बिजनेस स्टैंडर्ड - मोदी और चिनफिंग के पास है अवसर
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मोदी और चिनफिंग के पास है अवसर

तरुण दास /  November 06, 2019

पांच शिखर बैठकों का पहला नतीजा, दोनों देशों के कद्दावर नेताओं के बीच आपसी मान-सम्मान में चरणबद्घ इजाफे के रूप में सामने आ सकता है। विस्तार से जानकारी दे रहे हैं तरुण दास

 
भारत और चीन के रिश्तों के भविष्य पर दृष्टि डालने पर क्या नजर आता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र  मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच पांच शिखर वार्ताओं को नजर में रखते हुए सन 2022 पर नजर डालना बेहतर होगा। इनमें से दो शिखर बैठक हो चुकी हैं जबकि तीन बैठकें क्रमश: 2020, 2021 और 2022 में होनी हैं। पांच वर्ष की अवधि किसी भी तरह की प्रगति या इसके उलट हालात को आंकने की दृष्टि से उचित हैं। इन पांच शिखर बैठकों का पहला नतीजा दोनों मजबूत नेताओं के बीच बढ़ते आपसी सम्मान के रूप में सामने आता है। ये दोनों नेता न केवल अपने व्यक्तित्व में मजबूत हैं बल्कि उनके कदम भी मजबूती भरे हैं। उनके बीच मतभेद होने पर भी आपसी सम्मान द्विपक्षीय रिश्तों के लिए बेहतर ही रहता है। दिक्कतों की कमी नहीं है और चुनौतियां तो उससे भी कई गुना ज्यादा हैं। पांच अनौपचारिक बैठकों में काफी समय साथ बिताने के बाद और अन्य बैठकों में कई मुलाकातों के बाद आपसी सम्मान की अपेक्षा होना स्वाभाविक है। यदि ऐसा होता है तो 2022 तक काफी बेहतरी आ सकती है। 
 
इस आपसी मान-सम्मान से आगे बढ़ें तो दूसरा नतीजा हो आपसी विश्वास में कदम दर कदम इजाफा। यह दोनों देशों के लिए एक बड़ी प्रगति होगी क्योंकि दोनों देश आधी सदी से आपसी विश्वास की कमी से जूझ रहे हैं। भरोसे की यह कमी दोनों ओर से है। भरोसा कायम करने में कई छोटे-छोटे कदम लगते हैं लेकिन एक गलत कदम से यह भरोसा टूट जाता है। तमाम तरह की चुनौतियों के बावजूद पांच अनौपचारिक शिखर बैठकों के कारण आपसी भरोसे में सुधार तो होना चाहिए। सन 2022 तक इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है। 
 
तीसरा नतीजा हो सकता है व्यापार को लेकर आपसी समझ में सुधार। भारत का व्यापार घाटा करीब 60 अरब डॉलर से अधिक है। व्यापार घाटे को धीरे-धीरे कम करके 25 अरब डॉलर तक लाया जा सकता है। यह स्तर अपेक्षाकृत बेहतर माना जा सकता है। लेकिन इसके उलट यह बढ़कर 70 अरब डॉलर भी हो सकता है। यह न केवल दोनों सरकारों पर बल्कि दोनों देशों के कारोबार और उद्योग जगत पर भी निर्भर करता है। दोनों देशों की सरकारों खासकर चीन द्वारा द्वारा तय माहौल में ही निर्यातक और आयातक काम करते हैं। द्विपक्षीय व्यापार पर वास्तविक प्रगति हकीकत में तब्दील हो सकती है। इसे दोनों देशों के नेता और उद्योग गति प्रदान कर सकते हैं लेकिन यह काफी हद तक चीन पर निर्भर करेगा।
 
यदि चीन अपने अपेक्षाकृत छोटे पड़ोसियों के साथ तार्किकता से पेश आता है तो सन 2022 तक क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (आरसेप) में भी उल्लेखनीय प्रगति देखने को मिलेगी। इन सारे देशों की अर्थव्यवस्था का आकार चीन की तुलना में काफी छोटा है। भारत भी इनमें शामिल है। जाहिर है चीन की भूमिका बड़ी होगी और आवश्यक यह होगा कि वह इन देशों को दबाने के बजाय इनका सहयोग करे। अच्छा होगा कि वह भय उत्पन्न करने के बजाय मित्र बनाए। वर्ष 2022 तक चौथी बात यह हो सकती है कि आतंकवाद को लेकर दोनों देश व्यावहारिक सहयोग करें। चीन की अन्य प्रतिबद्घताओं के बावजूद इस दिशा में खाका खींचने में मदद मिलेगी क्योंकि भारत तथा शेष विश्व की तरह उसके लिए भी आतंकवाद गंभीर चिंता का विषय है। चीन यह समझता है कि आतंकवाद कितना नुकसान पहुंचा सकता है। आतंकवाद संक्रामक है। सन 2022 तक भारत और चीन शायद कुछ साझा चिंताओं पर साथ मिलकर काम करें। 
 
पांचवां नतीजा एक अलग क्षेत्र से सहयोग के रूप में सामने आ सकता है। यह दो तरफा निवेश के रूप में सामने आ सकता है लेकिन भारत के विनिर्माण उद्योग को इसका विशेष लाभ मिल सकता है। जब तक भरोसे में कमी है, नीति और प्रक्रियाएं निवेश को बाधित करेंगे। यह परिदृश्य बदलने पर द्विपक्षीय निवेश का माहौल भी बदलेगा। दोनों देशों में उनके उद्योग विनिर्माण इकाइयां स्थापित कर सकते हैं, रोजगार तैयार कर सकते हैं और तकनीकी विकास कर सकते हैं। यदि विश्वास निर्माण की प्रक्रिया और एक दूसरे के प्रति खुलापन लाने की प्रक्रिया में इजाफा होता है तो सन 2022 की तस्वीर बदली हुई नजर आ सकती है।
 
छठा नतीजा अहम होगा: रक्षा, सैन्य और सुरक्षा सहयोग की शुरुआत। विश्वास के बिना इस क्षेत्र में दिक्कत हो सकती है। सामरिक सहयोग और साझा सामरिक हितों में इनकी अहम भूमिका है। उपरोक्त शिखर बैठकें इस दिशा में अहम शुरुआत करेंगी। सातवां नतीजा जनता से जनता का संपर्क बढ़ाने से संबद्ध है। खासतौर पर शिक्षा, प्रशिक्षण और पर्यटन के क्षेत्र में। वीजा जारी होने या न होने का संबंध द्विपक्षीय तनाव और मतभेदों से है। इस बात की पूरी संभावना है कि वर्ष 2022 तक दोनों देशों के लोगों के आपसी संवाद में सुधार होगा, लोग एक दूसरे की भाषा सीखेंगे। दोनों देशों के छात्र ज्यादा तादाद में एक दूसरे के यहां जाएंगे। अन्य नतीजे भी होंगे लेकिन हर मोर्चे पर कड़ी वार्ता के बाद ही आगे की राह निकलेगी। यह इससे पहले के सिद्धांतों से अलग है जहां कहा जाता था कि भारत को चीन के प्रति अपनी समझ बढ़ानी चाहिए। मौजूदा रुख अलग है। यह आत्मसम्मान, आत्मगौरव, आत्मविश्वास आदि से संबंधित है। हर कदम कठिन होगा लेकिन दोनों देशों की साथ प्रगति के परिदृश्य में ऐसे कदम उठाने होंगे। इस दिशा में कोई भी प्रगति चरणबद्ध तरीके से ही होगी। इसमें कोई रूमानियत या भावुकता नहीं होगी लेकिन लक्ष्य यही होगा कि चीन और भारत के बीच गहरे और व्यापक रिश्ते कायम किए जाएं।
 
ऐसे भी क्षेत्र होंगे जहां कोई प्रगति नहीं होगी। परंतु दोनों नेताओं का परस्पर सहयोग न केवल द्विपक्षीय रिश्तों में बल्कि तमाम एशिया और संपूर्ण विश्व में अंतर पैदा करेगा। मोदी और शी चिनफिंग के पास यह अवसर है कि वे सही दिशा में आगे बढ़कर भरोसा न करने वालों को गलत साबित कर सकें।
 
(लेखक सीआईआई के मुख्य कार्याधिकारी, महा निदेशक और मुख्य सलाहकार रहे हैं)
Keyword: india, china, economy, trade, narendra modi,,
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