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आपात स्थिति में पहुंच रही है वायु प्रदूषण की समस्या

जमीनी हकीकत
सुनीता नारायण /  November 04, 2019

दिल्ली में हम सांस भी नहीं ले सकते। शहर की हवा में प्रदूषक तत्त्वों की मात्रा हद से ज्यादा विषाक्तता तक पहुंच चुकी है और यह जन स्वास्थ्य के लिए आपात स्थिति की तरह है। आधिकारिक रूप से हवा की गुणवत्ता अत्यधिक खराब है। यह स्वस्थ लोगों के लिए भी नुकसानदेह है बच्चों, उम्रदराज लोगों और मरीजों आदि को तो भूल ही जाइए। मैं यहां यह चर्चा करना चाहती हूं कि हम बिना शोर-शराबे और राजनीति के ऐसा क्या कर सकते हैं जिससे हवा की गुणवत्ता नियंत्रित रखी जा सके। अक्टूबर के अंत और नवंबर के आरंभ में आखिर क्या हुआ? 27 अक्टूबर, 2019 यानी दीवाली की दोपहर तक दिल्ली में हवा की गुणवत्ता खराब थी लेकिन फिर भी वह सांस लेने लायक थी। मौसम में बदलाव आ रहा था, रातें ठंडी हो रही थीं और हवा का बहना कम हो रहा था, ऐसे में प्रदूषण का स्तर लगातार बढ़ रहा था। पड़ोसी राज्यों पंजाब और हरियाणा में फसल अवशेष जलाने का सिलसिला शुरू हो रहा था, हालांकि दिल्ली के प्रदूषण में इनकी हिस्सेदारी नाम मात्र की थी। बहरहाल यह स्पष्टï था कि हालात आगे और बिगड़ेंगे। यही कारण है कि प्रदूषण के स्थानीय स्रोतों पर नजर रखना जरूरी था। हमें यह तय करना था कि पटाखे न फोड़े जाएं क्योंकि हवा पहले ही बहुत विषाक्त हो चुकी थी। ऐसा नहीं हो सका बल्कि जो हुआ, वह इस प्रकार है। 27 अक्टूबर, 2019 की शाम प्रदूषण के स्तर में नाटकीय इजाफा हुआ। मेरे सहयोगियों ने करीब 50 निगरानी केंद्रों से मिले आंकड़ों से अनुमान लगाया कि पटाखे चलाने के कारण शाम 5 बजे से रात एक बजे के बीच पीएम 2.5 में 10 गुना तक इजाफा हुआ। उनका कहना है कि इसने प्रदूषण नियंत्रण के तमाम जतन पर पानी फेर दिया। यह स्पष्टï है कि यह दीवाली साफ-स्वच्छ नहीं थी। 

 
केवल इतना ही पर्याप्त नहीं है। दीवाली के बाद हवा की दिशा बदल गई और फसल अवशेष जलने के कारण ढेर सारा धुआं शहर के आसमान पर छा गया। कुल प्रदूषण में फसल अवशेष जलने से हुए प्रदूषण की हिस्सेदारी 30 फीसदी है। मानो इतना ही पर्याप्त नहीं था तो अरब सागर की चक्रवाती गतिविधि और मॉनसून की वापसी ने हवा की गति समाप्त कर दी। वह पूरा प्रदूषण अब हवा में ठहर गया है और लोगों का सांस लेना मुश्किल हो गया है। हम मौसम का तो कुछ नहीं कर सकते लेकिन हम प्रदूषण के जरियों को तो कम कर सकते हैं। स्वच्छ हवा हमारा अधिकार है। हम सांस ले सकते हैं। लेकिन इसके लिए हमें वायु प्रदूषण के विज्ञान को भली-भांति समझना होगा। 
 
एक गलत धारणा यह है कि प्रदूषण केवल ठंड के दिनों में बढ़ता है क्योंकि उस समय फसल अवशेष जलाया जाता है। यह तथ्य है कि किसान 15 अक्टूबर से 15 नवंबर के बीच फसल अवशेष जलाते हैं। हमें यह भी बता है कि इससे उत्पन्न धुआं इस क्षेत्र के प्रदूषण में बढ़ोतरी योगदान करता है। परंतु यह ध्यान देने वाली बात है कि यह प्रदूषण की प्रमुख वजह नहीं है। प्रदूषण के वास्तविक कारक साल भर हवा में एकत्रित होते रहते हैं। आम दिनों में हमें स्वच्छता नजर आती है क्योंकि हवा प्रदूषकों को समान रूप से वितरित करती है और वातावरण में हवा बहती रहती है। यानी प्रदूषण का स्रोत कभी कम नहीं होता, बस वह नजर नहीं आता। ठंड के दिनों में यह माहौल बदल जाता है क्योंकि हवा का बहना धीमा हो जाता है। यही कारण है कि दिल्ली में ठंड में प्रदूषण की कई घटनाएं नजर आती हैं। दिसंबर और जनवरी में स्मॉग की समस्या ज्यादा आती है जबकि उस वक्त फसल नहीं जलाई जाती। इसकी वजह स्थानीय प्रदूषण और खराब मौसम हैं। यह अहम है कि हम इसे पहचानें क्योंकि इसके बिना पूरा ध्यान बाहरी कारकों पर ही केंद्रित रहेगा। दूसरे राज्यों को दोष देना राजनीतिक दृष्टिï से बेहतर हो सकता है लेकिन प्रदूषण प्रबंधन के लिहाज से यह अच्छा नहीं है। जैसा कि मैंने अपने स्तंभ में पिछले महीने भी कहा था, प्रदूषण से लडऩे के लिए काफी कुछ किया गया है। इससे प्रदूषण में न केवल स्थिरता आई है बल्कि कमी भी आई है। परंतु अब हमें इन कदमों की तीव्रता बढ़ानी होगी। उदाहरण के लिए फसल जलाना कम करना होगा, स्थानीय स्तर पर कचरा, प्लास्टिक जलाना रोकने के लिए कड़ाई करनी होगी और विनिर्माण तथा सड़क निर्माण आदि में धूल कम उत्पन्न हो तथा फैक्टरियों से प्रदूषण कम हो, ऐसे कदम उठाने होंगे।
 
परंतु इसका वास्तविक और दीर्घकालिक उत्तर तो यही होगा कि हम कोयले तथा अन्य खराब ईंधनों से अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन की दिशा में बढ़ें। कारों की जगह बेहतर सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल करना होगा। यह व्यवस्था सस्ती और सुलभ होने के साथ-साथ आधुनिक और सुरक्षित भी होनी चाहिए। परंतु इस दिशा में हम कुछ खास प्रगति नहीं कर रहे हैं। हमारी हर सांस विषाक्त है। हमारे बच्चों के अभी विकसित हो रहे फेफड़ों को देखते हुए हालात ऐसे ही नहीं रहने दिए जा सकते। जाहिर है हमें अब व्यापक पैमाने पर पेशकदमी करनी होगी। मैं पूरी दृढ़ता के साथ कहती हूं कि जुनून के साथ जरूरी कदम उठाने से बदलाव अवश्य आएगा। 
 
(लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं)
Keyword: delhi, pollution, parali,,
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