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भारत के पड़ोस में चीन का बढ़ता दबदबा

अनिता इंदर सिंह /  November 05, 2019

अगर भारत अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है तो उसे अपनी आर्थिक प्रगति की गति तेज करनी होगी और उसमें निरंतरता लानी होगी। विस्तार से जानकारी प्रदान कर रही हैं अनिता इंदर सिंह

 
चीन ने अपनी आर्थिक ताकत के बल पर भारत के उत्तरी और पूर्वी सीमावर्ती इलाकों में पैठ मजबूत की है। उसने नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार के साथ अच्छे रिश्ते कायम किए। इन देशों के साथ चीन के दीर्घावधि के लंबे और मजबूत रिश्ते तथा उसका सुगम संचार बीते छह महीनों के दौरान एकदम उभरकर सामने आया है। नेपाल के साथ चीन के मजबूत रिश्ते राष्ट्रपति शी चिनफिंग की हालिया काठमांडू यात्रा के दौरान साफ नजर आए। अक्टूबर के मध्य में भारत की यात्रा के तुरंत बाद वह नेपाल गए। इससे पहले जुलाई में बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना पेइचिंग की आधिकारिक यात्रा पर गई थीं। अप्रैल में म्यांमार की स्टेट काउंसलर आंग सान सू ची ने पेइचिंग में बेल्ट ऐंड रोड (बीआरआई) की बैठक के दौरान व्यापार और प्रौद्योगिकी संबंधी समझौतों पर हस्ताक्षर किए थे। 
 
ये तीनों देश भारत के मित्र राष्ट्र हैं लेकिन क्या अधिक समृद्ध चीन के साथ उनके रिश्ते ज्यादा मजबूत हैं? भारत के उलट इन तीनों ने चीन की बीआरआई पहल में शिरकत कर ली है। इस पहल का लक्ष्य चीन के आर्थिक और सामरिक हितों को आगे बढ़ाना है। चीन इन तीनों देशों में सबसे अधिक निवेश करने वाला देश है। इन देशों में से दो बांग्लादेश और म्यांमार चीन के शीर्ष तीन हथियार खरीदार देशों में शुमार हैं। म्यांमार अपने 60 फीसदी हथियार चीन से खरीदता है जबकि बांग्लादेश अपने 70 फीसदी हथियार चीन से खरीदता है। चीन के लिए सभी देश महत्त्वपूर्ण हैं। ये दोनों देश बंगाल की खाड़ी में चीन की पहुंच बढ़ाने में मदद कर सकते हैं जहां से वह भारत को चुनौती दे सकता है। बीआरआई चीन की पिछली 40 साल की प्रगति का परिचायक है। हकीकत यह है कि चीन ने इन तीनों मुल्कों के साथ बेहतरीन व्यापार और निवेश रिश्ते कायम किए हैं जबकि भारत ऐसा नहीं कर पाया। चीन ने अहम क्षेत्रों में निवेश करके अपनी जगह बनाई है जबकि भारत इन क्षेत्रों में उन्हें अपेक्षित सहयोग नहीं दे सका। 
 
शी चिनफिंग पिछले दो दशक में नेपाल की यात्रा पर जाने वाले पहले चीनी राष्ट्रपति बने। उनकी इस यात्रा के दौरान कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। एक अहम समझौते में चीन के तिब्बत और नेपाल तक हिमालय के रास्ते रेल संचार को बढ़ावा देने की बात शामिल है। शी चिनफिंग ने नेपाल को आश्वस्त किया है कि रेल परियोजना उसे चारों ओर से जमीन से घिरे मुल्क से बदलकर जमीन से जुड़े देश में तब्दील कर देगी। नेपाल और चीन ने पुलिस, खुफिया विभाग, सीमा प्रबंधन और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बेहतर सहयोग के लिए सुरक्षा समझौते पर भी हस्ताक्षर किए हैं। चीन ने नेपाल में राजमार्गों, हवाई अड्डों और बिजली संयंत्रों में सुधार में भी मदद की है। शी चिनफिंग की यात्रा के पश्चात घोषणा की गई कि चीन, अगले तीन वर्ष के दौरान नेपाल की सेना को करीब 2.1 करोड़ डॉलर की आपदा राहत सामग्री देगा।
 
उधर, भारत के पूर्व में चीन और बांग्लादेश के बीच के रिश्ते गत जुलाई में साफ नजर आए जब हसीना और शी ने ढेर सारे समझौतों पर हस्ताक्षर किए और ऐतिहासिक हिचक को पीछे छोड़ दिया। सन 1971 में भारत ने पाकिस्तान के दो टुकड़े कर बांग्लादेश का निर्माण किया था। बांग्लादेश की आजादी की उस लड़ाई में चीन पाकिस्तान के साथ था। उसने संयुक्त राष्ट्र में उसके प्रवेश को वीटो किया और सन 1976 में नए देश को मान्यता प्रदान की। बहरहाल, इतिहास बदलने को है। दक्षिण एशिया की सबसे तेज विकसित होती अर्थव्यवस्था के रूप में बांग्लादेश ने चीन के 38 अरब डॉलर के निवेश का स्वागत किया है। पाकिस्तान में 46 अरब डॉलर के निवेश के बाद दक्षिण एशिया में यह चीन का सबसे बड़ा निवेश है। इतना ही नहीं चीन ने खुद को बांग्लादेश के सबसे बड़े कारोबारी साझेदार के रूप में स्थापित किया है। दोनों देशों के बीच 2017-18 में कुल 12.4 अरब डॉलर का कारोबार हुआ। उस वर्ष भारत और बांग्लादेश के बीच कुल 9.5 अरब डॉलर का कारोबार हुआ था। बांग्लादेश के आयात का 22 फीसदी चीन से होता है जबकि केवल 1.3 फीसदी भारत से। बांग्लादेश के कुल निर्यात का महज 1.7 फीसदी भारत को मिलता है जबकि 2.3 फीसदी चीन को जाता है।
 
म्यांमार के साथ चीन के रिश्ते इस बात की कहानी कहते हैं कि उसके व्यापारिक साझेदार के रूप में और बुनियादी ढांचा तथा बंदरगाह विकास के क्षेत्र में चीन की क्या भूमिका रही। म्यांमार के आयात का एक तिहाई चीन से और महज 5.2 फीसदी भारत से होता है। उसके निर्यात का 33 फीसदी चीन जाता है जबकि केवल 3.5 फीसदी भारत। चीन ने म्यांमार के पश्चिमी तट पर क्याउक्पू में गहरे सागर में बंदरगाह बनाने में भारी-भरकम निवेश किया है। यह बंदरगाह रणनीतिक रूप से भी बहुत अधिक मायने रखता है क्योंकि चीन के युन्नान प्रांत को जाने वाली प्राकृतिक गैस पाइपलाइन और तेल आदि यहीं से जाते हैं। इससे चीन को पश्चिम एशिया से ऊर्जा आपूर्ति पाने में मदद मिलेगी और उसे भारी भीड़ वाले मलक्का की खाड़ी वाले रास्ते से निजात भी। चीन क्याउक्पू में एक आर्थिक क्षेत्र विकसित कर रहा है।
 
बीआरआई के कर्ज के जाल और भ्रष्टाचार के मामले सामने आने से परियोजनाओं को जोखिम उत्पन्न होने पर चीन ने लचीला रुख अपनाया है। गत वर्ष बांग्लादेश ने चीन की सरकारी कंपनी चाइना हार्बर इंजीनियरिंग कंपनी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगने के बाद 226 किलोमीटर लंबे ढाका-सिलहट मार्ग परियोजना से चीन को बाहर कर दिया था। कंपनी को उस राजमार्ग को चौड़ा करने का अनुबंध मिला था। बांग्लादेश को परियोजना की लागत से भी शिकायत थी। अब वह कम लागत पर खुद उस सड़क का निर्माण कर रही है। इस बीच म्यांमार ने क्याउक्पू बंदरगाह को लेकर योजनाओं को सीमित किया है। परियोजना लागत में भारी कमी की गई है। चीन ने पहले इस परियोजना के 7.3 अरब डॉलर की मांग रखी थी लेकिन म्यांमार द्वारा अनुरोध करने के बाद इसे घटाकर 1.3 अरब डॉलर कर दिया गया।
 
भारत इन तीनों अहम पड़ोसियों को जरूरी वित्तीय मदद मुहैया नहीं करा पा रहा है। लालफीताशाही और परियोजना क्रियान्वयन के क्षेत्र में कमजोर प्रदर्शन ने इसमें और इजाफा किया है। भारत में ये समस्याएं आम हैं और ये हमारी एक्ट ईस्ट नीति के क्रियान्वयन को भी धीमा करती हैं। भारत को इन हकीकतों को अच्छी तरह समझना होगा। यदि भारत चाहता है कि वह इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाए तो उसे अपनी आर्थिक प्रगति तेज करनी होगी और उसे स्थायित्व भी प्रदान करना होगा। उसे अपने पड़ोसियों से किए गए वादों पर खरा उतरना होगा। तब तक लगता यही है कि चीन नेपाल, बांग्लादेश और म्यांमार में अपनी बढ़त जारी रखेगा।
 
(लेखिका सेंटर फॉर पीस ऐंड कन्फ्लिक्ट रेजलूशन, नई दिल्ली की संस्थापक प्रोफेसर हैं)
Keyword: india, china, economy, trade,,
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