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भारत ने आरसेप से अंतिम समय में क्यों बनाई दूरी

दिल्ली डायरी
ए के भट्टाचार्य /  November 06, 2019

यह बहुत चौंकाने वाली बात थी कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने सोमवार को क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) व्यापार समझौते में शामिल नहीं होने का निर्णय लिया। प्रधानमंत्री आरसेप की तीसरी बैठक में हिस्सा लेने के लिए बैंकॉक में मौजूद थे और ऐसा लग रहा था कि भारत इसमें शामिल होगा। परंतु अंतिम समय में भारत ने यह कहते हुए इससे दूरी बना ली कि इस नए कारोबारी समझौते की शर्तें भारत के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ हैं। आखिर अंतिम क्षणों में ऐसा क्या हुआ?

 
16 देशों की सदस्यता वाले आरसेप को दुनिया के सबसे बड़े कारोबारी समूह के रूप में परिकल्पित किया गया था। इसमें आसियान के 10 देश तथा उनके साथ मुक्त व्यापार समझौते वाले छह देश शामिल होने थे, यानी 300 करोड़ लोग। यह पूरी दुनिया की आबादी का 45 प्रतिशत था। इन देशों का सकल घरेलू उत्पाद करीब 21.3 लाख करोड़ डॉलर और विश्व व्यापार में इनकी हिस्सेदारी 40 फीसदी है। भारत के बाहर होने के बाद इस समूह की क्षमता में कमी आएगी लेकिन इसके बावजूद यह दुनिया का सबसे बड़ा कारोबारी समूह बना रहेगा।
 
भारत के इस निर्णय पर अचंभा स्वाभाविक है। इस सप्ताह के आरंभ में आरसेप शिखर बैठक से पहले सरकार तथा विभिन्न अंशधारक जिनमें औद्योगिक संगठन तथा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के धड़े शामिल थे, उनकी यही राय निकल रही थी कि भारत के लिए इस विशाल कारोबारी समूह से बाहर रहने के बजाय भीतर रहना बेहतर होगा। कहा गया कि भीतर रहने से सरकार के पास यह अवसर होगा कि वह नियमों के बनते वक्त अपने हितों के मुताबिक उनमें संशोधन कराए। इतना ही नहीं आरसेप में शामिल कई देशों ने भी भारत को यह संकेत दिया कि उन्हें भारत का भीतर रहना पसंद आएगा क्योंकि वह चीन जैसे रसूखदार देश को नियंत्रित रखने में मदद करेगा।
 
देश का व्यापार बढ़ाने को लेकर सरकार द्वारा नियुक्त उच्चस्तरीय सलाहकार समूह ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश के आरसेप में शामिल होने के कई लाभ हैं। यह रिपोर्ट बमुश्किल 10 दिन पहले दी गई है। रिपोर्ट जारी करने के कार्यक्रम में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि दस्तावेज गीता, बाइबिल या कुरान जैसा है। अचानक ऐसा क्या हुआ कि आरसेप पर देश का रुख एकदम बदल गया। मोदी के बैठक में शामिल होने का इस अचानक लिए गए निर्णय से सीधा संबंध है। ऐसा कम ही होता है कि कोई शासनाध्यक्ष किसी शिखर बैठक में शामिल हो या अंतिम समय में उससे नाम वापस ले। मोदी ने सोमवार को जो किया उसकी तुलना अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप द्वारा 12 देशों के प्रशांत-पार समझौते से नाम वापस लेने से की जाएगी। परंतु इन दोनों में अंतर है। ट्रंप ने ऐसी संधि से नाता तोड़ा जिस पर उनके पूर्ववर्ती ने 2016 में हस्ताक्षर किए थे। मोदी ऐसे समझौते पर आगे बढ़ रहे थे जिसे पिछली सरकार ने शुरू किया था और इसे खारिज करने से पहले वह इस पर हस्ताक्षर करने के करीब पहुंचे थे।
 
परंतु अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दृष्टि से देखें तो मोदी का इस समझौते से बाहर निकलना उनके लिए झटका माना जाएगा। एक मजबूत नेता समझौता वार्ता में तभी शामिल होता है जब उसे लगे कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा की जा सकती है। सवाल यह है कि मोदी जब भारत के हितों की सुरक्षा को लेकर आश्वस्त नहीं थे तो वह इस वार्ता में क्यों शामिल हुए। मोदी को इस विषय में एक भरोसेमंद वजह देनी होगी। अभी कहा जा रहा है कि भारत आरसेप में शामिल नहीं हुआ क्योंकि सदस्य देश भारत की उस शर्त पर राजी नहीं हुए जिसमें चीन से आयात की सीमा निर्धारित करने, सेवा व्यापार बढ़ाने और भारतीय वस्तुओं और सेवाओं को चीनी बाजार में बेहतर पहुंच सुनिश्चित करने और 2019 को कृषि तथा डेरी क्षेत्र में शुल्क कटौती का आधार वर्ष बनाने की बात शामिल थी। इनमें से कोई मुद्दा नया नहीं था। भारत सरकार को उम्मीद थी कि इस दिशा में आगे बातचीत से राह निकलेगी। ऐसे में बैंकॉक में क्या हुआ जो सरकार ने समझौते में शामिल न होने का निर्णय लिया। क्या आरसेप के सदस्य देश भारत की चिंताओं को तवज्जो नहीं दे रहे थे? क्या ऐसा इसलिए था क्योंकि चीन का प्रभाव बढ़ा? क्या भारत की मोलतोल की क्षमता प्रभावित हुई क्योंकि कश्मीर के घटनाक्रम के बाद अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रुख बदला? 
 
इस बात में कोई दम नहीं है कि सरकार ने अपना रुख स्वदेशी जागरण मंच के भारी विरोध के बाद बदला। मंच मुक्त व्यापार का विरोधी और संरक्षणवाद का हिमायती है। यह भी सही नहीं कि किसानों और औद्योगिक नेताओं के विरोध के कारण सरकार का रुख बदला। तथ्य तो यही है कि स्वदेशी जागरण मंच ने हमेशा आरसेप का विरोध किया है। मंच की पहले अनदेखी क्यों हुई और वह अचानक महत्त्वपूर्ण क्यों हो गया? इसी तरह मोदी के बैंकॉक जाने के कुछ दिन पहले सीआईआई ने एक वक्तव्य जारी कर भारत के आरसेप में शामिल होने का समर्थन किया था। परंतु गत सोमवार को सीआईआई ने भी अपना रुख बदला और सरकार के आरसेप से हटने का समर्थन किया। 
 
संभव है कि भारत सरकार को बैंकॉक में लगा हो कि उसकी मांगें नहीं सुनी जा रही हैं और उसने अमेरिका के साथ व्यापार समझौते की दिशा में बढऩे का निर्णय किया हो। आरसेप में शामिल होने को अमेरिका भारत के चीन के करीबी साझेदार और चीनी वस्तुओं के नए बाजार के रूप में देख सकता था। इससे चीन पर लगाए उसके प्रतिबंध कम असरदार हों। भारत के आरसेप से बाहर होने ने भारत और अमेरिका के बीच नए व्यापारिक समझौतों की राह आसान की है। यदि अमेरिका भारत के साथ जल्द व्यापार समझौता करता है और भारत चीन द्वारा भारतीय वस्तुओं की पहुंच को नकारने का प्रतिरोध करता है तो भारत के आरसेप से बाहर होने की दलील को एक नया आयाम मिलेगा। 
Keyword: RCEP, FTA, narendra modi,,
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