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तब विवाद होगा खत्म..

संपादकीय /  November 10, 2019

अयोध्या मामले के बहु-प्रतीक्षित निर्णय ने पूर्वी उत्तर प्रदेश के इस छोटे शहर में दशकों से चले आ रहे जमीन विवाद के आखिरकार खत्म हो जाने की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। इस विवाद ने भारतीय राजनीति एवं समाज का स्वरूप बदल देने में अहम भूमिका निभाई है। उच्चतम न्यायालय अपने फैसले के पीछे की वजह कानूनी दायरे में ही रखने को लेकर खासा सजग रहा है। उसने इस बात पर जोर दिया है कि भले ही इस विवाद के राजनीतिक एवं धार्मिक निहितार्थ हो सकते हैं लेकिन वह इस मुद्दे को बेहद जटिल जमीन विवाद ही मानकर चला है। 

दूसरे शब्दों में, यह निर्णय अयोध्या विवाद को इतिहास एवं धर्म के बारे में व्याख्यान देने का जरिया बनाने के बजाय धर्मनिरपेक्ष एवं संवैधानिक सिद्धांतों के आलोक में देखने का एक स्पष्ट प्रयास माना जा सकता है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इस मामले में दिए अपने फैसले में विवादित जमीन को तीनों याचियों के बीच बांट दिया था। लेकिन व्यावहारिक तौर पर दो-तिहाई जमीन हिंदू समुदाय को मिली थी जबकि एक तिहाई जमीन मुस्लिम पक्ष को दी गई थी। हालांकि उस फैसले में ऐतिहासिक तथ्यों की कमी और धर्मशास्त्रीय विवरणों की अधिकता थी। लेकिन शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में न्यायक्षेत्र के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर कम दबाव डाला है। 

इसके बावजूद अब भी ऐसे सवाल पूछे जा सकते हैं और पूछे जाने भी चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय अंतिम निष्कर्ष तक किस तरह पहुंचा? समूची विवादित जमीन हिंदुओं को देने के फैसले तक पहुंचाने वाले तर्कों में कई समस्याजनक बिंदु हैं। पहला, मुस्लिम समुदाय के दावे को 'संभाव्यता के संतुलन' के आधार पर पूरी तरह नकार देने वाला निष्कर्ष थोड़ा अटपटा है क्योंकि हिंदू पक्षकारों ने भीतरी परिसर में अनवरत पूजा होते रहने का सबूत कभी नहीं पेश किया। आशंका इस बात की है कि 'संभाव्यता का संतुलन' लागू करने को कुछ तबके इस रूप में भी देख सकते हैं कि न्यायालय ने अयोध्या की अंतिम स्थिति के बारे में राजनीतिक विमर्शों को ध्यान में रखा। दूसरा, न्यायालय का यह मत है कि समूची जगह एक 'यौगिक' इकाई है, लिहाजा उसमें किसी भी तरह का विभाजन नहीं हो सकता है।

वैसे पिछली सदी में जब्ती होने के पहले तक इस तरह का जमीन बंटवारा एक ऐतिहासिक परंपरा रही है। तीसरा, न्यायालय ने विवादित स्थल को दो हिस्सों- भीतरी परिसर एवं बाहरी परिसर के रूप में देखते हुए कहा है कि बाहरी परिसर में हिंदुओं की पूजा के रिकॉर्ड मौजूद हैं वहीं मुस्लिम पक्ष भीतरी परिसर में लगातार इबादत होने की बात साबित नहीं कर पाया है।

हालांकि कहीं व्यापक बिंदु यह है कि दोषपूर्ण होते हुए भी इस फैसले में यह क्षमता है कि लंबे समय से खिंचे चले आ रहे मामले को बंद किया जा सके। इस संदर्भ में, विवाद से जुड़े सभी हितधारक एवं राजनीतिक दल इस बात के लिए तारीफ के हकदार हैं कि सबने अपने बयानों में इसकी सियासी तपिश काफी हद तक कम कर दी। खुद प्रधानमंत्री ने भी फैसला आने के पहले देशवासियों को सजग करते हुए कहा था कि वे फैसले को 'हार' या 'जीत' के रूप में न देखें। यह उम्मीद की जाती है कि मंदिर के ट्रस्ट का गठन एवं प्रबंधन भी इसी तरह समावेशी हो और उसमें उन जख्मों को दोबारा हरा करने वाला विजयोल्लास न हो। 

विवादित ढांचे के विध्वंस की 1992 में घटी घटना को लेकर काफी तीखे नजर आए न्यायालय को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि विध्वंस से संबंधित मामलों का निपटारा जल्द हो और दोषियों को सजा मिले। ऐसा होने पर ही अयोध्या विवाद सही मायनों में बंद हो सकेगा और भारत भी आगे बढ़ पाएगा। कानून को लागू किया जाना चाहिए और तभी राष्ट्रीय राजनीति अयोध्या की गहरी छाया से निकल सकती है।

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