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भय से नहीं बल्कि प्रोत्साहन से होगा प्रदूषण का समाधान

बाअदब
सोमशेखर सुंदरेशन /  November 07, 2019

ठंड का मौसम एक बार फिर आ गया है और दिल्ली भी एक बार फिर प्रदूषण और कुहासे की जद में है। आपातकालीन उपाय के रूप में स्कूल बंद कर दिए गए। राज्य सरकार ने सड़क पर सम-विषम वाहन व्यवस्था दोबारा शुरू कर दी है। देश के सत्ताधारी दल के एक राजनेता ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा कि वे इस नियम का उल्लंघन करें। उन्होंने खुद इसकी पहल की। इस बीच दिल्ली के पड़ोसी कृषि प्रधान राज्यों में फसल अवशेष जलाए जाने का सिलसिला लगातार जारी है। इसके अलावा दीवाली के दौरान दिल्ली में जमकर पटाखे भी फोड़े गए। नए वाहनों की खरीद-फरोख्त का सिलसिला भी बदस्तूर चलता रहा। इस पर जो अंकुश लगा भी वह केवल आर्थिक मंदी की वजह से लगा। 

 
यह बात दीगर है कि वह अपने आप में काफी विवादित मसला है। नीति-निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे एक कानून बनाएं जिसमें किसानों के लिए इस बात के पर्याप्त प्रोत्साहन मौजूद हों कि वे फसल कटाई के बाद उसके अवशेष जलाएंगे नहीं। या फिर ऐसे फसल अवशेष जलाने को वैधानिक तरीकों से हतोत्साहित किया जाए। देश में अधिकांश नीति-निर्माण अवांछित रूप से अवैध बल्कि आपराधिक रूप से अवांछित आचरण पर आधारित है। हमारे यहां अवांछित आचरण को आपराधिक करार देने की सहज वृत्ति है। संक्षेप में कहा जाए तो हमारी नीति-निर्माण प्रक्रिया काफी हद तक भयादोहन करती है। इसमें दंड को प्राथमिक उपाय के रूप में अपनाया जाता है जबकि यह काम प्रोत्साहन के जरिये भी किया जा सकता है। जरूरत यह है कि वांछित नतीजे हासिल करने के लिए प्रोत्साहित करने और हतोत्साहित करने वाले ढांचे का प्रयोग किया जाए।
 
अब वक्त आ गया है कि दिल्ली के आसपास के राज्यों के किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन देने की नीति लाने पर विचार किया जाए। मान लीजिए किसी किसान को फसल अवशेष नहीं जलाने का प्रोत्साहन दिया जाता है और फसल अवशेष के निपटान का काम किसी सरकारी या सरकारी फंडिंग वाली सामुदायिक पहल के माध्यम से किया जाता है। यह प्रोत्साहन उर्वरक के रूप में या नकद हस्तांतरण के रूप में हो सकता है। व्यापक सामुदायिक लागत तो फसल अवशेष न जलाने के वांछित विकल्प से ही पूरी हो जाएगी। आरोप-प्रत्यारोप की बात करें तो जिन राजनेताओं को सत्ता सौंपी गई है उन्हें इसकी कोई राजनीतिक कीमत नहीं चुकानी पड़ती। जब तक कोई राजनीतिक कीमत न चुकानी पड़े राजनेता प्रसन्नतापूर्वक वाहनों पर लगे प्रतिबंध का उल्लंघन कर सकते हैं और फसल अवशेष जलाए जाने को वजह मानने से इनकार कर सकते हैं। इसके अलावा उनके पास इंटरनेट ट्रोल (ऑनलाइन जगत में बेवजह लोगों को निशाना बनाने वाले) की एक सेना होती है जो ऐसे मीम बनाने में माहिर होती है जो एक मुख्यमंत्री को पूरी समस्या की वजह बनाकर पेश करें।
 
जब तक ऐसी प्रोत्साहन प्रणाली विकसित नहीं होगी तब तक यह समस्या यथावत बनी रहेगी। इस बीच दिशा-निर्देश जारी करने के लिए उत्सुक न्यायपालिका को केवल सुर्खी बटोरने वाली एक जनहित याचिका की आवश्यकता है और वह बिना मूल समस्या का पता लगाए अथवा हल की जांच-परख किए अपने निर्देश जारी कर देती है। मामला अगली फसल तक या अगली दीवाली तक या फिर कहें दिल्ली में स्मॉग की समस्या को लेकर अगली दफा हायतौबा होने तक मामला मुल्तवी हो जाता है। दिल्ली और उसके आसपास के राज्य यदि हिमालय की पहाडिय़ों में बसने वाले और अब लुप्तप्राय हो चुके हिम तेंदुओं (स्नो लेपर्ड) के संरक्षण और बचाव के प्रोत्साहन आधारित रुख का अध्ययन करेंगे तो बेहतर होगा। हिमालय के आसपास के राज्यों में हिम तेंदुओं को गांव वालों का दुश्मन माना जाता था। वे पालतू पशुओं को मार देते थे जिससे इन गांव वालों को भारी आर्थिक बोझ सहना पड़ता था। बदले में गांव वाले भी इन हिम तेंदुओं को जहर दे देते या उनका शिकार करते। इसके कारण वे तेजी से विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गए। इस विषय में एक सुविचारित कार्यक्रम चलाया गया जो सफल भी रहा। यह कैसे हुआ? 
 
जो गांव वाले हिम तेंदुओं हमले की जद में थे वे इनका शिकार करके या इन्हें जहर देकर मारते थे। इन गांव वालों की सहायता करते हुए उनके घरों में पर्यटकों के रुकने की व्यवस्था की गई। पालतू पशुओं को तेंदुओं के हमलों से बचाने के लिए सौर ऊर्जा से चलने वाली लाइट का प्रयोग किया गया। प्रयोग ने दिखाया कि ये लाइट काम कर रही थी और हमले नहीं हो रहे थे। कुछ गांवों में लाइट की जगह केवल तार की बाड़ लगाई गई जो कारगर नहीं रही। जिन गांव वालों के पालतू पशुओं को हिम तेंदुओं ने मारा उनको बीमा के जरिये हर्जाना दिया गया। इसके लिए सरकार की पुरानी बीमा नीति में बदलाव किया गया जिसके तहत गांव वालों को नुकसान का प्रमाण लेकर लंबी दूरी तय करनी पड़ती थी। तब जाकर उन्हें हर्जाना मिलता था। घरों में रुकने वाले पर्यटकों से होने वाली आय की सहायता से सौर ऊर्जा से चलने वाले वाटर हीटर लगाए गए ताकि नहाने को गर्म पानी मिल सके। इससे पर्यटकों की संख्या में इजाफा हुआ। स्कूली शिक्षा में जागरूकता बढ़ाने वाले पाठ्यक्रम शामिल किए गए। इसका भी असर पड़ा क्योंकि बच्चे घरों में प्रभावी दखल रखते थे। 
 
धीरे-धीरे हिम तेंदुओं के मारे जाने की घटनाओं में कमी आने लगी। वे ज्यादा तादाद में नजर आने लगे। अब स्थिति यह है कि यदि गलती से भी कोई हिम तेंदुआ कहीं फंसा हुआ नजर आ जाए तो गांव वाले बदला लेने के बजाय बचावकर्मियों को बुलाते हैं। दिल्ली की स्मॉग की समस्या भी ऐसी नहीं कि हल न की जा सके। जरूरत इस बात की है कि कुछ नया सोच अपनाया जाए और स्थानीय बुद्घिमता का प्रयोग करके लाभ आधारित हल तलाश किए जाएं। कानून का भय दिखाकर इस समस्या को हल नहीं किया जा सकता। 
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