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सौदेबादी से बंद न हों आरसेप के दरवाजे

इंदिवजल धस्माना /  November 05, 2019

अर्थशास्त्री और नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष अरविंद पानगडिय़ा कहते हैं कि भारत द्वारा सौदेबाजी करने से क्षेत्रीय समग्र आर्थिक साझेदारी (आरसेप) में इसके दरवाजे बंद नहीं होने चाहिए। उन्होंने इंदिवजल धस्माना से कहा कि भारत का इरादा अंतत: समूह में शामिल होने वाला ही रहना चाहिए। संपादित अंश :

 
हाल में आपने कहा था कि भारत जमकर सौदेबाजी करे लेकिन आरसेप में शामिल हो। अब भारत ने आरसेप में शामिल नहीं होने का फैसला किया है। आपकी राय?
 
भारत का मौजूदा रुख पूरी तरह से वही है, जैसा कि मैने कहा था। सौदेबाजी अब भी चल रही है और भारत जमकर सौदेबाजी कर रहा है। आरसेप के अन्य 15 देशों ने यह कहते हुए काफी मैत्रिपूण बयान जारी किया है कि वे मतभेदों को सुलझाने की कोशिश करेंगे। मेरी यही आशा है कि हम जमकर सौदेबाजी करें लेकिन सदेच्छा और अंतत: समूह में शामिल होने के अभिप्राय से।
 
भारत की इस बात पर आपकी क्या प्रतिक्रिया रहेगी कि आरसेप में शामिल होने से देश में कमजोर वर्ग की आजीविका प्रभावित हो जाती?
 
कृषि भारत में संवेदनशील मसला रहता है। औद्योगिक उत्पादों के संबंध में मेरा विचार यह है कि हमें प्रतिस्पर्धा से नहीं डरना चाहिए। हमारे कई विनिर्माण क्षेत्रों में भारी अक्षमता बनी हुई है और इन क्षेत्रों में अधिक प्रतिस्पर्धा होनी चाहिए। 
निर्यात में इजाफे के बिना आयात में कोई इजाफा नहीं हो सकता जब तक कि कोई हमें मुक्त आयात न करे। इसलिए उदारीकरण अकुशल संसाधनों और अधिक लागत वाले आयात-प्रतिस्पर्धी उद्यमों से अधिक कुशल निर्यात-उन्मुख उद्यमों की ओर ही ले जाएगा। यह अनौपचारिक और कम वेतन वाली नौकरियों को अधिक उत्पादकता तथा अधिक वेतन वाली नौकरियों से तब्दील करते हुए कमजोर वर्ग की मदद करेगा, न कि उसे नुकसान पहुंचाएगा।
 
भारत ने कहा है कि आरसेप का मौजूदा स्वरूप मूल भावना और आरसेप के स्वीकृत मार्गदर्शक सिद्धांतों को प्रतिबिंबित नहीं करता है। क्या आप इससे सहमत हैं?
 
इस संबंध में मेरे पास पर्याप्त जानकारी नहीं है।
 
आरसेप भारत के कृषि, डेयरी और एमएसएमई क्षेत्रों को तबाह कर देता। क्या आप इससे सहमत हैं?
 
अन्य क्षेत्रों के साथ-साथ डेयरी और कृषि की संवेदनशीलता से उबरने में हमें कुछ समय लगेगा। यह राह उद्योग और सेवाओं में ज्यादा नौकरियों के सृजन से होकर गुजरती है। यहां मुझे लगता है कि हमें कृषि तथा एसएमई और बड़े उद्यमों की ओर बढऩे के लिए श्रमिकों की खातिर एक रास्ता तैयार करने की जरूरत है। ये मुख्य रूप से आजीविका वाली नौकरियां हैं और हमें इन श्रमिकों के लिए बेहतर वेतन वाली नौकरियां सृजित करने की जरूरत है। 
 
आरसेप में शामिल होने के वास्ते भारत के लिए अब भी दरवाजे खुले हैं। क्या भारत को उस अवसर का इस्तेमाल करना चाहिए?
 
बिल्कुल।
Keyword: RCEP, commerce, arvind pangaria,,
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