बिजनेस स्टैंडर्ड - ब्याज दरों का अंतरण ही सुधारेगा सेहत
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Wednesday, November 13, 2019 04:45 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

ब्याज दरों का अंतरण ही सुधारेगा सेहत

नीलकंठ मिश्रा /  November 08, 2019

उधारी की दरों एवं आरबीआई की रीपो दर के बीच का फासला ऐसे स्तर पर आ चुका है जो केवल संकट के दौर में ही नजर आता है। इस पहलू पर रोशनी डाल रहे हैं नीलकंठ मिश्रा

 
ब्याज दरों का अंतरण न होना अब संकट जैसे हालात में पहुंच चुका है। बैंकों की तरफ से बांटे गए कर्ज पर लिए जाने वाले ब्याज की औसत दर (उधारी दर) और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की तरफ से तय बैंकों को दिए जाने वाले कर्ज की दर (रीपो दर) के बीच का फासला काफी बढ़ गया है। यह फासला पिछले 15 महीनों में खास तौर पर बढ़ता गया है। जनवरी 2015 से लेकर अगस्त 2018 के दौरान औसत बैंक उधारी दर रीपो दर के अनुपात में ही कम होती रही थी। लेकिन अगस्त 2018 के बाद के समय में बैंक उधारी दरों शायद ही कम हुई हैं जबकि इस दौरान रीपो दर में 135 आधार अंकों की भारी कटौती हो चुकी है।
 
ब्याज दर कटौती में से कुछ का समय अंतराल सामान्य है। पहले नए कर्जों को प्रभावित करने वाली दर कटौती कुल लोन बुक में कमी करती है। नए कर्जों एवं पुराने कर्जों पर ब्याज दरों का फर्क थोड़ा बढ़ गया है लेकिन हमारी नजर में ऐसा मूलत: पिछले साल कुछ समय तक चले दर वृद्धि चक्र के चलते हुआ है। जून-अगस्त 2018 के दौरान रीपो दर छह फीसदी से बढ़कर 6.5 फीसदी हो गई थी। ऐसा होने पर नए कर्जों पर वसूले जाने वाले ब्याज की दर पहले तो बढ़ी और अब गिरने लगी है। यह कुछ वैसा ही है जैसे एक बहुत बड़े जहाज को अपनी दिशा बदलने में थोड़ा वक्त लगता है और दर को अगली कुछ तिमाहियों में नीचे आना चाहिए क्योंकि रीपो दर में हालिया कटौती का असर नीचे तक जाएगा। हालांकि रीपो दरों और नए कर्जों पर लिए जाने वाले ब्याज दर के बीच फासला अब काफी बड़ा हो गया है और यह सार्थक ढंग से समायोजित नहीं हो सकता है। आरबीआई के अक्टूबर से लागू बाहरी बेंचमार्क की तरफ मुडऩे से भावी दर कटौती में तेजी लाने में मदद मिल सकती है लेकिन उससे पहले ही की जा चुकी कटौती अंतरित नहीं होगी। 
 
कई लोग इसे बैंकों के लाभ कमाने की कवायद समझ लेते हैं लेकिन ऐसा होने के साक्ष्य कम ही हैं। नए कर्ज पर उधारी दर और उधारी दर की नगण्य लागत (एमसीएलआर) के बीच का फासला ऐतिहासिक दायरे के भीतर ही है। बैंकों के शुद्ध ब्याज मार्जिन के आंकड़े भी खास बढ़े नहीं हैं। दर हस्तांतरण की ऐसी ही समस्या बॉन्ड बाजार में भी है। बॉन्ड बाजार में जोखिम-न्यूनता की वजह से ऋण विस्तार होने की स्थिति दर्ज की गई है। मसलन, गैर बैंकिंग वित्त कंपनियों (एनबीएफसी) के बीच उधारी की 'सुरक्षित' माने जाने वाली दर और जोखिम से भरी दर के बीच का फासला बढ़ता गया है।
 
लेकिन ऐसी ही समस्या टर्म प्रीमियम बढऩे की है। दीर्घावधि वाली जोखिम-मुक्त दर (जैसे 10 वर्षीय सरकारी बॉन्ड प्रतिफल) और कम अवधि की जोखिम-मुक्त दर (रीपो दर) का फासला इस प्रीमियम को दर्शाता है। यह फासला न केवल पहले से बहुत व्यापक है बल्कि अब यह वैश्विक स्तर पर भी सबसे ज्यादा है। यह कुछ गंभीर समस्याओं की तरफ इशारा करता है। इस आधार पर ऐसा लग सकता है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की बॉन्ड मांग कम होने के कारण ऐसा है लेकिन इस समस्या के दूसरे पहलू भी हैं। पिछले दशक में आरबीआई लगातार सांविधिक तरलता अनुपात (एसएलआर) की सीमा नीचे लाता रहा है जबकि इसी अनुपात में एफपीआई की सीमा बढ़ाता रहा है। करीब एक साल पहले तक यह तरीका काम कर रहा था क्योंकि सरकारी बॉन्ड में बैंकों की हिस्सेदारी गिर गई थी और एफपीआई, घरेलू बीमा कंपनियों और आरबीआई की हिस्सेदारी बढ़ गई। लेकिन पिछले एक साल में एफपीआई काफी हद तक सरकारी बॉन्ड से दूर ही रहे हैं और बैंकों के हिस्से में गिरावट आने से आरबीआई का हिस्सा भी कम हो गया है। 
 
तुलनात्मक रूप में, आरबीआई ने खरीदा है और बैंकों ने बेचा है। एक महीना पहले तक बैंक उधारी के लिए तरलता पैदा करने के मकसद से सरकारी बॉन्ड बेच रहे थे। बढ़े हुए फासले ने हाल में समय जमा दरों और रीपो दर के बीच हाल के दिनों में फासला बढ़ा है और हमारी राय में यह समस्या का एक और लक्षण है। छोटी बचत की दरें कम करने में सरकार की हिचक से उपजा तनाव इस व्याख्या का महज एक हिस्सा है और यह वार्षिक वृद्धिपरक जमा के केवल 10 फीसदी को ही प्रभावित करता है। 
 
हमारे विचार में बैंकों एवं बॉन्ड बाजार दोनों में कमजोर दर हस्तांतरण की असली वजह पैसे की कमजोर आपूर्ति है। चलन में मौजूद मुद्रा, बैंकों में जमा और आरबीआई के पास बैंकों के जमा को कुल योग पिछले तीन साल से करीब 10 फीसदी की दर से बढ़ता रहा है। नॉमिनल संदर्भों में 10-11 फीसदी की वार्षिक दर से बढऩे की अपेक्षा रखने वाली अर्थव्यवस्था के लिए यह वृद्धि काफी कम है। अर्थव्यवस्था के 40 फीसदी से अधिक हिस्से के अनौपचारिक ढांचे को औपचारिक बनाने की नीति को देखते हुए पैसे की आपूर्ति अधिक तेजी से बढऩे की जरूरत है। हालांकि वित्तीय व्यवस्था में जोखिम कम होने से सितंबर 2018 के बाद मुद्रा गुणक भले ही नीचे आ गया है लेकिन आधार मुद्रा में वृद्धि अब सुस्त पड़ते हुए 12 फीसदी ही रह गई है।
 
बॉन्ड एवं बैंक बाजारों में प्रभावी ब्याज दरों के नीचे नहीं आने और अर्थव्यवस्था में सुस्ती जारी रहने के बीच व्यवस्थागत ऋण वृद्धि का 10 फीसदी के नीचे गिर जाना अधिक चौंकाता नहीं है। एक साल पहले तक यह वृद्धि करीब 15 फीसदी थी। ऋण वृद्धि में गिरावट मांग और आपूर्ति दोनों कारणों से आई है। उच्च ब्याज दर होने से कर्ज की मांग हतोत्साहित होती है और वित्तीय संस्थानों की तरफ से ऋण मानदंड सख्त करने एवं ऋण वृद्धि लक्ष्यों को नीचे लाने से मांग भी आपूर्ति भी प्रभावित हो रही है। मसलन, वाहन ऋण के आवेदन खारिज करने की दर बढ़ गई है और म्युचुअल फंडों के जोखिम प्रबंधक थोड़े-बहुत जोखिम वाले बॉन्ड की भी खरीद से हतोत्साहित कर रहे हैं।
 
अगर व्यवस्थागत ऋण में वृद्धि के साथ व्यापक मुद्रा आपूर्ति भी एक अंक में बनी रहती है तो आर्थिक गतिविधियों में अनवरत सुधार की कल्पना कर पाना मुश्किल है। नीति-निर्माताओं के लिए चुनौती यह तय करने की है कि उधारी की दरें नॉमिनल वृद्धि दरों में गिरावट के अनुपात में नीचे आ जाए। यह उस समय तक नहीं हो सकता है जब तक बैंकों एवं बॉन्ड बाजारों तक दर हस्तांतरण में जारी अव्यवस्था दूर करने के लिए बल का इस्तेमाल न किया जाए। व्यापक रूप से विवेकपूर्ण नीति लाने के लिए चक्रीय-रोधी बदलाव एक विकल्प हो सकते हैं लेकिन बैंकों एवं बॉन्ड बाजारों में ऋण प्रसार को इस नीति से प्रभावित कर पाना मुश्किल होगा। हालांकि नीति-निर्माता आधार मुद्रा आपूर्ति की दर बढ़ा सकते हैं और उन्हें ऐसा करना भी चाहिए। इसके लिए अच्छी खासी संख्या में सरकारी बॉन्ड की खरीद की जा सकती है।
 
(लेखक क्रेडिट सुइस के भारतीय रणनीतिकार एवं एशिया-प्रशांत रणनीति के सह-प्रमुख हैं) 
Keyword: RBI, SBI, repo rate, loan, interest,,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या दूरसंचार क्षेत्र को राहत देने के उपाय करे सरकार?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.