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इंटर-क्रेडिटर करार में होगा बदलाव

रघु मोहन / मुंबई November 06, 2019

इंटर-क्रेडिटर करार (आईसीए) में अहम बदलाव होने वाला है क्योंकि इसके क्रियान्वयन में अवरोध के कारण फंसे कर्ज के समाधान में हो रही दिक्कतों को दूर करने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक विकल्पों पर विचार कर रहा है। केंद्रीय बैंक (आरबीआई), कंसोर्टियम के भीतर संबंधों की शुरुआत और बैंकों की विभिन्न व्यवस्था के आगाज से ही इंटर क्रेडिटर करार की व्यवहार्यता पर विचार कर रहा है। इससे सुनिश्चित होगा कि खाते के चूक करने पर या मुश्किल वक्त में क्या किया जाना चाहिए। आईसीए को ज्यादा सक्रिय बनाने का विचार है, जिसमें स्पष्ट रूप से शर्तें लिखी होगी। 
 
चूक के पहले वाले चरण में आईसीए कब होना चाहिए, उसे बैंकों के स्वविवेक पर छोड़ा जा सकता है। इसे दबाव वाली परिसंपत्तियों पर आरबीआई के 7 जून को सर्कुलर के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। इस सर्कुलर में कहा गया है कि 2,000 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम वाले सभी दबावयुक्त खाते तत्काल प्रभाव से इसके दायरे में आ जाएंगे। इसके अलावा 1 जनवरी 2020 से 1,500 करोड़ रुपये से लेकर 2,000 करोड़ रुपये के बीच वाले दबाव वाले खाते इसके दायरे में आएंगे। लेकिन 1,500 करोड़ रुपये से नीचे वाले दबावयुक्त खातों पर यह चुप है।
 
आईसीए का दायरा बढ़ाने यानी इसके दायरे में म्युचुअल फंडों, प्राइवेट इक्विटी, ऑल्टरनेट इन्वेस्टमेंट फंडों आदि को लाने के लिए आपसी जुड़ाव वाले मसले पर ध्यान दिया जाएगा। यह बताया गया है कि आईसीए के दायरे का अनिवार्य रूप से विस्तार किए बिना शुरू मेंं ही यह स्पष्ट कर दिया जाएगा कि गैर-बैंक लेनदार इस पंक्ति में कहां खड़े होंगे। कम से कम इस तरह से वे इस पर फैसला ले पाएंगे कि कर्ज दिया जाए या नहीं। कंसोर्टियम के भीतर वाले बैंकों में रखी रकम पर ग्रहणाधिकार आदि की भी जांच की जाएगी। इसकी वजह यह है कि दबाव वाले खातों के कई मामलों में ये रकम किसी निजी बैंक में जमा करा दी गई, जहां सार्वजनिक बैंकों के मुकाबले नकदी प्रबंधन की काफी बेहतर व्यवस्था होती है। या फिर इस मामले में एस्क्रो जैसी व्यवस्था की गई। 
 
मौजूदा आईसीए योजना में विदेशी लेनदारों की स्थिति और शहरी सहकारी बैंकों की स्थिति की भी समीक्षा की जाएगी। यह विशेष रूप से कहा गया है कि केंद्रीय बैंक छोटे स्तर पर प्रबंधन में शामिल नहीं होना चाहता, लेकिन आईसीओ का शुरू हो जाना चाहिए। इसमें हासिल करने वाले व गंवाने वाले होंगे, लेकिन अब हम इस स्थिति में हैं कि कौन कहां है इसका पता शुरू से ही चल जाएगा। केंद्रीय बैंक का रुख इसके साथ यह है कि आईसीए को कारगर बनाने की जवाबदेही बैंकों की होगी, लेकिन फंसी परिसंपत्तियों के समाधान के मामले में यह संतोषजनक नहींं पाया गया है। आरबीआई की तरफ से 7 जून के सर्कुलर में बैंकों के लिए आईसीए अनिवार्य बनाए जाने के बावजूद यह देखने को मिला है।
 
यह कहा गया है कि केंद्रीय बैंक के 7 जून के सर्कुलर में अनिवार्य आईसीए का विचार बैंकों को फैसला लेने के लिए सशक्त बनाता है और एनसीएलटी गए बिना फंसे कर्ज के मसले का समाधान निकालता है। एक सूत्र ने कहा, अगर आईसीए अभी भी परिणाम नहीं दे रहा है तो हम 12 फरवरी के सर्कुलर के बाद की परिस्थितियोंं से अलग नहीं हैं, जिसे सर्वोच्च न्यायालय अवैध करार दिया था।
Keyword: ICA, RBI, loan, debt,,
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