बिजनेस स्टैंडर्ड - इमरान नहीं नानक के बारे में सोचिए
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, November 22, 2019 05:18 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

इमरान नहीं नानक के बारे में सोचिए

शेखर गुप्ता /  November 10, 2019

बतौर क्रिकेट खिलाड़ी उनकी भूमिका को छोड़ दिया जाए तो इमरान खान शायद आपको सबसे शानदार लोगों में नहीं लगें। इसके बावजूद उनके मानकों के हिसाब से भारत के सिखों के लिए करतारपुर साहिब की यात्रा को वीजा मुक्त बनाने की उनकी पेशकश दिलचस्प थी। 

पहली बात तो यह कि वे यह कैसे तय करेंगे कि कोई सिख है या नहीं? सिख होने का कोई सिद्धांत नहीं है, न ही यह किसी को अलग से चिह्नित करता है। किसी भी धर्म के किसी भी व्यक्ति का गुरुद्वारे में स्वागत है। आपको बस चंद साधारण नियमों का पालन करना होता है: आपका सर ढका हुआ हो और आप नंगे पांव हों। इस स्थिति में आप प्रार्थना कर सकते हैं, पूजा अर्चना कराने वाले ग्रंथी किसी भी अन्य श्रद्धालु की तरह आपको पवित्र पुस्तक से आशिष दिलाएंगे और संगत आपको लंगर में भोजन कराएगी।

स्वर्ण मंदिर और अकाल तख्त साहिब सहित समूचे सिख समाज में किसी भी आस्था के व्यक्ति के लिए कोई रोकटोक नहीं है। कहने का तात्पर्य यह कि सिख धर्म किसी के लिए कोई रोकटोक नहीं करता। लंगर जैसे सामुदायिक भोजन की व्यवस्था इसका उदाहरण है जहां सब साथ में भोजन करें। साथ में भोजन करने वाले सभी समान समझे जाते हैं। किसी भी धर्म का व्यक्ति 'कार सेवा' कर सकता है। अनेक लोग ऐसा करते हैं।

यही कारण है कि सिखों के पवित्र स्थल दुनिया में सर्वाधिक स्वच्छ जगहों में शामिल है। भारत में करतारपुर साहिब को लेकर इमरान खान, पाकिस्तानी सेना तथा आईएसआई के रुख को लेकर काफी चिंता है। ये सभी हमारी आशंकाओं के मुताबिक ही बुरे हैं। परंतु यदि यह मान भी लिया जाए कि करतारपुर साहिब के माध्यम से पाकिस्तान के पास भारत में अलगाववाद का दोबारा हवा देने का मौका था, तो भी इमरान खान ने केवल सिखों के लिए रियायत की घोषणा कर इसे खत्म कर लिया।

पहली बात तो यह कि सिख धर्म सबको समान मानने वाला समावेशी धर्म है और वह इस प्राथमिकता देने वाली अवधारणा को खारिज कर देगा। इमरान यह भी नहीं जानते होंगे कि किसी सिख को या गुरुनानक तथा उनके नौ अन्य उत्तराधिकारियों के अन्य धर्म से ताल्लुक रखने वाले श्रद्धालु को कैसे अलग किया जाएगा। सिख व्यवहार और परंपरा में ऐसा कुछ नहीं है जो सिखों को गैर सिखों से अलग कर सके। 

इमरान खान पुराने सैन्य प्रतिष्ठान की इस अवधारणा पर यकीन कर बैठे हैं कि सिखों और हिंदुओं में विभाजन अनिवार्य है। इससे पहले सन 1960 के दशक में इस विषय में उसका पहला और 1981-94 के बीच उसका दूसरा प्रयास नाकाम रहा था। अब तीसरी कोशिश का अवसर आ गया है। यही कारण है कि विदेशों में स्थित सिख संगठन, खासतौर पर कनाडा के संगठनों को पाकिस्तान के प्रवासी समूहों के साथ जोड़ा जा रहा है। खासतौर पर कश्मीरी (मीरपुरी) समूहों को साथ लाया जा रहा है और रिफरेंडम 2020 को आगे बढ़ाया जा रहा है। इस तरह पुरानी किताब के एक और अध्याय को खोला जा रहा है। पहले किए गए प्रयासों की तरह इसका भी नाकाम होना तय है।

इस बार भी यह भारत की तुलना में पाकिस्तान को अधिक नुकसान पहुंचाएगा। हम भारतीयों को बहुत समस्या महसूस करने की आवश्यकता नहीं है। सिखों को भारत से अलग करने की पाकिस्तानी फंतासी सन 1950 के दशक तक जाती है। उस दौर में विभाजन के घाव एकदम ताजा थे।

पाकिस्तान ने इस दिशा में पहला प्रयास 1960 के दशक के मध्य में चरम पर पहुंचाया। पंजाब का विभाजन हुआ था और उसके एक हिस्से में कट्टर और अलगाववादी भावना थी। परंतु पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रताप सिंह कैरों और उनकी हत्या के बाद लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी ने इस चुनौती को गंभीरता से लिया। पंजाब एक बार फिर बंटा और हिंदी बहुल इलाकों को हरियाणा और हिमाचल के रूप में नए राज्य के रूप में गठित किया गया।

पंजाबी बोलने वाले सिख बहुल राज्य के रूप में पंजाब सामने आया। पाकिस्तानियों ने भी भारतीय युद्ध बंदियों में से सिखों को अलग कर उन्हें बरगलाने की कोशिश की। दूसरा प्रयास सन 1981 में किया गया। यह प्रयास पाकिस्तान के नए सत्ता प्रतिष्ठान ने किया जिसे अफगान जिहाद के माध्यम से नई मजबूती हासिल की थी। हालांकि संयोगवश इसे भारत के कई आंतरिक कारकों का सहयोग भी मिला। सिखों में बगावती तेवर, कमजोर सरकारें और शिरोमणि अकाली दल को हाशिये पर रखना इसमें शामिल हैं। उसके बाद संत जरनैल सिंह भिंडरांवाले जैसे करिश्माई और पवित्रतावादी नेता का उभार हुआ।

उसके बाद जो हुआ वह इतिहास में दर्ज है। बाद के 13 वर्षों में हजारों लोग मारे गए। ठीक उस समय जब लगने लगा था कि पंजाब में अब हालत नहीं सुधरेंगे, यह सब अचानक समाप्त हो गया। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि हम जैसे मामले पर करीबी नजर रखने वाले भी ठीक से समझ नहीं सके। 

ऐसा कैसे हुआ? यकीनन सुरक्षा बलों और खुफिया एजेंसियों ने अपना काम बखूबी किया। परंतु आतंक का वह दौर उस दिन समाप्त हो गया जिस दिन सिखों ने यह तय किया कि अब बहुत हो गया। इस लड़ाई की असली हीरो थी सिख पंजाब पुलिस। सिखों की आम धारणा में यह बदलाव नाटकीय था। एक बिंदु पर जहां मेरे कुछ साथी पत्रकार भी पंजाब के आजाद क्षेत्रों की यात्रा करने की बातें कर रहे थे, वहीं यह सब अचानक समाप्त हो गया।

हालत ऐसी थी कि अब कोई इस विषय पर बात भी नहीं करना चाहता था। इस अभियान का नेतृत्व तत्कालीन पंजाब पुलिस प्रमुख केपीएस गिल कर रहे थे। उन्होंने इंडिया टुडे की एक खबर के लिए इस विषय पर मेरे साथ विस्तार से बात की। जब मैंने उनसे पूछा कि इसका ऐसा अचानक और नाटकीय अंत कैसे हुआ? उन्होंने कहा, देखिए पाकिस्तान के लोग इकबाल को नहीं पढ़ते, उन्होंने कहा था- कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी।

ऐसे में पाकिस्तानियों का यह सोचना मूर्खता लगता है कि वे उन दिनों को वापस ला सकते हैं। इसी प्रकार हम भारतीयों के लिए यह सोचना भी शर्मनाक है कि पाकिस्तानी हमारे सिखों को हमसे दूर कर सकते हैं। करतारपुर साहिब में कहीं किसी होर्डिंग पर भिंडरांवाले की तस्वीर देखकर हमारा हताश हो जाना सही नहीं है। ऐसी तस्वीरें तो आपको स्वर्ण मंदिर में और उसके आसपास भी मिल जाएंगी। बाहर दुकानों पर बिकती की चेन में और दिल्ली में कारों के पीछे तो कई जगह कंप्यूटर और टैबलेट के स्क्रीन सेवर में भिंडरांवाले की तस्वीरें दिख जाएंगी। अगर हम इन्हें देखकर चौकन्ने होने लगें तो मतलब हमें एक राष्ट्र के रूप में खुद पर और सिख समुदाय पर भरोसा नहीं है।

अगर हम यह मान लेते हैं कि वे 2019 में भी उसी झांसे में आ जाएंगे तो यह उनकी बुद्धिमता का अपमान होगा। अगर हममें से कोई यह सोचता है कि हमने सिखों को पाकिस्तान से बचाया तो यह एकदम मूर्खतापूर्ण रूप से अतार्किक है।हमने पिछले सप्ताह इस आलेख में कहा था कि भारत की सामाजिक और राष्ट्रीय समरसता बीते वर्षों में हमारी सहजता के साथ-साथ मजबूत हुई है। हम इसलिए मजबूत नहीं हैं क्योंकि हम अपनी विविधता के साथ एकजुट हैं। बल्कि ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि हम अब अधिक सहज हैं। आज यह दलील दी जा सकती है कि भारतीय गणराज्य के संस्थापकों ने विविधता में एकता का नारा देते हुए थोड़ी कंजूसी बरती। उनको कहना चाहिए था कि विविधता का जश्न मनाओ। एक बार अगर आप इसे स्वीकार कर लें तो आपको किसी अन्य नागरिक के प्रति राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को लेकर चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है।

यही कारण है कि अब ऐसी आशंकाओं को भुलाने का वक्त है। भारत कोई चीनी मिट्टी का बना हुआ मुल्क नहीं है। भारतीय सिखों और तमाम गैर सिखों के सबसे पवित्र धर्मस्थलों में से एक अब खुल गया है। यह हम सबके उल्लासित होने का दिन है। टेलीविजन पर चल रही खालिस्तान की वापसी जैसे चर्चाओं को बंद करिए। ऐसा कुछ नहीं होने वाला।
यदि फिर भी आपको इसकी चिंता है तो याद रखिए कि सिख प्रार्थना की अंतिम पंक्ति क्या कहती है: नानक, तुम्हारा नाम हम सब को प्रसन्न रखता है, आपका आशिष तमाम मानवजाति को प्रसन्न और समृद्ध रखे।
Keyword: Kartarpur Sahib, Punjab, Sikh, Gurudwara, PM, Prime Minister, Narendra Modi, Imran Khan, Swarn Mandir, Religion, Pakistan, India,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या व्यावसायिक खनन के लिए खदान आवंटन करना उचित कदम है?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.