बिजनेस स्टैंडर्ड - दलबदलू महागठबंधन की आफत
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दलबदलू महागठबंधन की आफत

आर कृष्णा दास /  November 01, 2019

मौजूदा विधायक और झारखंड कांग्रेस कमेटी के पूर्व अध्यक्ष सुखदेव भगत ने जब सार्वजनिक रूप से यह कह दिया कि उमंग सर (मध्य प्रदेश सरकार में मंत्री उमंग सिंघार) उनके लिए अभिभावक के समान हैं तब जाकर पार्टी ने राहत की सांस ली। राहत की सांस इसलिए क्योंकि भगत पार्टी के भीतर बगावत का बिगुल फूंक चुके थे और उन्हें मनाने का जिम्मा सिंघार को ही दिया गया था। मध्य प्रदेश के इस मंत्री को कांग्रेस ने झारखंड में पार्टी का उप प्रभारी भी नियुक्त किया है। सिंघार लोहरदगा में भगत के घर पहुंचे और बंद कमरे में उनसे लंबी बातचीत की। जब सिंघार कमरे से बाहर आए तो उनका चेहरा भावहीन ही लग रहा था, लेकिन भगत बहुत उत्साह में दिख रहे थे। भगत ने कहा, 'पारिवारिक संबंधों के साथ हमारे बीच भावनात्मक जुड़ाव भी है।' उनका इशारा था कि पार्टी में सब कुछ ठीक है और कांग्रेस को फिक्र करने की जरूरत नहीं है। जब भगत को एकाएक पार्टी प्रमुख के पद से हटाया गया था तो उन्होंने पार्टी हाईकमान के साथ अपने मतभेद जाहिर करने में कोई हिचक नहीं दिखाई थी। एक वरिष्ठï कांग्रेस नेता ने बताया कि मुलाकात के दौरान भगत बहुत गुस्से में थे और सिंघार की बात सुनने को तैयार ही नहीं थे। हफ्ते भर बाद ही भगत ने कांग्रेस को तगड़ा झटका दिया, जब वह पार्टी के एक अन्य विधायक मनोज यादव को साथ लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हो गए। 

 
झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के विधायक कुणाल सारंगी और जयप्रकाश भाई पटेल निर्दलीय विधायक भानु प्रताप शाही को साथ लेकर भगत के पीछे पीछे भाजपा में आ गए। मौजूदा विधायकों के अलावा दोनों ही दलों के वरिष्ठï नेताओं ने वरिष्ठï अफसरशाहों और पुलिस अधिकारियों के साथ भाजपा का दामन थाम लिया।  एक राजनीतिक प्रेक्षक ने कहा, 'पांच विधायकों के भाजपा में जाने से पार्टी के विधायकों की संख्या में इजाफा तो हुआ ही है, ज्यादा मार्के की बात यह है कि इससे कांग्रेस और झामुमो दोनों को ही तगड़ा झटका लगा है।' दोनों ही दल महागठबंधन की गुंजाइश तलाश रहे थे मगर भाजपा ने उनके शीर्ष नेताओं और वरिष्ठï विधायकों को अपने पाले में लाकर उनके मंसूबों पर एक ही झटके में पानी फेर दिया। महागठबंधन की हालत पहले ही पतली थी और संभलने से पहले उसे एक और झटका लग गया। भले ही कांग्रेस के लिए लोकसभा चुनाव में झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) और झामुमो के साथ गठबंधन करना फायदे का सौदा नहीं रहा, लेकिन पार्टी जानती है कि इनका समर्थन लिए बगैर वह विधानसभा चुनावों में भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकती। 
 
महागठबंधन बनाने से पहने कई मुद्दों का निपटारा करना होगा मगर सबसे बड़ा पेच सीट बंटवारे का है। कांग्रेस ने घोषित तौर पर 30 सीटों पर दावा किया है, जिसमें झामुमो के मौजूदा विधायकों के दबदबे वाली सीटें भी शामिल हैं। झारखंड कांग्रेस के अध्यक्ष रामेश्वर उरांव ने कहा, 'मैंने झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के प्रमुख बाबूलाल मरांडी से मुलाकात कर शुरुआती दौर की चर्चा की है।' उन्होंने कहा कि झामुमो के साथ उनकी पार्टी का पहले से ही तालमेल है और सीट बंटवारे को लेकर चर्चा बाद में की जाएगी। 
 
मगर शुरुआती चर्चाओं में ही मतभेद उभर कर सामने आ गए जब मरांडी ने इसके उलट बयान दिया। मरांडी ने कहा, 'हम 81 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे।' उन्होंने कहा कि राज्य में झारखंड विकास मोर्चा की एकदम अलग पहचान है और हम अकेले ही चुनाव मैदान में जाएंगे। उन्होंने महागठबंधन में शामिल होने की चर्चा से भी साफ इनकार कर दिया। 2014 के विधानसभा चुनावों में झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) ने 10 फीसदी मत हिस्सेदारी के साथ आठ सीटों पर जीत दर्ज की थी। हालांकि इनमें से छह विधायकों ने पार्टी छोड़कर रघुवर दास की अगुआई वाली भाजपा की अल्पमत सरकार को समर्थन दे दिया था।
 
झारखंड विकास मोर्चा (प्रजातांत्रिक) के एक वरिष्ठï नेता ने कहा कि महागठबंधन का नेता घोषित करने के मसले पर मरांडी पसोपेश में हैं। झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इसकी अगुआई करने के लिए बेचैन नजर आ रहे हैं। कांग्रेस उन्हें महागठबंधन का चेहरा बनाने को तैयार है। पार्टी जानती है कि झामुमो के बिना बना कोई गठबंधन भाजपा का मुकाबला नहीं कर पाएगा। झामुमो को पिछले विधानसभा में 20.4 प्रतिशत मत मिले थे और उसने 19 सीटों पर कब्जा जमाया था।  
 
झामुमो की 26 आदिवासी बहुल सीटों पर मजबूत पकड़ है। अपने सहयोगी दलों को अपने हिस्से के वोट दिलवाना महागठबंधन के लिए दूसरी बड़ी चुनौती होगी। एक राजनीतिक प्रेक्षक ने कहा, 'झारखंड की राजनीति में प्रथा बन चुकी है कि किसी दल के वोट उसके सहयोगी दल को नहीं मिल पाते।' उन्होंने कहा झामुमो के आदिवासी वोट कांग्रेस या किसी साझेदार दल को नहीं पड़ेंगे और इसी तरह कांग्रेस के गैर आदिवासी वोट झामुमो को नहीं मिलेंगे। भाजपा को चुनौती देने के लिए चुनाव पूर्व गठबंधन की सूरत मुश्किल नजर आ रही है। इसके बाद एकमात्र विकल्प चुनाव बाद गठबंधन का बचता है लेकिन वह इतना प्रभारी होगा, इस बात में संदेह है।
 
ऐसे में भाजपा की चुनौती केवल इतनी है कि वह अपना घर संभाल कर रखे। झामुमो के प्रवक्ता सुप्रिय भट्ïटाचार्य ने कहा, 'भाजपा चुनावी फायदों के लिए बाहरी नेताओं को अपने साथ मिला रही है। इससे उसके अपने कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी बढ़ेगी और पार्टी को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।' भगत और पूर्व आईपीएस अधिकारी से कांग्रेसी बने अरुण उरांव को पार्टी में एक दूसरे का धुर विरोधी माना जाता था और दोनों ही नेता लोहरदगा से हैं। अब दोनों ही नेता भाजपा में हैं। 
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