बिजनेस स्टैंडर्ड - बीएसएनएल, एमटीएनएल सुधार की संभावना कम
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बीएसएनएल, एमटीएनएल सुधार की संभावना कम

राहुल खुल्लर /  November 04, 2019

सरकारी दूरसंचार कंपनियों में सुधार के लिए जो चार बिंदु वाली योजना बनाई गई है वह आवश्यक तो है लेकिन उतने भर से काम नहीं चलेगा। इस संबंध में विस्तार से जानकारी दे रहे हैं राहुल खुल्लर 

 
सरकार ने संकट के दौर से गुजर रही सरकारी दूरसंचार कंपनियों बीएसएनएल और एमटीएनएल के लिए पुन: प्रवर्तन योजना की घोषणा की है। चार बिंदुओं वाली इस योजना में सॉवरिन बॉन्ड की मदद से 15,000 करोड़ रुपये की राशि जुटाना, सरकारी लागत पर 4जी स्पेक्ट्रम आवंटित कर राजस्व का नया जरिया तैयार करना, जमीन जैसे संसाधनों की बिक्री करके तकरीबन 38,000 करोड़ रुपये की नकदी जुटाना और आकर्षक स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना के माध्यम से कर्मचारियों की तादाद कम करना आदि शामिल हैं। इस घोषणा का स्वागत किया जाना चाहिए, आखिरकार सरकार ने कदम उठाने का निर्णय लिया है।
 
पहले इतिहास की चंद बातें करते हैं। एमटीएनएल बीते एक दशक से अधिक वक्त तक गंभीर संकट से जूझ रही है। कंपनी में जरूरत से ज्यादा कर्मचारी हैं, उसके ग्राहक और राजस्व दोनों डांवाडोल हैं और निवेश के आंतरिक संसाधन नहीं बचे हैं। इसके उलट बीएसएनएल एक दशक पहले तक मुनाफे वाली और वित्तीय रूप से मजबूत कंपनी थी। दो घटनाओं ने इन कंपनियों की आर्थिक तकदीर बदल दी। सन 2010 में हुई 3जी स्पेक्ट्रम नीलामी ने उनकी वित्तीय स्थिति को चोट पहुंचाई। बीएसएनएल और एमटीएनएल को 3जी और बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम खरीदना पड़ा। एमटीएनएल पहले ही संकट से जूझ रही थी और उसे 3जी कारोबार में प्रवेश नहीं करना चाहिए था। बीएसएनएल के पास तो फिर भी 3जी के साथ जूझने की संभावना थी क्योंकि उसने अधिशेष जमा कर रखा था। परंतु बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम तो दोनों पर थोपा गया। दोनों ही इसे लेना नहीं चाहती थीं। 
 
वित्त मंत्रालय ने बीएसएनएल और एमटीएनएल को बाकायदा इसका आदेश दिया। संक्षेप में कहें तो वित्त मंत्रालय ने बजट की कमी पूरी करने के लिए कंपनियों के मुद्रा भंडार पर डाका डाला। इससे भी बुरी बात यह कि बीडब्ल्यूए स्पेक्ट्रम के रूप में एक अनुपयोगी परिसंपत्ति के रूप में उसने एक स्थायी बोझ उन पर डाल दिया। बीएसएनएल का वह पैसा इसमें लग गया जिसे वह निवेश कर सकती थी। कंपनी को उधारी लेने पर मजबूर होना पड़ा। एमटीएनएल को वह 3जी स्पेक्ट्रम लेना पड़ा जिसे वह पूरी तरह इस्तेमाल नहीं कर सकी।
 
दूसरी अहम घटना थी दूरसंचार क्षेत्र में निजी कंपनियों का प्रवेश। कुछ ही वर्ष में दूरसंचार विभाग का भारी-भरकम तकनीक स्टाफ अनावश्यक हो गया। अब तक जो सेवाएं विभाग द्वारा मुहैया कराई जाती थीं, वे अब निजी सेवा प्रदाता प्रदान करने लगे। अचानक तमाम काबिल दूरसंचार इंजीनियरों के पास काम ही नहीं रहा। लाइनमैनों और अन्य कर्मचारियों के साथ भी यही हुआ। दूरसंचार विभाग ने जरूरत से अधिक कर्मचारियों को बीएसएनएल और एमटीएनएल में स्थानांतरित कर दिया। इससे इन दोनों कंपनियों का वेतन बिल बढ़ा। यही कारण है कि बीएसएनएल का वेतन लागत और राजस्व अनुपात 77 और एमटीएनएल का 87 है।
 
प्रथम दृष्टया यह योजना काफी समझदारी भरी लगती है: बेहतर राजस्व, लागत में कटौती और परिसंपत्तियों की बिक्री से संसाधन जुटाना। परंतु मामला इतना सीधा नहीं है। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का तरीका पहले भी अपनाया गया था और यह नाकाम रहा था। एमटीएनएल के 16,000 कर्मचारियों में से ज्यादातर उम्रदराज और आधुनिक जरूरतों के हिसाब से अकुशल हैं। इसके बावजूद उन्होंने इसे नकार दिया। बेहतर आयु संतुलन वाले बीएसएनएल के 1,70,000 कर्मचारियों में से भी ज्यादातर कंपनी छोडऩे के इच्छुक नहीं रहे। इन दिनों रोजगार बाजार की जो हालत है उसमें दूरसंचार इंजीनियरों तथा अन्य तकनीकी कर्मचारियों के लिए संभावनाएं सीमित हैं। इसके अलावा बेरोजगारों की तुलना में रोजगारशुदा कर्मचारियों की सामाजिक स्थिति बेहतर रहती है जिससे इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति में क्या पेशकश करती है। अंतिम बात, जरूरत से ज्यादा कर्मचारी तमाम आयु वर्ग में हैं। क्या यह योजना समस्या हल कर पाएगी?
 
वर्ष 2018-19 में दोनों कंपनियों की साझा कर, कराधान, अवमूल्यन और ऋण शोधन पूर्व आय (ईबीआईटीडीए) 15 फीसदी थी। गणित एकदम सीधी सादा है। कर्मचारियों की तादाद में 40 फीसदी की कमी (यदि 74,000 कर्मचारी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लें) से वेतन और राजस्व अनुपात में 31 फीसदी की कमी आएगी। अगर यह सारी कमी जोड़ी जाए तो ईबीआईटीडीए बढ़कर 16 फीसदी होगी जो अपर्याप्त है। 45,000 करोड़ रुपये के कर्ज के साथ भी न्यूनतम ईबीआईटीडीए को कम से कम 35 फीसदी लाभ दर्ज करना था। ऐसे में बदलाव मोटे तौर पर लागत में बचत और राजस्व में इजाफे से ही आ सकता है। 
 
परिसंपत्तियों की बिक्री में समय लगता है और सार्वजनिक क्षेत्र के संदर्भ में यह आसान भी नहीं है। परिसंपत्तियों खासकर जमीन की बिक्री को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चलता है। सार्वजनिक उपक्रमों की निर्णय प्रक्रिया थकाऊ हो सकती है। प्रवर्तन निदेशालय, केंद्रीय जांच ब्यूरो और अन्य जांच एजेंसियों की भारी सक्रियता वाले इस दौर में यह और बुरा हो सकता है। बीते पांच साल में विनिवेश के साथ अनुभव भी बहुत सकारात्मक नहीं रहा है। यह मानना आशावादी हो सकता है कि परिसंपत्तियों से आने वाले संसाधन आसानी से उपलब्ध होंगे। 
 
सॉवरिन बॉन्ड के माध्यम से पूंजी डालना तात्कालिक रूप से सफल होगा लेकिन बैंकों के पुनर्पूंजीकरण की तरह यह भी अपर्याप्त है। बीएसएनएल का पिछला प्रदर्शन भी कोई उत्साहित करने वाला नहीं रहा है। कंपनी के प्रबंधन को वाणिज्यिक कुशलता के लिए नहीं जाना जाता। यदि प्रबंधन व्यवहार और संगठनात्मक संस्कृति में बदलाव नहीं आता है तो हालात नहीं बदलेंगे। मीडिया में आई खबरें बताती हैं कि 4जी सेवाएं संचालित करने के लिए 10,000 करोड़ रुपये के निवेश की आवश्यकता होगी। यह अनुमान बहुत कम है। जियो को गुणवत्तापूर्ण 4जी सेवाएं देने में पांच वर्ष से ज्यादा समय और ढेर सारा पैसा लगा। यह सही है कि बीएसएनएल के पास बुनियादी सुविधाएं और व्यापक नेटवर्क है। यह सही है कि बीएसएनएल के पास बुनियादी ढांचा और व्यापक नेटवर्क है लेकिन यह उम्मीद करना सही नहीं है कि राजस्व की एक नई धारा इतनी जल्दी तैयार हो जाएगी, वह भी इतने कम निवेश से। भारी निवेश के लिए संसाधन इतनी जल्दी नहीं मिलेंगे। अंत में दूरसंचार की गलाकाट प्रतिस्पर्धा वाली दुनिया में क्या बीएसएनएल अपने मौजूदा प्रबंधन के साथ प्रतिस्पर्धा में टिका रह पाएगा?
 
इस योजना में कुछ जरूरी कदम शामिल हैं लेकिन यह अपर्याप्त है। स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के साथ-साथ समुचित प्रोत्साहन की आवश्यकता भी होगी। उसके बिना स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति कारगर नहीं हो सकेगी। निवेश की फंडिंग के लिए यदि तेजी से संसाधन आएंगे तभी बात बनेगी वरना जब तक बीएसएनएल 4जी तक पहुंचेगा तब तक दूरसंचार क्षेत्र के अन्य कारोबारी 5जी तक पहुंच जाएंगे। बिना प्रबंधन में सुधार के इन बातों का कोई अर्थ नहीं है। 
 
(लेखक भारतीय दूरसंचार विनियामक प्राधिकरण के पूर्व चेयरमैन हैं)
Keyword: BSNL, MTNL, PSU, telecom, package,,
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