बिजनेस स्टैंडर्ड - राजकोषीय घाटे में कैसे आ सकता है सुधार? 
 Search  BS Hindi  Web   BS E-Paper|      Follow us on 
Business Standard
Friday, November 22, 2019 05:08 AM     English | हिंदी

होम

|

बाजार

|

कंपनियां

|

अर्थव्यवस्था

|

मुद्रा

|

विश्लेषण

|

निवेश

|

जिंस

|

क्षेत्रीय

|

विशेष

|

विविध

|

अर्थनामा

 
होम विशेष खबर

राजकोषीय घाटे में कैसे आ सकता है सुधार? 

टीसीए श्रीनिवास-राघवन /  November 03, 2019

भारतीय अर्थव्यवस्था गहरी आर्थिक मंदी के चक्र में है। हालात में बदलाव लाने के लिए कुछ अहम सुधारों की आवश्यकता है और उनकी रूपरेखा भी पूरी तरह स्पष्ट है। इनमें से कुछ सुधार पूरे होंगे, और कुछ नहीं। परंतु मैं यहां एक ऐसी बात दोहराना चाहता हूं जो मैं पिछले कई वर्षों से कहता आ रहा हूं: क्या वृहद आर्थिक नीति का सबसे अहम हिस्सा, राजकोषीय घाटे को देखने के हमारे नजरिये में बदलाव में नहीं निहित होना चाहिए? कहने का तात्पर्य यह है कि यदि बढ़ा हुआ या घटा हुआ सरकारी व्यय श्रम और उत्पाद बाजार को संतुलित रखने का काम करता है तो क्या ऐसे व्यय को दो हिस्सों में नहीं बांट दिया जाना चाहिए? क्या एक हिस्सा ऐसा नहीं होना चाहिए जिसके घटने पर सरकार का राजनीतिक जोखिम बढ़े और आर्थिक लाभों में इजाफा हो? आखिर हम सब जानते हैं कि राजस्व घाटे और राजनीतिक जोखिम दोनों आपस में बहुत गहरे तक जुड़े हुए हैं। हालांकि आर्थिक लाभ निवेश व्यय से आते हैं। 

मेरा मानना है कि इन दोनों को वित्तीय उद्देश्य से अलग-अलग किया जाना चाहिए। पुराने दिनों में जब तक भेद समाप्त नहीं हुआ था, इन्हें योजनागत और गैर योजनागत व्यय कहा जाता था। हमें थोड़े सुधार के साथ उस दिशा में वापसी करनी होगी। बल्कि गैर योजनागत व्यय को भी दो हिस्सों में बांटा जाना चाहिए। पहला, जिसमें कमी के राजनीतिक जोखिम हों, मसलन: सब्सिडी और वेतन तथा पेंशन। दूसरा है रखरखाव का उच्च व्यय जिसमें इजाफा समग्र उत्पादकता में सुधार करता है। फिलहाल तो इनमें से पहले में किसी भी तरह का इजाफा बाद वाले में कटौती करता है। ऐसा हर वर्ष होता है क्योंकि हर साल एक या दो स्थानों पर चुनाव भी होते हैं। देश में बुनियादी ढांचे की दयनीय दशा की यही वजह है। अरविंद केजरीवाल के अधीन दिल्ली शहर इसका उदाहरण है। मैं इकलौती नई बात यह कह रहा हूं कि राजनीतिक जोखिम कम करने पर होने वाले व्यय को आर्थिक जोखिम वाले व्यय से अलग किया जाना चाहिए। ऐसा करके ही हम उस पाखंड को दूर कर पाएंगे जो प्रतिस्पर्धी राजनीतिक व्यवस्था में घर कर गया है और जिसके चलते राजनीतिक जोखिम को जानबूझकर सत्ताधारी दल से और गरीब कल्याण को लेकर उसकी चिंताओं से जोड़ा जाता है।

पारदर्शिता की ओर 

ऐसा करने के पश्चात ही राजकोषीय घाटे को लेकर कोई लक्ष्य तय किया जा सकेगा। तब निश्चित रूप से इसे 3 फीसदी के स्तर पर रखा जा सकता है। ऐसी पारदर्शिता के अभाव में बजट को आकर्षक बनाकर पेश करने की घटनाएं बढ़ती हैं। ऐसा हमेशा से होता रहा है लेकिन सन 2005 के बजट में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने मनरेगा के साथ इसे नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया। तब से यह सिलसिला अबाध ढंग से चला आ रहा है। अब निर्मला सीतारमण के सामने अवसर है कि वह इसे बंद करें। उन्हें प्रधानमंत्री को यह यकीन दिलाना चाहिए कि वे इस समस्या से सीधा टकराव मोल लें।

अगर ऐसा नहीं होता है तो सरकार हमेशा अनावश्यक दबाव में रहेगी। सन 2014 से ऐसा ही देखने को मिल रहा है और इसने अर्थव्यवस्था को हद से ज्यादा नुकसान पहुंचाया है। अनावश्यक रूप से कम राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तथा कम मुद्रास्फीति संबंधी लक्ष्य ने भी इसमें इजाफा किया है। इतना ही नहीं कुल व्यय के राजनीतिक हिस्से की फाइनैंसिंग कर राजस्व तथा घाटे की फाइनैंसिंग के आर्थिक हिस्से से की जानी चाहिए। अगली बात, राजनीति हिस्से को भी ब्रिटिश पीएसबीआर (सार्वजनिक क्षेत्र की ऋण आवश्यकता) सीमा के समकक्ष होना चाहिए जिसे लेकर पांच वर्ष तक कोई मोलभाव नहीं हो सकता।

केंद्र सरकार को सब्सिडी, वेतन और पेंशन पर और अधिक व्यय नहीं करना चाहिए जबकि अभी सरकार ऐसा ही कर रही है। नई चीजों के लिए उधारी लेने पर भी उसे केवल उच्च ब्याज भुगतान ही करना चाहिए। किसी अन्य चीज के लिए उसे उधार भी नहीं लेना चाहिए। अगले वर्ष से राजनीतिक वजहों से जुड़े तमाम वृद्घिकारक व्यय राज्यों से आने चाहिए। इसके लिए उन्हें यह इजाजत दी जानी चाहिए कि वे व्यक्तिगत आय पर कर लगा सकें। आयकर पर केंद्र के एकाधिकार की कोई वजह नहीं है। 

वृहद अर्थशास्त्र के मौलाना

एक अच्छे पुजारी की एक विशिष्टता यह होती है कि वह तमाम संदर्भों के परे धर्मग्रंथों में लिखी बातों पर टिका रहता है। उसके लिए ये ग्रंथ अप्रश्नेय होते हैं। आज ऐसा ही वृहद अर्थशास्त्रियों के साथ है। यही कारण है कि आज हर चीज से निपटने के लिए एक जैसा रुख अपनाया जा रहा है जो वास्तव में मूर्खतापूर्ण है। अगर आप वृहद आर्थिक विचार प्रक्रिया के इतिहास पर नजर डालेंगे तो आप पाएंगे कि तमाम सफल सरकारों ने पुरानी समझ को नकारा यानी औसत अर्थशास्त्रियों की सहज समझ को। फ्रैंकलिन रूजवेल्ट इसके सबसे अच्छे उदाहरण हैं। मार्गे्रट थैचर और रोनाल्ड रीगन को भी इस श्रेणी में रखा जा सकता है। 

सरकार जो करती है उसकी वैधता के लिए उसे बौद्घिक जमात की प्रतिपुष्टि चाहिए। कींस के सिद्घांत सन 1950 के दशक से ऐसा कर रहे हैं। लेकिन अब इसमें बदलाव की आवश्यकता है क्योंकि जहां तक मैं जानता हूं कींस ने सरकारी घाटे को लेकर कोई सीमा निर्धारित नहीं की। उन्होंने केवल इतना कहा था कि उतना ही व्यय करें जितना अर्थव्यवस्था को गिरावट से उबारने के लिए आवश्यक हो। उनका जोर व्यय पर था, किसी सीमा पर नहीं। तमाम शक्तिशाली बॉन्ड बाजार उनके दिमाग तक में नहीं थे। अब हमें एक बार फिर कींस की शरण में जाना होगा न कि उनके व्याख्याकारों की शरण में। कम से कम अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में बैठे लोगों के पास तो कतई नहीं जो सबके लिए एक समान सिद्घांत के सबसे बड़े हिमायती हैं। किसी सरकार को ऐसी बिना दिमाग का इस्तेमाल किए सुझाए जा रहे उपायों पर विचार नहीं करना चाहिए। 

Keyword: Fiscal Deficit, Finiance Minister, Narmala Sitharaman, PSBR, Debt,
Advertisements
  Cover from Earthquake & Floods. Buy Home Insurance
   Get seamless access to Business Standard & WSJ.com starting at just Rs. 49/- per month*
Display Name  Email-Id  
Post your comment

CAPTCHA Image Reload Image Enter Code*:
  आपका मत
 क्या व्यावसायिक खनन के लिए खदान आवंटन करना उचित कदम है?
हां नहीं  
पढ़िये
ईमेल
About us Authors Partner with us Jobs@BS Advertise with us Terms & Conditions Contact us RSS Site Map  
Business Standard Private Ltd. Copyright & Disclaimer feedback@business-standard.com
This site is best viewed with Internet Explorer 6.0 or higher; Firefox 2.0 or higher at a minimum screen resolution of 1024x768
* Stock quotes delayed by 10 minutes or more. All information provided is on "as is" basis and for information purposes only. Kindly consult your financial advisor or stock broker to verify the accuracy and recency of all the information prior to taking any investment decision. While due diligence is done and care taken prior to uploading the stock price data, neither Business Standard Private Limited, www.business-standard.com nor any independent service provider is/are liable for any information errors, incompleteness, or delays, or for any actions taken in reliance on information contained herein.