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सुस्ती के बीच विदेशी निवेश पर फर्मों का दांव

कृष्ण कांत / मुंबई November 04, 2019

देश में वस्तुओं व सेवाओं की मांग में नरम हो गई है, लिहाजा भारतीय कंपनी जगत ने विदेशी बाजारों में बढ़त के मौकों पर ध्यान केंद्रित कर लिया है। पिछले दो साल में भारतीय कंपनियों की तरफ से विदेश में निवेश में तेजी आई है जबकि कंपनी जगत मेंं कुल पूंजीगत खर्च में गिरावट दर्ज हुई है। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय कंपनी जगत की तरफ से विदेश में किया गया निवेश 2018-19 में 38 फीसदी बढ़कर 12.6 अरब डॉलर पर पहुंच गया। भारतीय कंपनियों की तरफ से यह लगातार दूसरा साल है जब उनकी तरफ से विदेश में निवेश में मजबूती देखने को मिली है। पिछले दो साल में यह आंकड़ा वित्त वर्ष 2017 के 6.6 अरब डॉलर के मुकाबले करीब दोगुना हो गया है। 
 
इसकी तुलना में भारतीय कंपनियों की तरफ से कुल पूंजीगत खर्च में इस दौरान कमी दर्ज हुई है। वित्त वर्ष 2019 में एकीकृत स्तर पर कंपनियों का नया पूंजीगत खर्च सालाना आधार पर 18.3 फीसदी घटकर 3.81 लाख करोड़ रुपये रह गया, जो एक साल पहले 4.7 लाख करोड़ रुपये रहा था। यह 1,000 अग्रणी कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर आधारित है, जिनमें बैंक व तेल और गैस क्षेत्र की कंपनियां शामिल नहीं हैं। पहली तिमाही के भुगतान संतुलन के आंकड़ों से पता चलता है कि देसी कंपनियों की तरफ से विदेश मेंं निवेश वित्त वर्ष 2020 में और बढऩे वाला है। भारतीय कंपनी की तरफ से प्रत्यक्ष निवेश वित्त वर्ष 2020 के पहले तीन महीने में 19.2 फीसदी बढ़ा। अप्रैल-जून 2019 में विदेश में होने वाला निवेश बढ़कर 4.6 अरब डॉलर पर पहुंच गया, जो इससे पिछले वर्ष की समान अवधि में 3.8 अरब डॉलर रहा था।
 
कंपनी स्तर के आंकड़े बताते हैं कि कई कंपनियां विदेश में देसी बाजार के मुकाबले ज्यादा निवेश कर रही हैं। उदाहरण के लिए बड़ी विदेशी सहायक वाली 51 अग्रणी सूचीबद्ध कंपनियों ने पिछले वित्त वर्ष में 1.26 लाख करोड़ रुपये पूंजीगत खर्च किया, जिसमें से करीब 60 फीसदी उनकी विदेशी सहायकों के लिए हुआ। वित्त वर्ष 2018 में भी ऐसी ही प्रवृत्ति थी। कुल मिलाकर इन 51 कंपनियों की विदेशी सहायकों ने वित्त वर्ष 2019 में 73,600 करोड़ रुपये पूंजीगत खर्च किया जबकि उनकी मूल कंपनियों ने भारत में नए प्लांट व उपकरणों के अलावा उत्पादों के विकास पर भारत में 48,000 करोड़ रुपये खर्च किए।
 
इस नमूने में शामिल कुछ बड़ी कंपनियां हैं टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, हिंडाल्को, मदरसन सूमी, यूपीएल, टाटा केमिकल्स, टाटा ग्लोबल बेवरिजेज, भारती एयरटेल, सिप्ला, टाटा कम्युनिकेशंस, इन्फोसिस, विप्रो, गोदरेज कंज्यूमर और टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज। उदाहरण के लिए टाटा मोटर्स की विदेशी सहायकों ने पूंजीगत खर्च पर वित्त वर्ष 2019 में करीब 17,000 करोड़ रुपये लगाए जबकि उनकी मूल कंपनी टाटा मोटर्स ने एकल आधार पर 2,200 करोड़ रुपये का पूंजीगत खर्च किया। देश की सबसे बड़ी उपकरण निर्माता मदरसन सूमी ने पिछले साल अपनी विदेशी सहायकों में 5,000 करोड़ रुपये निवेश किया जबकि भारत में पूंजीगत खर्च करीब 500 करोड़ रुपये रहा।
 
विशेषज्ञ इसकी वजह देसी बाजार में मांग में नरमी और दवा, एग्रो केमिकल्स व आईटी सेवाओं जैसे क्षेत्र में भारतीय कंपनियों की तरफ से बड़े अधिग्रहण को बताया। इक्विनॉमिक्स रिसर्च ऐंड एडवाइजरी सर्विसेज के संस्थापक और प्रबंध निदेशक जी चोकालिंगम ने कहा, यह कहना जल्दबाजी होगा कि भारतीय कंपनियों के लिए सामान्य तौर पर देसी निवेश के मुकाबले विदेशी निवेश ज्यादा रहा। ये चीजें कुछ विशिष्ट कंपनियों मसलन टाटा मोटर्स, मदरसन सूमी या यूपीएल के लिए सही हो सकती हैं, जहां देसी कारोबार उनके वैश्विक परिचालन के मुकाबले काफी छोटा है।
Keyword: company, invest,,
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