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गहराते बादल

साप्ताहिक मंथन
टी. एन. नाइनन /  November 08, 2019

अर्थव्यवस्था पर छाए संकट के बादल घने होते जा रहे हैं। मूडी ने भारत को लेकर अपनी रेटिंग में जो चेतावनी दी है वह पहले से कमजोर आर्थिक संभावनाओं में आ रहे और अधिक बदलाव को चिह्नित करना ही है। आमतौर पर रेटिंग एजेंसियां धीमी गति से प्रतिक्रिया देती हैं। पूर्वानुमान लगाने वालों में से अधिकांश ने यह आशा जताई थी कि जुलाई-सितंबर तिमाही के बाद अर्थव्यवस्था में मामूली सुधार दिखाई दे सकता है (भले ही आधार अवधि में बदलाव के कारण) लेकिन शायद ऐसा नहीं हो क्योंकि इस मंदी के अपने तमाम कारण हैं। 

 
एक राजकोषीय संकट उत्पन्न हो रहा है जो वित्त आयोग की रिपोर्ट सामने आने के बाद उजागर हो सकता है। खासतौर पर उस स्थिति में जब वह केंद्र सरकार के भारी-भरकम बकाया बिल, छिपे हुए व्यय, राजस्व में कमी तथा तमाम ऐसे कारणों से राज्यों की कर हिस्सेदारी वापस चाहता हो। सरकार वोट जुटाने के लिए नागरिकों के अनुकूल कार्यक्रमों पर व्यय कर रही है। इसकी शिकायत भला किससे की जाए। लेकिन वे कदम कहां हैं जिनकी बदौलत इनके लिए धन जुटाया जाएगा। पूंजी का या तो गलत तरीके से इस्तेमाल हो रहा है या उसे नष्ट किया जा रहा है। वित्तीय क्षेत्र डूब रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र ढेरों नकदी गड़प रहा है। 
 
ताजा मामला दिवालिया दूरसंचार कंपनियों का है जो वेतन तक देने की स्थिति में नहीं हैं। रेलवे में ढेर सारी नकदी लगी है लेकिन आवाजाही या राजस्व के मोर्चे पर कोई खास बढ़ोतरी नजर नहीं आती। दिवालिया प्रक्रिया का किस्सा अलग ही है। गैर जवाबदेह किस्म के मुख्यमंत्री ऊर्जा अनुबंध रद्द करके पूंजी को नष्ट कर रहे हैं। विभिन्न क्षेत्रों का कुप्रबंधन करने वाले नियामक मसलन दूरसंचार क्षेत्र के नियामक आदि ने भी पूंजी को क्षति पहुंचाई है। सर्वोच्च न्यायालय भी ऐसे मामलों में कोई मदद नहीं कर पाया है। मूल बात यह है कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि संभावनाएं अभी भी उच्च बचत और निवेश दर में निहित हैं लेकिन यदि निवेश की गई राशि बिना किसी सुराग के डूब जाए तो ऐसे में क्या कहा जा सकता है। अचल संपत्ति क्षेत्र की कहानी भी इससे अलग नहीं है।
 
सबसे बड़ी चिंता है आश्वस्त न होते हुए भी ऐसे आरोपों को नकारे जाने की। बड़े क्षेत्रीय कारोबारी समझौते से बाहर रहने का निर्णय भी शायद कोई विकल्प न होने की स्थिति में लिया गया। परंतु यह दर्शाना मूर्खतापूर्ण है कि यह साहसी नेतृत्व का उदाहरण है। जब बंगलादेश के पूर्व में स्थित हर देश इसमें शामिल हो और भारत नहीं तो यह बताता है कि गड़बड़ी भारत में ही है। यह बीते पांच साल में नेतृत्व की नाकामी दर्शाता है। यह सुधार की कमी है और बताता है कि हम सबसे बड़े और तेज विकसित होते क्षेत्र के साथ एकीकृत नहीं हो पाए।
 
पिछले मुक्त व्यापार समझौतों के भारत के पक्ष में कारगर नहीं होने को लेकर दी जा रही दलील गलत है, उनसे थोड़ा फर्क तो पड़ा। भारतीय बाजार में चीनी उत्पादों की भरमार हो जाने की आशंका वास्तविक हो सकती है और नहीं भी। लेकिन चीन के साथ व्यापार घाटा केवल आधी कहानी ही है, भारत का इस क्षेत्र के अमूमन हरेक देश के साथ बड़ा व्यापार घाटा है। ऑस्ट्रेलिया के लिए दरवाजे खोलने का मतलब कृषि क्षेत्र को खोलना है, न्यूजीलैंड के मामले में यह डेरी उद्योग है और आसियान देशों के मामले में दूसरे कृषि उत्पादों के लिए अपने दरवाजे खोलना है। 'ऐक्टिंग ईस्ट' के बजाय अपना तवज्जो 'लुकिंग वेस्ट' पर लाने के लिए अमेरिका के साथ व्यापार समझौते करने आसान नहीं होंगे, खासकर उस समय जब विश्व व्यापार संगठन में व्यापारिक विवादों पर शिकस्त मिल रही हो।
 
ऐसा कहा जा रहा है कि हम बाद में आरसेप का हिस्सा बन सकते हैं लेकिन घरेलू स्तर पर जीत दर्ज करने वाले लॉबी समूह संरक्षणवादी हैं तो वे सरकारी नीति-निर्माताओं पर अपना नियंत्रण क्यों कम कर देंगे? आयात शुल्कों में कटौती, कृषि उत्पादकता को दोगुना करने और बिजली दरों में क्रॉस सब्सिडी खत्म करने के लिए हमारी तैयारी की कार्ययोजना और समयसीमा कहां हैं? या संगठित रिटेलरों को हतोत्साहित होने पर क्षेत्रीय आपूर्ति शृंखलाओं में घुसने की क्या तैयारी है? सरकार ने आयात शुल्क बढ़ा दिए हैं और एक डंपिंग-रोधी चैंपियन बन चुकी है। ऐसे में भारत पहले से अधिक अंतराभिमुख होता जा रहा है। सवाल यह है कि व्यवस्था कैसे खुल सकती है या अधिक प्रतिस्पद्र्धी हो सकती है? प्रतिस्पद्र्धी इकाइयों को वे लोग बाजार से निकाल बाहर कर दे रहे हैं जो प्रतिस्पद्र्धी नहीं हैं। पराजित ही जीत रहे हैं। पांच लाख करोड़ डॉलर की मंजिल की राह यह तो नहीं है। 
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