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फसल बीमा से हाथ खींच रहीं निजी कंपनियां

नम्रता आचार्य / कोलकाता November 03, 2019

कम से कम तीन निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियां आईसीआईसीआई लोंबार्ड जनरल इंश्योरेंस, टाटा एआईजी और चोलामंडलम एमएस जनरल इंश्योरेंस प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) से बाहर हो गई हैं। कंपनियों ने इस योजना के कारोबारी मॉडल की व्यवहारिकता पर सवाल उठाए हैं। इन कंपनियों का कुल मिलाकर 3,000 करोड़ रुपये के करीब प्रीमियम रहा है। इस वित्त वर्ष में तीनों कंपनियों ने बोली नहीं लगाई है। 

इस सिलसिले में भेजे गए ई मेल का टाटा एआईजी और चोलामंडलम ने जवाब नहीं दिया है। आईसीआईसीआई लोंबार्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि कंपनी ने इस साल इस योजना में हिस्सा नहीं लिया है। एक सरकारी कृषि बीम कंपनी (एआईसी) के वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक कम से कम तीन राज्यों, महाराष्ट्र, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बहुत ज्यादा अवास्तविक दरें होने के कारण निजी कंपनियों ने इसमें हिस्सा नहीं लिया है।

पिछले साल दावे का अनुपात ज्यादा रहना इसकी एक बड़ी वजह है, जिसके कारण निजी फर्मों ने इस योजना में हिस्सा नहीं लिया है। एक उच्च पदस्त सरकारी सूत्र ने कहा कि यह 100 प्रतिशत से भी ज्यादा चला गया है। इसकी वजह से तमाम बीमाकर्ताओं ने दरें बढ़ा दी हैं। इसके पहले पुनर्बीमा कंपनियां, बीमा कंपनियोंं को 7 से 20 प्रतिशत तक कमीशन भुगतान कर देती थीं, जो बाद में भारी नुकसान में चली गईं। पिछले साल के बाद पुनर्बीमा कंपनियों ने कमीशन घटाकर 3 से 3.5 कर दिया। पीएमएफबीवाई बड़ी योजना है, जो पुनर्बीमा के समर्थन पर निर्भर है।

इसके अलावा तमाम राज्यों में बीमा कंपनियों को सरकार से मुआवजा मिलने में देरी हो रही है। पीएमएफबीवाई एक्चुरियल गणना पर आधारित है और दरें जोखिम के अनुमान के मुताबिक तय की जाती हैं। इस तरह से फसल और इलाके के आधार पर प्रीमियम अलग अलग होता है। बहरहाल किसान को सिर्फ 2 प्रतिशत बीमा कंपनी को भुगतान करना पड़ता है। शेष पैसे केंद्र व राज्य सरकारें देती हैं। औसतन प्रीमियम 12-15 प्रतिशत होता है, जिसमें केंद्र व राज्य सरकारें 5-5 प्रतिशत का भुगतान करती हैं। बीमाकर्ताओं का चयन हर राज्य में प्रतिस्पर्धी बोली के आधार पर होता है। 

दावे के समाधान में राजनीतिक हस्तक्षेप भी एक मसला है, जिससे निजी कंपनियों को दिक्कत हो रही है। इसके अलावा क्रॉप कटिंग एकक्सपेरिमेंट (सीसीई), जिससे पूरी उपज तय होती है और घाटे के आकलन में अहम है, अभी भी ज्यादातर राज्यों में मैनुअल है, जिसमें भारी मानवीय त्रुटि होती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सालाना 70 लाख से ज्यादा सीसीई होते हैं। 

पीएमएफबीवाई के पहले 2 साल में यह बीमकर्ताओ और पुनर्बीमाकर्ताओं दोने के लिए फायदेमंद थी, जिसकी वजह से आक्रामक बोली आई। 2016-17 और 2017-18 में 48,230 करोड़ रुपये प्रीमियम आया जबकि 38,121 करोड़ रुपये के दावे का भुगतान हुआ। इससे करीब 10,000 करोड़ रुपये बीमा और पुनर्बीमा कंपनियों के पास गए।

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