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संगीत क्षेत्र का दरवाजा खोलने से बहेगी कामयाबी की नई बयार

मीडिया मंत्र
वनिता कोहली-खांडेकर /  November 08, 2019

क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया है कि संगीत कंपनियों ने नए फॉर्मेट, बाजार या विधा के विकास में निवेश करना लगभग बंद कर दिया है? संगीत की इंडिपॉप या कर्नाटक या कव्वाली जैसी सैकड़ों विधाएं हैं जो करीब 200 भाषाओं एवं बोलियों से संबंधित हैं। हम आज के समय 'व्हाई दिस कोलावेरी डी' या कोई मधुर भजन तभी सुनते हैं जब वह इंटरनेट पर वायरल हो जाता है। ऐसा नहीं होने पर सैकड़ों-हजारों गायक, गीत, वाद्य-यंत्र और संगीत संयोजन शायद ही लोगों की नजरों में आ पाते हैं। विदेश की बात छोडि़ए, देश के भीतर भी इन लोगों को लोग नहीं जान पाते हैं। 

 
वहीं लैटिन संगीत का सबसे बड़ा बाजार लैटिन अमेरिका के बाहर है। इसी तरह कोरियाई पॉप संगीत के-पॉप की वैश्विक लोकप्रियता ने कोरियाई संगीत कंपनियों के लिए अरबों डॉलर का बाजार खड़ा कर दिया है। वहीं भारत से निकलकर वैश्विक पटल पर लोकप्रिय होने वाला  पिछला बड़ा गाना 'जय हो' था जिसका संगीत वर्ष 2008 में ए आर रहमान ने दिया था। भारत के 1.67 लाख करोड़ रुपये से बड़े मनोरंजन बाजार में संगीत की भूमिका काफी अहम है, चाहे वह रेडियो, टीवी, ओटीटी, मोबाइल फोन या रेस्टोरेंट क्यों न हों? ऐसे में सवाल उठता है कि संगीत के बाजार को आगे बढऩे से कौन रोक रहा है? जवाब है कि दो बातों के चलते ऐसा हो रहा है।
 
पहली, संगीत की दुनिया बेहद छोटी, बिखरी हुई और पाइरेसी की समस्या से बुरी तरह हलाकान है। ईवाई के आंकड़ों को देखें तो संगीत उद्योग ने वर्ष 2018 में महज 1,400 करोड़ रुपये की कमाई की थी। इनमें से भी 80 फीसदी हिस्सा अकेले फिल्म संगीत का था। यही वजह है कि संगीत की दुनिया में होने वाले निवेश का सबसे बड़ा हिस्सा भी फिल्म संगीत में ही जाता है। ऐतिहासिक तौर पर फिल्मों ने संगीत उद्योग के राजस्व में 90 फीसदी से भी अधिक योगदान दिया है। हालांकि पिछले वर्षों में संगीत आधारित टीवी चैनलों (चैनल वी और एमटीवी जैसे), कई तरह के फॉर्मेट (कैसेट, सीडी, स्ट्रीमिंग सेवाओं), टेलीविजन और कंसर्ट कारोबार के रफ्तार पकडऩे के साथ गैर-फिल्म संगीत को भी नया बाजार मिलने लगा है। इंडिपॉप, गजल और अन्य संगीत विधाओं का विस्तार भी ऐसे ही हुआ। लेकिन अब भी तमाम विधाओं को अपने आप में समेटने वाले फिल्म संगीत का दबदबा कायम है और यह सबसे लोकप्रिय बना हुआ है। अब डिजिटल प्लेटफॉर्म भी संगीतकारों, विधा, देश, भाषा और मिजाज के लिहाज से संगीत का वर्गीकरण कर परोसने लगे हैं।
 
लेकिन इन सबके बावजूद संगीत उद्योग अपना अधिक विस्तार नहीं कर पाया है और इसकी वजह यह है कि उसकी कमाई दया के लायक ही है। नियामकों ने भी संगीत उद्योग में नए निवेश को दूर रखने का काम किया है। संगीत कारोबार के पिछडऩे की यह दूसरी वजह है। जरा इसके बारे में सोचिए। संगीत कारोबार के तिगुना स्तर (3,100 करोड़ रुपये) के साथ रेडियो उद्योग काफी आगे है। रेडियो उद्योग अपने राजस्व का बड़ा हिस्सा संगीत से ही कमाता है लेकिन वह उसे रॉयल्टी के तौर पर महज 60 करोड़ रुपये ही चुकाता है। कॉपीराइट बोर्ड के वर्ष 2010 में दिए गए आदेश ने रेडियो स्टेशनों को अपने शुद्ध विज्ञापन राजस्व का दो फीसदी हिस्सा संगीत लाइसेंसधारकों को देना अनिवार्य किया हुआ है। यह फैसला उस समय आया था जब रेडियो उद्योग ऊंची लाइसेंस फीस और नुकसान के बोझ से जूझ रहा था। लेकिन अब यह उद्योग प्रतिस्पद्र्धी स्थिति में पहुंच चुका है और उसे राजनीतिक विज्ञापनों एवं सजीव कार्यक्रमों जैसे स्रोतों से राजस्व मिल रहा है। भारतीय सांख्यिकी संस्थान में असिस्टेंट प्रोफेसर मेघा पटनायक कहती हैं कि अब समय आ गया है कि 'बाजार दर तय करने के लिए स्वैच्छिक लाइसेंसिंग की अनुमति दे दी जाए।' अनिवार्य लाइसेंसिंग व्यवस्था की सितंबर 2020 में समीक्षा होने वाली है। दिल्ली स्थित थिंक-टैंक एस्या सेंटर ने भारतीय संगीत उद्योग संघ (आईएमआई) पिछले महीने इस मसले पर एक चर्चा भी की।
 
टीवी, ओटीटी, डीटीएच जैसे तमाम संवर्गों में सामग्री तैयार करने की लागत करीब 15-40 फीसदी होती है। ऐसा अनुचित लगता है कि रेडियो में कंटेंट पर आने वाली लागत महज दो फीसदी होती है। हालांकि अनिवार्य लाइसेंसिंग एवं दो फीसदी की लागत रेडियो उद्योग की वैश्विक समस्याएं हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ एक्रॉन स्कूल ऑफ लॉ में बौद्धिक संपदा एवं तकनीकी कानून कार्यक्रम के निदेशक मार्क शुल्ज कहते हैं कि स्वैच्छिक लाइसेंसिंग से संगीत कंपनियों को 25-50 फीसदी राजस्व हिस्सेदारी हासिल करने में मदद मिल सकती है। स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर दो फीसदी लागत का यह नियम नहीं लागू होता है और वे संगीत अधिकार रखने वालों के साथ 50-70 फीसदी राजस्व साझा करते हैं।
 
स्वैच्छिक लाइसेंसिंग आदर्श लगती है लेकिन क्या यह भारत जैसे विभाजित बाजार में काम कर सकती है जहां एयरटेल या जियो जैसी बड़ी कंपनियां पहुंच पर नियंत्रण रखती हैं? शायद अनिवार्य लाइसेंसिंग की रॉयल्टी दर को बढ़ाकर 10-15 फीसदी कर दिया जाए। हम चीन के दृष्टांत से इसे समझ सकते हैं। पांच साल पहले चीन ने एक मुक्त बाजार रॉयल्टी व्यवस्था अपना ली और पाइरेसी पर काफी सख्ती बरती। इसका नतीजा यह हुआ कि चीन के संगीत उद्योग ने मनोरंजन परिदृश्य में चार करोड़ रोजगार पैदा किए हैं और चीन दुनिया के 10 अग्रणी संगीत बाजारों में शामिल हो चुका है जबकि वर्ष 2010 में यह 39वें स्थान पर था। एक मुक्त बाजार एवं कुछ नियामकीय समर्थन के मिले-जुले असर से भारत के संगीत उद्योग की तस्वीर बदली जा सकती है। आईएमआई के अध्यक्ष ब्लेज फर्नांडिस कहते हैं, 'रिकॉर्डेड संगीत उद्योग के दरवाजे खोलिए और हम आने वाले वर्षों में भारत से अगला डेस्पेसिटो निकलते देखेंगे। यह मेक इन इंडिया की सच्ची कहानी होगी।'
Keyword: music, media, AR rahman,,
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