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त्योहारों पर जमकर किया खर्च, अब कैसे उतारें सिर पर चढ़ा कर्ज

विदिशा सारंग /  November 03, 2019

सुबह उठने पर सिर चकराए तो समझ जाइए कि कल रात आपकी पार्टी शानदार रही थी। इसी तरह खरीदारों का भी सिर चकराता है, जो असल में एकाएक खुले हाथों से खर्च करने के बाद पैदा हुआ अपराध बोध होता है। आम तौर पर ऐसा अपराध बोध त्योहारों के दौरान महंगी खरीदारी करने के बाद ही होता है। कई लोग इस दीवाली पर क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल कर और उपभोक्ता ऋण लेकर कर्ज में डूब गए होंगे। अब माली हालत कैसे दुरुस्त की जाए, इसका नुस्खा हम आपको बताते हैं। 

कर्ज का बोझ कम करें

चेन्नई में रहने वाले प्रमाणित वित्तीय योजनाकार डी मुत्तुकृष्णन कहते हैं, 'यह और कुछ नहीं दीवाली के बाद कर्ज देखकर होने वाली बीमारी है। इस कर्ज को सबसे पहले चुकाइए।' आपने त्योहारों के दिनों में जो कर्ज अपने सिर ले लिया है, उसे घटाने और चुकाने पर आपका पूरा ध्यान होना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले देखें कि आपको कितना नुकसान हुआ है। खरीदारी आपने की है तो आपको ही पता होगा कि खर्च कितना हुआ है। इसमें 20 फीसदी रकम और जोड़ लीजिए, जो आपने दीवाली पर बाहर खाने में, मिठाई खरीदने में और दूसरा सामान खरीदने में खर्च की होगी। याद रखिए, जो भी सामान इस्तेमाल नहीं होता है, उसकी कीमत घटती ही है और आखिर में कीमत शून्य रह जाती है। इसीलिए अगर आपने नया फोन लिया है या आपको तोहफे में मिला है तो अपना पुराना फोन फौरन बेच दीजिए। हो सकता है कि तकनीक के मामले में वह फोन पिछड़ा है, लेकिन किसी न किसी को तो उसकी जरूरत होगी ही। इसके बाद अपने पुराने गैजेट बेच दीजिए। ऐसा इसलिए करना चाहिए क्योंकि दीवाली का कर्ज जल्द से जल्द उतारना है।

मुत्तुकृष्णन की सलाह है, 'सबसे पहले क्रेडिट कार्ड का बिल निपटा दीजिए क्योंकि यह सबसे महंगा कर्ज होता है। अगर आप पर उपभोक्ता ऋण भी है तो क्रेडिट कार्ड के बाद उसे चुकाइए।' 

खर्च पर अंकुश रखिए

कर्ज चढ़ा हो तो मुट्ठी बांधकर बैठने में ही समझदारी है। सृजन फाइनैंशियल एडवाइजर्स की संस्थापक दीपाली सेन समझाती हैं, 'अगला कदम अपने खर्च पर अंकुश लगाना है ताकि आपके पास अतिरिक्त नकदी रहे और आप कर्ज चुकाने में उसका इस्तेमाल कर सकें।' इसके लिए अपने व्यवहार में वित्तीय मसले शामिल करना सबसे आसान तरीका है। सेन की सलाह है, 'पहला तरीका तो यही है कि आप खुद को बार-बार याद दिलाते रहें कि आपके ऊपर कितना कर्ज चढ़ा हुआ है। एक पर्ची पर लिखिए कि आपके ऊपर कितना कर्ज है और उस पर्ची को अपने बटुए में रख लीजिए। अगली बार जब आप खरीदारी करने जाएंगे तो वह पर्ची देखकर आपके हाथ खुद-ब-खुद रुक जाएंगे।'

लोगों को अक्सर अहसास ही नहीं हो पाता कि वे कितनी ज्यादा रकम खर्च कर रहे हैं। खर्च की जा रही रकम अक्सर कम ही लगती है। अगर आपका कोई भाई-बहन या दोस्त है, जो खरीदारी करते समय आपका हाथ पकड़ सके और अधिकार के साथ आपसे कह सके कि खर्च करने की कोई जरूरत नहीं है तो उससे अच्छा साथी कोई और नहीं हो सकता। खरीदारी करते समय उसे अपने साथ ले लीजिए। याद रखिए कि आपसे सवाल करने वाला साथी हमेशा ही अच्छा होता है।

खर्च पर अंकुश रखने और दीवाली पर चढ़ा कर्ज उतारने का एक अच्छा तरीका क्रेडिट कार्ड से जुड़ा हुआ है। आप अपने क्रेडिट कार्ड में न्यूनतम बकाया राशि के अलावा एक निश्चित रकम के भुगतान की ऑटोमैटिक व्यवस्था कर दें। जिस दिन आपकी तनख्वाह आपके खाते में आती है, उसी दिन भुगतान करने के लिए ऑटो-डेबिट की व्यवस्था कर दें। 

त्योहारी छूट का करें इस्तेमाल

सेल का सीजन आम तौर पर अगस्त में स्वतंत्रता दिवस पर शुरू हो जाता है। उसके बाद गणेश चतुर्थी, नवरात्रि-दुर्गा पूजा, दशहरा, दीवाली, क्रिसमस, नए साल, पोंगल और गुडी पड़वा तक सेल आती-जाती रहती हैं। इस सीजन का इस्तेमाल समझदारी के साथ करना बहुत जरूरी है। मुत्तुकृष्णन कहते हैं, 'सामान खरीदने में कोई बुराई नहीं है। जिन उपकरणों को बदलने की जरूरत है, उन्हें खरीदने या कुछ नया सामान खरीदने में कोई भी हर्ज नहीं होता। लेकिन ऐसी खरीदारी किसी योजना या बजट के बगैर नहीं करें। अगर आप पहले से योजना बनाकर या एक बजट तैयार कर त्योहारों पर खरीदारी करते हैं तो आपको कर्ज की चिंता में दुबला होना ही नहीं पड़ेगा। सबसे पहले तय कीजिए कि आगे चलकर आपको क्या खरीदना है। फिर उसके लिए आवर्जी जमा (आरडी) शुरू कर दीजिए। जब त्योहार आएं और सेल शुरू हो तो झट से सामान खरीद डालिए।'

उनकी सलाह यह भी है कि क्रेडिट कार्ड पर ब्याज देने या उपभोक्ता ऋण पर प्रोसेसिंग शुल्क चुकाने के बजाय किसी स्टोर में जाकर नकद खरीदारी करना हमेशा बेहतर रहता है। कोई भी सामान नकद खरीदने पर आपको बेहतर सौदा मिल सकता है और ज्यादा छूट भी हासिल हो सकती है।

यदि आपको बचत के लिए आरडी ज्यादा पसंद नहीं आती तो कोई दिक्कत नहीं है क्योंकि आपके पास दूसरे विकल्प भी हैं। आप डेट म्युचुअल फंड या लिक्विड फंड में व्यवस्थित निवेश योजना (एसआईपी) भी शुरू कर सकते हैं। मुत्तुकृष्णन मार्के की बात कहते हैं। उनका कहना है, 'हमारी संस्कृति उत्सवधर्मी स्वभाव की है। लेकिन अब इसमें बदलाव आ रहा है और हम त्योहारों के दौरान खरीदारी करने की संस्कृति अपनाते जा रहे हैं। कुछ खरीदने में बुराई बिल्कुल भी नहीं है। लेकिन एक बात गांठ बांध लीजिए। विक्रेता तो सामान बेचने के लिए ही बैठा है। वह तो बेचने का मौका तलाशता रहता है। अब फैसला हमें करना है। जिम्मा खरीदार का है। उसे ही हमेशा चौकन्ना रहना पड़ता है।'
Keyword: Shopping, Debt, Fund, Festive Season,
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