बिजनेस स्टैंडर्ड - पराली के विकल्प पर धीमी रही चाल
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पराली के विकल्प पर धीमी रही चाल

शाइन जैकब, नितिन कुमार और श्रेया जय /  November 05, 2019

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) प्रत्येक वर्ष गंभीर वायु प्रदूषण का सामना करता है लेकिन फसल अपशिष्ट या पराली के लिए अपनाई जाने वाली वैकल्पिक योजनाओं पर अभी तक कोई काम शुरू नहीं किया गया। इनके तहत पराली और अन्य फसल अपशिष्ट खरीदने वाली तेल विपणन कंपनियों (ओएमसी) तथा थर्मल पावर इकाइयों को साथ लाने और 'कृषि यांत्रिकीकरण' को बढ़ावा देने की योजना थी। लेकिन इन दोनों योजनाओं को ही आंशिक सफलता मिली है।  अधिकारियों का कहना है कि ओएमसी कंपनियों द्वारा किसानों से पराली खरीदकर बायोएथनॉल बनाने की योजना अगले वर्ष से ही व्यापक रूप ले पाएगी। सरकार द्वारा पिछले साल दूसरी पीढ़ी की कम से कम 12 बायोएथनॉल इकाइयां लगाने की योजना बनाई गई थी, जिसके लिए सालाना 1,50,000 टन जैविक अवयवों की आवश्यकता होगी। इनमें चावल और गेहूं के भूसे/पराली, बांस की लकडिय़ां आदि शामिल हैं। इस योजना के अनुसार, ओएमसी संग्रह केंद्रों की स्थापना करेगी और किसानों को अपशिष्ट/पराली के लिए भुगतान करेगी।

 
अधिकारियों ने बताया कि इनमें से तीन इकाइयों के वर्ष 2020 के अंत तक शुरू होने की उम्मीद है, जिसके लिए लगभग 2,000-2,500 करोड़ रुपये के निवेश की संभावना है। कुछ इकाइयों पर तेज गति से काम हो रहा है, जिसमें बठिंडा (पंजाब) में हिंदुस्तान पेट्रोकेमिकल कॉर्पोरेशन की इकाई, पानीपत (हरियाणा) में इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की इकाई और बारगढ़ (ओडिशा) में भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन का 2जी बायोएथनॉल प्लांट शामिल हैं। पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के जैव ईंधन पर कार्यरत समूह के अध्यक्ष वाई बी रामकृष्णा ने कहा, 'नुमालीगढ़ (असम) और मध्यप्रदेश में एक-एक संयंत्र बांस और सोया अपशिष्ट पर केंद्रित है जिनके वर्ष 2012 के मध्य तक परिचालन शुरू करने की संभावना है।' उन्होंने कहा कि वर्तमान में ओएमसी फीड स्टॉक सप्लाई चेन पर काम कर रही हैं और किसान को दी जाने वाली कीमत बाद में निर्धारित की जाएगी।
 
सरकार के अनुमान के मुताबिक, अक्टूबर 2018 में तेल मंत्रालय द्वारा शुरू किए गए एसएटीएटी कार्यक्रम के तहत पंजाब और हरियाणा में लगभग 100 बायोगैस प्लांट बंद लगाने की संभावना है। इस योजना के तहत संभावित उद्यमियों को कंप्रेस्ड बायोगैस (सीबीजी) इकाई स्थापित करने और इसके उत्पाद को ऑटोमोटिव ईंधन के तौर पर उपयोग में लाने के लिए बाजार तक पहुंच बनाने की अनुमति दी गई है। बिजली उत्पादन के लिए पराली का उपयोग करने के लिए बनाए गए उपक्रमों की शृंखला के बीच पंजाब में अब तक केवल दो उपक्रमों ने ही काम करना शुरू किया है। एक अधिकारी ने बताया कि भारत के सबसे बड़े तापीय ऊर्जा उत्पादक ने बायोमास की खरीद के लिए छह निविदाएं जारी की हैं, लेकिन इनकी आपूर्ति सीमित कर दी गई है। उन्होंने कहा कि भले ही कई एजेंसियां फसल अपशिष्ट की आपूर्ति कर रही हैं लेकिन फिर भी आपूर्ति कम पड़ रही है। 
 
पंजाब और हरियाणा के किसानों का कहना है कि बड़े स्तर पर पराली खरीदार अभी तक उनके पास नहीं आया है। हरियाणा में पैकेजिंग उद्योग पराली का सबसे बड़ा खरीदार है। भूमि बचाओ संघर्ष समिति के प्रवक्ता शमशेर सिंह ने कहा, 'हम स्थानीय एजेंट को 3,000-3,500 रुपये प्रति एकड़ के हिसाब से पराली बेच रहे हैं।' मुमताजपुर (हरियाणा) के एक किसान ने बताया कि वे भूमिहीन पशुपालकों को पराली बेच रहे हैं। उन्होंने कहा, 'अगर वे इसे नहीं लेते हैं तो हमें पराली जलानी ही पड़ेगी क्योंकि सरकार ने इसकी खरीद को लेकर कोई योजना नहीं बनाई है।'
 
कृषि यांत्रिकीकरण योजना के मामले में स्थिति अधिक निराशाजनक है। योजना के तहत इन-सीटू फसल अवशेष प्रबंधन के लिए कृषि मशीनों और उपकरणों पर व्यक्तिगत किसानों को 50 प्रतिशत तथा मशीन किराये पर लेने वाले केंद्र बनाने पर 80 प्रतिशत तक अनुदान दिया जाता है। भारतीय किसान यूनियन (रजवाल) के अध्यक्ष बलवीर सिंह रजवाल कहते हैं, 'पंजाब में धान की खेती के लिए 29.2 लाख हेक्टेयर जमीन का उपयोग किया जाता है। सरकार ने लगभग 30,000 किसानों को बीज उपलब्ध कराये हैं, जो इसका मात्र 4.5 प्रतिशत है। अब, सरकार गरीब किसानों को बिना मशीनों पराली काटने के लिए कैसे कह सकती है?'
 
उन्होंने कहा कि पंजाब में किसान पराली जला रहे हैं, क्योंकि बुआई के मौसम के बीच उन्हें पर्याप्त अंतराल नहीं मिल रहा है। सरकार ने 15 मई से पहले धान की नर्सरी की बुआई और 15 जून से पहले धान की रोपाई पर रोक लगा दी है। सामान्य रूप से धान को कटाई के लिए तैयार होने में 140-175 दिन लगते हैं। रजवाल ने कहा, 'जल्द ही अपनी फसलों की कटाई के बाद उन्हें रबी फसल के लिए अपना खेत तैयार करना होता है और इसके चलते उनके पास पराली जलाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है।'
 
प्रधानमंत्री मोदी ने प्रदूषण की स्थिति का लिया जायजा 
 
दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों में वायु की गुणवत्ता गंभीर और बहुत खराब के बीच रहने के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तर भारत में प्रदूषण की स्थिति पर चर्चा करने के लिए मंगलवार को एक बैठक की अध्यक्षता की। प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार मोदी ने पश्चिम भारत के हिस्सों में चक्रवातीय दशाओं से उत्पन्न स्थिति की समीक्षा भी की। यह बैठक प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव पी के मिश्रा द्वारा दिल्ली, पंजाब और हरियाणा के शीर्ष अधिकारियों के साथ रविवार और सोमवार को की गई एक के बाद एक समीक्षा बैठकों के बाद हुई है।
 
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में मंगलवार को हवा की गति बढऩे से पिछले एक सप्ताह से जारी प्रदूषण के खतरनाक स्तर में कुछ कमी आई और अगले कुछ दिनों में वायु गुणवत्ता में थोड़ी बेहतरी की संभावना है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के मुताबिक, सुबह नौ बजकर 45 मिनट पर सूचकांक 365 दर्ज किया गया जबकि दोपहर बाद तीन बजकर 45 मिनट पर यह 331 दर्ज हुआ। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) के ग्रेटर नोएडा (348), नोएडा (358) गाजियाबाद (351), फरीदाबाद में (311) और गुडग़ांव में (328) भी वायु गुणवत्ता में कुछ सुधार हुआ। मौसम विभाग (आईएमडी) ने कहा है कि 25 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार की हवाओं ने प्रदूषकों को तेजी से छितरा दिया है।
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