बिजनेस स्टैंडर्ड - सस्ती दवाओं पर हटेगा अंकुश!
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सस्ती दवाओं पर हटेगा अंकुश!

सरकार द्वारा गठित समिति कर रही है आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची की समीक्षा
सोहिनी दास / मुंबई 11 03, 2019

एनएलईएम 2015 की समीक्षा कर रही समिति

उद्योग ने दिया है 5 रुपये प्रति खुराक से कम कीमत की दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर करने का प्रस्ताव
सरकार भी इस पर कर रही विचार
19 फीसदी दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे में
इनमें से 4-5 फीसदी की कीमत 5 रुपये प्रति खुराक से कम
उद्योग का मानना है कि कड़ी प्रतिस्पर्द्धा से कीमतों पर लगी रहेगी लगाम
मूल्य नियंत्रण से बाहर किया तो हर साल 10 फीसदी बढ़ सकती है कीमत

बिजनेस स्टैंडर्ड सस्ती दवाओं पर हटेगा अंकुश!पांच रुपये प्रति खुराक से कम कीमत वाली दवाओं को मूल्य नियंत्रण व्यवस्था से बाहर किया जा सकता है। ऐसा हुआ तो ऐसी दवाएं बनाने वाली कंपनियां हर साल 10 फीसदी तक कीमत बढ़ा सकती हैं। आवश्यक दवाओं की राष्ट्रीय सूची (एनएलईएम) को अद्यतन किया जा रहा है। दवाओं पर स्थायी राष्ट्रीय समिति (एसएनसीएम) की इस सप्ताह बैठक होने की उम्मीद है। समिति 2015 की सूची की समीक्षा कर रही है।

सरकार और उद्योग के सूत्रों ने इसकी पुष्टि की है। देश में 1.36 लाख करोड़ रुपये का दवा बाजार है, जिसमें से करीब 19 फीसदी दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे में हैं। इनमें करीब 4 से 5 फीसदी ऐसी दवाएं हैं जिनकी एक खुराक की कीमत 5 रुपये से कम है। एक खुराक का मतलब एक गोली या कैप्सूल है। 

उद्योग के एक सूत्र ने कहा कि दवा उद्योग करीब एक साल से इस पर जोर लगा रहा था। इस प्रक्रिया में शामिल एक दवा कंपनी के प्रबंध निदेशक ने कहा, 'सरकार के साथ कई बैठकों के बाद उद्योग ने प्रस्ताव दिया है कि 5 रुपये प्रति खुराक से कम कीमत वाली दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर किया जाना चाहिए। बाजार में इतनी होड़ है कि इन दवाओं की कीमत काबू में बनी रहे।'

एनएलईएम की नई सूची का मसौदा बनाने में सक्रिय एक वरिष्ठï सरकारी अधिकारी ने भी इसकी पुष्टि की। अधिकारी ने कहा, 'उद्योग ने 5 रुपये प्रति खुराक से कम कीमत वाली दवाओं को मूल्य नियंत्रण से बाहर करने का प्रस्ताव रखा है। अभी इस प्रस्ताव पर विचार किया जा रहा है।' नियंत्रण सूची में शामिल दवाओं की कीमत राष्ट्रीय औषध मूल्य प्राधिकरण (एनपीपीए) तय करता है। एक जटिल सूत्र के आधार पर दवा के मूल्य का निर्धारण होता है, जो किसी दवा के उन सभी ब्रांडों के औसत मूल्य पर विचार करता है जिनकी बाजार हिस्सेदारी एक फीसदी से अधिक है।

एनएलईएम में शामिल दवाओं को औषध विभाग दवा मूल्य नियंत्रण आदेश 2013 की पहली अनुसूची के तहत अधिसूचित करता है। इसके बाद एनपीपीए इन दवाओं की अधिकतम कीमत जारी करता है। दवा निर्माता कंपनियां इससे अधिक मूल्य पर दवा नहीं बेच सकती हैं। एनपीपीए नियमित रूप से दवाओं की कीमत तय करती है। एनएलईएम दवाओं के साथ अहम बात यह है कि इनकी कीमत में सालाना बढ़ोतरी थोक मूल्य महंगाई (डब्ल्यूपीआई) से जुड़ी है। हालांकि कंपनियां एनएलईएम सूची से बाहर की दवाओं की कीमत में सालाना 10 फीसदी तक की बढ़ोतरी कर सकती हैं।

एनएलईएम 2015 में स्टेंट जैसे चिकित्सा उपकरणों के साथ 375 से अधिक दवाएं हैं। देश की अग्रणी दवा कंपनियों की संस्था इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस (आईपीए) के महासचिव सुदर्शन जैन ने बताया कि देश में करीब 19 फीसदी दवाएं मूल्य नियंत्रण के दायरे में हैं और इनमें से 4 से 5 फीसदी दवाओं की प्रति खुराक कीमत 5 रुपये से कम है। उन्होंने कहा, 'इस कम मूल्य श्रेणी में पहले ही कई ब्रांड मौजूद हैं और कड़ी प्रतिस्पर्द्धा के कारण कोई भी कंपनी कीमतों में भारी बढ़ोतरी नहीं कर सकती है।'

अमूमन हर तीन साल में एनएलईएम की समीक्षा की जाती है और इसमें दवाओं को शामिल किया जाता है या बाहर किया जाता है। इस बार स्वास्थ्य शोध विभाग के सचिव और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के महानिदेशक बलराम भार्गव की अगुआई वाली एसएनसीएम इस सूची को अपडेट करने पर काम कर रही है। समिति उद्योग के विभिन्न पक्षों के साथ बैठकें कर रही है।

इनमें दवा कंपनियों, उद्योग संगठनों, मरीजों के हितों के लिए काम करने वाली संस्थाओं और गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हैं। इसकी पहली बैठक जून में हुई थी। समिति ने कैंसर के इलाज में काम आने वाली दवाओं, पेनिसिलिन के फाम्र्युलों, दिल की दवाओं और ऐंटी माइक्रोबियल रेसिस्टेंस के बारे में उद्योग की प्रतिक्रिया मांगी है।

Keyword: Medicine, Company, NLEM, SNCM, Dose, Government,
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