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अगले 3 महीने में बढ़ सकता है कामगारों का वेतन

सोमेश झा / नई दिल्ली November 03, 2019

केंद्र सरकार ने कामगारों का न्यूनतम वेतन तय करने के तरीके में बड़े बदलाव का प्रस्ताव किया है। इसमें वे नियम शामिल हैं, जिनका इस्तेमाल सातवें वेतन आयोग द्वारा सरकारी अधिकारियों का न्यूनतम वेतन तय करते समय किया गया था। श्रम एवं रोजगार मंत्रालय के एक अधिकारी ने नाम न दिए जाने की शर्त पर कहा कि इसके परिणामस्वरूप कामगारों का न्यूनतम वेतन अगले तीन महीने में बढ़ सकता है। 

पहली बार श्रम एवं रोजगार मंत्रालय नियमों का एक खाका तैयार कर रहा है, जिसमें न्यूनतम वेतन तय करने का तरीका दिया गया है। इसमें बच्चों की पढ़ाई, इलाज संबंधी जरूरतों सहित कर्मचारी के परिवार पर आने वाली लागत को शामिल किया गया है, जिससे इस मामले में मनमानी दूर की जा सके। यह वेतन (केंद्रीय) नियम 2019 के मसौदे का हिस्सा है, जिस पर श्रम मंत्रालय ने लोगों की राय मांगी है। 

ये नियम वेतन अधिनियम 2019 का हिस्सा हैं, जिसे संसद ने पारित किया है और इस साल अगस्त में अधिसूचित किया गया है। इसमें कुछ उद्योगों को छोड़कर देस के सभी मजदूरों को न्यूनतम वेतन देने का प्रस्ताव किया गया है। केंद्र सरकार का यह प्रस्ताव 1992 में एक नियम में उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई सलाह, जिसे रैप्टाकोस जजमेंट नाम से जाना जाता है, और 15वें भारतीय श्रम सम्मेलन (आईएलसी) 1957 की सिफारिशों के आधार पर है। 

उच्चतम न्यायालय की सलाह के मुताबिक, जिसे केंद्र सरकार द्वारा स्वीकार किया जाएगा, कर्मचारियों की न्यूनतम  मजदूरी इस तरह से तय की जानी चाहिए कि उसका 25 प्रतिशत हिस्सा बच्चों की शिक्षा, इलाज की जरूरतों, मनोरंजन और आकस्मिक व्यय के लिए हो। इसके साथ ही मसौदा नियम के मुताबिक न्यूनतम वेतन तय किए जाते समय सरकार कामगारों के परिवार के भोजन, कपड़े, मकान के किराये, ईंधन और बिजली पर आने वाले खर्च को ध्यान में रखेगी। 

न्यूनतम वेतन का ज्यादातर हिस्सा खाने व कपड़े पर होने वाले व्यय से जोड़े जाने का प्रस्ताव है। उदाहरण के लिए मकान और किराये पर व्यय खाने व कपड़े पर व्यय का 10 प्रतिशत होगा। कर्मचारी के परिवार के खाने पर लागत 2700 कैलोरी प्रतिदिन के हिसाब से 3 सदस्यों के आधार पर जोड़ा जाएगा। वहीं कपड़े का व्यय (पूरे परिवार के लिए 66 मीटर कपड़ा प्रति साल) के आधार पर तय होगा। यह दोनों अहम मानक हैं, जिनका पालन करना होगा। ईंधन और बिजली की लागत न्यूनतम वेतन का 20 प्रतिशत होगी। प्रस्तावित मानक सिर्फ रेलवे, खनन, तेल, उड्डयन, दूरसंचार, बैंकिंग व बीमा क्षेत्रों के साथ केंद्र सरकार के उपक्रमों, सरकारी बंदरगाहों और केंद्र सरकार द्वारा लगाए गए निजी ठेकेदारों पर लागू होंगे। उद्योगों के लिए यह मानक संबंधित राज्य सरकारों द्वारा वेतन अधिनियम संहिता 2019 के मुताबिक अधिसूचित किया जाएगा। 

अब तक सरकार के नियमों में न्यूनतम वेतन की गणना करने के तरीके नहीं दिए गए थे। यह नियोक्ता व कर्मचारियों के बीच टकराव की अहम वजह थी और कभी कभी मामले अदालतों तक पहुंच जाते थे। न्यायालय में मुकदमों सहित विभिन्न वजहों से दिल्ली सरकार को कर्मचारियों के वेतन में 37 प्रतिशत बढ़ोतरी के प्रस्ताव को तीन साल बीत चुके हैं, जिसकी प्रक्रिया अगस्त 2016 में शुरू की गई थी। 

हालांकि सरकार द्वारा न्यूनतम वेतन तय करने को लेकर दो तरह के विचार आ रहे हैं। पहला यह कि इस समय की हकीकतों, आर्थिक हालत को ध्यान में रखकर न्यूनतम वेतन तय किया जाए। दूसरा- ऐतिहासिक मानकों का पालन किया जाए, जो पर्याप्त हैं और उन्हें अब तक पूरी तरह से लागू नहीं किया गया। 

एक्सएलआरआई में मानव संसाधन प्रबंधन के प्रोफेसर और श्रम अर्थशास्त्री केआर श्याम कुमार ने कहा, 'केंद्र सरकार ने मसौदा नियम में जो तरीका अपनाया है, वह सही दिशा में है। इसमें सातवें वेतन आयोग का भी पालन किया गया है। न्यूनतम वेतन तय करने को लेकर यह प्रगतिशील तरीका है। इससे निश्चित रूप से वेतन में बढ़ोतरी होगी।' 

बहरहाल वीवी गिरि नैशनल लेबर इंस्टीट्यूट के फेलो अनूप सत्पथी का मानना है कि मसौदा नियम मौजूदा हकीकतों से तालमेल नहीं खा रहे हैं और इसमें सामाजिक आर्थिक मसलों व श्रम बाजार की स्थिति पर विचार नहीं किया गया है।न्यूतम वेतन तय करे के लिए सरकार द्वारा नियुक्त की गई विशेषज्ञों की समिति की अध्यक्षता कर चुके सत्पथी ने कहा, 'न्यूनतम वेतन तय करने के मानक समसामयिक और साक्ष्य आधारित होने चाहिए। इसे खाद्य घटकों से अलग किया जाना चाहिए और गैर खाद्य व्यय कामगारों द्वारा किए जा रहे वास्तविक व्यय के आधार पर तय किया जाना चाहिए। श्रमिक उत्पादकता और रोजगार पर इसके असर जैसे आर्थिक पहलू भी अहम होने चाहिए।'
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