयर प्रमाणपत्र मिलने का भी जोखिम होता था।

वर्ष 1992 में हर्षद मेहता घोटाले से निवेशकों का भरोसा और कमजोर हुआ। इसी घोटाले की पृष्ठभूमि में एम जे फेरवानी ने देशव्यापी इलेक्ट्रॉनिक एक्सचेंज का विचार पेश किया। इलेक्ट्रॉनिक एक्सचेंज की स्थापना करना भी आसान काम नहीं था। कपाली (हस्तलिखित कारोबारी पर्चियां) जैसे पुराने तरीकों को लेकर सहज कारोबारियों ने ऑटोमेटेड कारोबार के विचार का प्रतिरोध किया। कनेक्टिविटी के लिए 100 से अधिक टेलीफोन लाइन प्राप्त करने में भी अड़चन आई क्योंकि महानगर टेलीफोन निगम (तब बॉम्बे टेलीफोन) ने तत्काल कनेक्शन मुहैया कराने में असमर्थता जताई।  आखिरकार एक उपग्रह संचार प्रणाली वीसैट के इस्तेमाल से एनएसई की समस्या का समाधान हो गया। एनएसई को अंतरिक्ष और टेलीफोन विभागों के साथ बातचीत करनी पड़ी। 

अग्रवाल ने कहा, 'इलेक्ट्रॉनिक कारोबारी प्रणाली शुरू करने से कारोबारी मात्रा में भारी बढ़ोतरी हुई।' उस समय तक केवल एक मुख्य ब्रोकर और उसके 5-6 सब-ब्रोकरों को ट्रेडिंग रिंग में मौजूद रहने की मंजूरी थी। एक व्यक्ति प्रति घंटे औसतन 200 लेनदेन को संभाल सकता था। ब्रोकर की लेनदेन को अमलीजामा पहनाने की क्षमता सीमित थी। ऐसे में उन ग्राहकों की संख्या भी कम होती थी, जिन्हें सेवा मुहैया कराई जा सके। 

नारायण ने कहा, 'इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन में बढ़ोतरी होने से ब्रोकरों और निवेशकों की भागीदारी में भी इजाफा हुआ। आखिरकार विदेशी निवेशकों को भी भारत के बारे में विचार करने का भरोसा मिला।' इलेक्ट्रॉनिक कारोबार ने गुमनाम आढ़तियों और अनाïवश्यक कमीशन को खत्म कर दिया। एक्सचेंजों ने उन लोगों के लिए भी दरवाजे खोल दिए, जो बड़े ब्रोकरों के अधीन काम कर चुके थे। वे अब एक्सचेंज के सदस्य बन सकते थे और खुद का कारोबार शुरू कर सकते थे। एक तरीके से एनएसई ने ब्रोकरेज से इतर कारोबारों जैसे म्युचुअल फंडों, बीमा कंपनियों, निवेश बैंकों और सलाहकार कंपनियों को भी फलने-फूलने में मदद दी। 

एनएसई के प्रबंध निदेशक और मुख्य कार्याधिकारी विक्रम लिमये ने पिछले मंगलवार को भाषण में कहा, 'एनएसई ने सबसे पहले कई कदम उठाए  हैं।' उन्होंने कहा, 'यह भारत में पहला डीम्युचुअलाइज्ड एक्सचेंज था। ऐसे समय जब उसे एक टेलीफोन कनेक्शन लेने में वर्षों लग गए तो एनएसई ने उपग्रह आधारित अखिल भारतीय नेटवर्क स्थापित किया ताकि देश के सुदूरवर्ती इलाकों के निवेशकों की भी बाजार तक पहुंच सुनिश्चित हो सके।'

एक्सचेंज बाजार कुशलता सुधारने के लिए लगातार उन्नत तकनीक को अपना रहा है। अब यह सूचीबद्ध कंपनियों के लिए इलेक्ट्रॉनिक फाइलिंग सिस्टम, बाजार तक सीधी पहुंच और को-लोकेशन सेवाएं मुहैया कराता है। एक्सचेंज रोजाना एक अरब मेसेज और 1 करोड़ से अधिक इक्विटी लेनदेन को संभालता है। एनएसई का म्युचुअल फंड वितरकों के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म है।  

इसका वायदा एवं विकल्प या डेरिवेटिव खंड में दबदबा है, जिसकी 2000 में शुरुआत हुई थी। एक्सचेंज को इंटरनेट के जरिये कारोबार को बढ़ावा देने का फायदा मिला है। इस एक्सचेंज पर 40 से 45 फीसदी लेनदेन इंटरनेट और मोबाइल के जरिये होते है, जिसकी 1990 के दशक की शुरुआत या मध्य में भी कल्पना नहीं की जा सकती थी।

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