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निजता की रक्षा

संपादकीय /  November 04, 2019

इजरायल की कंपनी द्वारा कम से कम 121 भारतीयों के मोबाइल फोन पर अवैध तरीके से निगरानी सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करने की घटना ने देश के डेटा संरक्षण और निजता संबंधी कानूनों को लेकर लंबे समय से चली आ रही दिक्कतों को नए सिरे से सामने रख दिया है। फेसबुक के अनुषंगी इंस्टैंट मेसेंजर व्हाट्सऐप ने इजरायली कंपनी एनएसओ पर अमेरिका की एक अदालत में मुकदमा किया है। उसका कहना है कि कंपनी ने गुप्त रूप से पेगासस नामक निगरानी सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करके संक्रमित मोबाइल फोनों में से लगभग हर प्रकार की जानकारी को दूसरी जगहों पर भेजा। इस सॉफ्टवेयर को व्हाट्सऐप के माध्यम से केवल एक मिस्ड कॉल देकर किसी फोन पर इंस्टॉल किया जा सकता है। माना जा रहा है कि दुनिया भर में करीब 1,500 लोग पेगासस से संक्रमित हुए हैं। व्हाट्सऐप का दावा है कि यह संक्रमण अप्रैल-मई 2019 में हुआ और तब से अब तक उसने इस जोखिम को समाप्त कर दिया है। 

 
उधर एनएसओ का दावा है कि वह इस सॉफ्टवेयर को केवल सरकारी एजेंसियों को बेचती है। इसके बाद मामला और अधिक जटिल हो गया है। एनएसओ के उपभोक्ताओं की सूची देखकर भी यही लगता है कि उनमें से अधिकांश सरकारें हैं। पेगासस सॉफ्टवेयर और उससे जुड़ी निगरानी सेवाएं बहुत महंगी हैं और उन्हें अन्य देशों के साथ मैक्सिको और मिस्र की सरकार को बेचा गया है। जिन भारतीयों को इसका निशाना बनाया गया है उनमें से कई जाने माने मानवाधिकार कार्यकर्ता, अधिवक्ता, पत्रकार और राजनेता हैं। चूंकि यही वह अवधि थी जब भारत में आम चुनाव हो रहे थे और जिनको निशाना बनाया गया उनमें से कई विपक्षी विचारों के या सरकार के खिलाफ खड़े होने वाले लोग हैं इसलिए इस विषय में अटकलों का दौर शुरू हो गया है।
 
भारत सरकार का दावा है कि व्हाट्सऐप ने इस संवेदनशीलता को लेकर खुलकर बात नहीं की और गत मई में देश की कंप्यूटर आपात प्रतिक्रिया टीम तथा अन्य सरकारी एजेंसियों को इस सुरक्षा मसले की जानकारी देते हुए उसने तकनीकी शब्दावली इस्तेमाल की। अब सरकार ने इसकी जांच के लिए दो संसदीय समितियां गठित की हैं। अमेरिका में सुनवाई के दौरान इस विषय में और मालूमात सामने आएंगी। इन भारतीय नागरिकों को निशाना बनाने और चोरी छिपे पेगासस सॉफ्टवेयर इंस्टॉल करने वाले ने यकीनन भारतीय कानून तोड़ा है। अब तक ऐसी किसी सरकारी एजेंसी का पता नहीं लगा है जिसके बारे में कहा जा सके कि यह उसने किया। यदि यह काम सरकारी एजेंसी ने नहीं किया तो कानून टूटा है। बल्कि सरकारी एजेंसियों के बारे में भी अपेक्षा तो यही रहती है कि वे उच्चस्तर पर ऐसी निगरानी के लिए समुचित इजाजत लेंगी। उन्हें निजता के ऐसे उल्लंघन के पहले पूरी जानकारी देनी होती।
 
यह भी सही है कि सरकार ने निजता संरक्षण कानून बनाने में देरी की। अगर वह होता तो  इस अपराध को बेहतर परिभाषित किया जा सकता और उचित दंड की घोषणा की जा सकती। सर्वोच्च न्यायालय ने अगस्त 2017 में कहा था कि निजता मूल अधिकार है। इसके बाद सेवानिवृत्त न्यायाधीश बीएन श्रीकृष्णा की अध्यक्षता वाले आयोग ने निजी डेटा संरक्षण निजता कानून का मसौदा बनाया जिसे जुलाई 2018 में जारी किया गया। इस पर अक्टूबर 2018 तक जनता की राय आमंत्रित की गई। तब से अब तक संसद ने अनेक कानून पारित किए लेकिन यह मसौदा पड़ा रहा। ऐसे कानून के अभाव में यह परिभाषित कर पाना मुश्किल है कि नागरिकों की ऐसी निगरानी कौन सी एजेंसी कब कर सकती है। यह घटना निजता को मूल अधिकार मानने वाले संविधान और संबंधित कानून को पास करने में देरी करने वाली विधायिका का विभाजन साफ नजर आता है। 
Keyword: whatsapp, IT, spyware, mobile, hack,,
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