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चुनाव की आहट में प्रदूषण पर राजनीति

श्रेया जय और नितिन कुमार /  November 04, 2019

शायद भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में पहली बार प्रदूषण ने केंद्रीय राजनीति में कदम रखा है, खासकर दिल्ली में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर। दिल्ली में सरकार चला रही आम आदमी पार्टी (आप) ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता के खतरनाक स्तर पर पहुंचने से पहले ही दिल्ली में प्रदूषण स्तर से राजनीति लाभ लेने के लिए अभियान शुरू कर दिया है। विभिन्न समाचार पत्रों में विज्ञापन के माध्यम से बताया जा रहा है कि वर्ष 2016-18 के बीच 2012-14 के मुकाबले प्रदूषण स्तर में 25 प्रतिशत की गिरावट आई है। दिल्ली में फरवरी 2020 में चुनाव होने हैं। राज्य में पिछला चुनाव भ्रष्टाचार के मुद्दे पर लड़ा गया था और इस बार आप पार्टी ने अपना रूख सामाजिक-विकासात्मक मुद्दों, विशेषकर प्रदूषण की तरफ कर लिया है। अपने मीडिया अभियानों में पार्टी प्रदूषण के लिए हरियाणा सरकार पर भी आरोप लगा रही है कि हरियाणा सरकार पराली जलाने की घटनाओं को नहीं रोक पा रही। 

 
हरियाणा की भाजपा सरकार ने आप पार्टी और पंजाब में सत्तासीन कांग्रेस सरकार के खिलाफ अभियान शुरू कर दिया है। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर सोशल मीडिया पर सैटेलाइट तस्वीरें साझा कर रहे हैं जिसमें दिखाया जा रहा है कि पंजाब में हरियाणा से अधिक पराली जलाने की घटनाएं हो रही हैं। यह दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बयान के बाद जारी किया गया था। अपने बयान में केजरीवाल ने आरोप लगाया था कि इन दोनों राज्यों में अभी भी पराली जलाने की घटनाएं हो रही हैं। 
 
हालांकि केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा, 'यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल वायु प्रदूषण के मुद्दे का राजनीतिकरण कर रहे हैं और छात्रों को हरियाणा तथा पंजाब के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखने के लिए उकसा रहे हैं कि वे उनकी छवि खराब करें और खलनायक के तौर पर पेश करें।' आरोप-प्रत्यारोप के खेल में जुड़ते हुए दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने कहा कि जावडेकर ने तीन राज्यों के पर्यावरण मंत्रियों के साथ मुलाकातों को स्थगित कर दिया है। उन्होने पिछले सप्ताह कहा था, 'मैं केंद्र से पूछना चाहता हूं कि दिल्ली की जनता कब तक जहरीली हवा में सांस लेगी? क्या उनके पास समय नहीं है या वे दिल्ली की खराब वायु गुणवत्ता को प्राथमिकता नहीं दे रहे।'
 
दूसरी ओर हरियाणा के किसान संगठन फसल अवशेषों के निपटान के लिए थ्रेशर उपलब्ध नहीं कराने के लिए राज्य सरकार को दोषी ठहरा रहे हैं। केंद्र सरकार ने पिछले साल पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए 1,100 करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी जिसमें खेती से जुड़े कई उपकरण शामिल हैं।  हालांकि पंजाब और हरियाणा के किसानों का कहना है कि उन्हें अभी तक किसी तरह की सहायता नहीं मिली है। उन्होंने राज्य सरकारों पर फसल नहीं खरीदने का भी आरोप लगाया जिसके चलते उन्हें फसल अपशिष्ट के समाधान के लिए कोई उपाय करने में परेशानी हो रही है। इस दौरान, 1 नवंबर को पंजाब सरकार ने पराली जलाने के 20,729 मामलों में 2,923 किसानों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है। अखिल भारतीय कृषक खेत मजदूर संगठन के राष्ट्रीय अध्यक्ष सत्यवान नरवाल ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, 'सरकार हमारे खिलाफ पराली जलाने के मामले दर्ज कर रही है। क्या उन्होंने हमारी फसलें खरीदीं। हमने थ्रेशर और डीकंपोजर आदि मशीनों पर खर्च किया है। अब हमारे पास पैसा नहीं है।' 
 
राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण संकट पर नजर रखने वाले विशेषज्ञ बताते हैं कि भले ही बहुत से राजनीतिक बयान दिए जा रहे हैं लेकिन इससे किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है और न ही इसके प्रति कोई जन चेतना पैदा हो रही है।  काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) में रिसर्च फैलो कार्तिक गणेशन कहते हैं, 'इस बात पर राजनीतिक बयान दिए गए हैं कि दिल्ली ने कितना त्याग किया, लेकिन यहां किसी भी तरह की सार्वजनिक स्वास्थ्य चेतावनी दिखाई नहीं दे रही। प्रदूषण को लेकर सार्वजनिक स्वीकृत गायब है और कोई भी इसे स्वास्थ्य संकट के तौर पर प्रचारित नहीं कर रहे हैं। प्रदूषण के लिए एक सार्वजनिक समझ विकसित होनी चाहिए। बताया जाए कि वे इस समस्या का हिस्सा हैं और उनके छोटे-छोटे गलत कदम प्रदूषण को बढ़ावा देते हैं।' दिल्ली सरकार ने पिछले वर्ष विभिन्न उपायों के जरिये वायु प्रदूषण के जोखिमों को कम करने के लिए ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (जीआरएपी) की शुरुआत की थी। इसमें वाहनों के प्रदूषण को कम करना, औद्योगिक प्रदूषकों तथा निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाना शामिल थे। 
 
गणेशन कहते हैं कि जीआरएपी इस समाधान का एक हिस्सा है लेकिन एक सीमा से आगे चीजें दिल्ली सरकार के नियंत्रण में नहीं हैं। वह कहते हैं, 'इसलिए ऐसे कदम उठाने की आवश्यकता है जिनके तहत अधिक खपत को दंडात्मक बनाया जा सके। भारत में किसी भी सरकार ने इस विषय के साथ उस तरह की संवेदनशीलता नहीं दिखाई है जिसकी इसे आवश्यकता है। नीति निर्माण और बुनियादी ढांचे के निर्माण में पर्यावरण संबंधी विषयों को शामिल किया जाना चाहिए।' वैश्विक स्तर पर प्रदूषण और पर्यावरण पहले से ही चुनावी मुद्दे रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में हुए चुनावों में राजनीतिक दल अडानी की कोयला खदान पर राजनीतिक बयानबाजी कर रहे थे तो हाल ही में कनाडा में हुए चुनावों में जलवायु परिवर्तन और उत्सर्जन मुख्य राजनीतिक विषय थे। हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रम्प ने वर्ष 2016 में अपने चुनाव अभियान में कोयला आधारित अर्थव्यवस्था का समर्थन किया था और जलवायु परिवर्तन वार्ताओं में भाग नहीं लिया, जिसे लेकर वैश्विक स्तर पर नाराजगी व्यक्त की गई। 
Keyword: delhi, pollution, parali, election, AAP, BJP,,
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